दामोदर सातवलेकर

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स्वयं संस्कृत सीखने के लिए

संस्कृत स्वयं-शिक्षक

लेखक

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर चारों वेदों के भाष्यक्रार जर संस्कृत के अनेक ग्रन्थो के रचयिता

स्वयं संस्कृत सीखने कं लिए

संस्कृत स्वयं-शिक्षक

लेखक

श्रीपाद दामोदर सातवलेकर चारों वेदों के भाष्यक्रार ओर संस्कृत के अनेक ग्रन्थो के रचयिता

रशासधाल्न

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स्थापित 1942

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श्रेष्ट प्रकाकन परम्प

राजप्ाल्य

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संस्करण : 2016 © राजपाल एण्ड सन्ज्‌

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अणा7१४५ 0गा०त० 3४ भृलीतभ मुद्रक : के.एच.बी. ओंफसेट प्रोसेस, दिल्ली

राजपाल एण्ड सन्ज 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट-दिल्ली-110006 कोन; 011-29869812, 23865488, फैक्सः 011-23867791 @-7141 : 53168 @ष्थुएभकण्छाष्जोपषडि-त्ण ५/५४९५. 2 भणण ौष्ट-ल्णाी ५४५५५,.९०९१०००६.८०ा/ 9905605

परिविय

वेदमूर्ति पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की गणना भारत के अग्रणी वेद तथा संस्कृत भापा के विशारदो मे की जाती हे वे सौ वर्ष से अधिक जीवित रहे ओर आजीवन इनके प्रचार-प्रसार का कार्य करते रहे। उन्होने सरल हिन्दी मेँ चारों वेदों का अनुवाद किया ओर ये अनुवाद देशभर मे अत्यन्त लोकप्रिय हुए इसके अतिरिक्त योग के आसनो तथा सूर्य नमस्कार का भी उन्होने बहुत प्रचार किया

प्र, सातवलकर महाराष्ट्र के निवासी थे ओर व्यवसाय से चित्रकार थे मुम्बई के सुप्रसिद्ध जे. जे. स्कूल आव आर्दूस में उन्होने विधिवत्‌ कला की शिक्षा प्राप्त की थी व्यक्ति चित्र (पोर्टरट) वनाने में उन्हे विशेष कुशलता प्राप्त थी ओर लाहौर मं अपना स्टृडियां वनाकर वे यह कार्य करते थे।

महाराष्ट्र वापस लौटकर उन्होने तत्कालीन ओंध रियासत में “स्वाध्याय मंडल' कं नाम वदां तथा संवंधित ग्रन्थों का अनुवाद तथा प्रकाशन कार्य आरंभ किया , सरल हिन्दी मं वद कं ये पहले अनुवाद थे जो बहुत जल्द देशभर मे पट जाने लगे संस्कृत भापा सिखाने के लिए भी उन्होने अपनी एक सरल पद्धति बनाई ओर इसके अनुसार कक्षा चलानी आरम्भ कीं पुस्तके भी लिखीं जिन्हे पट़कर लोग घर बैठे संस्कृत सीख सकते थे

संस्कृत स्वयं-शिक्षकः नामक यह पुस्तक शीघ्र ही एक संस्था बन गई ओर इस पद्धति का तेजी से प्रचार हुआ संस्कृत को भाषा सीखने की दृष्टि से एक कठिन भाषा माना जाता हे, इसलिए भी इस सरल विधि का व्यापक प्रचार हआ इसे दरअसल संस्कृत सीखने की 'सातवलेकर पद्धति' ही कहा जा सकता हे यह 70-80 वपं पहले लिखी गई थी आज भी इसकी उपादेयता कम नहीं हुई ओर आगे भी इसी प्रकार बनी रहेमी

ओध में स्वाध्याय मंडल का कार्यं बड़ी सफलता से चल रहा था, कि तभी 1948 मे महात्मा गांधी की हत्या की घटना हुई नाधूराम विनायक गोडसे चकि महाराष्ट्री ओर ब्राह्मण थे, इसलिए सारे महाराष्ट्र मे ब्राह्मणों पर हमले करके उनकी सम्पत्त्या इत्यादि जलाई गई इसी में पं. सातवलेकर के संस्थान को भी जलाकर नष्ट कर्‌ दिया गया वे स्वयं किसी प्रकार बच निकले ओर उन्होने गुजरात के सूरत जिले में स्थित पारडी नामक स्थान मे फिर नये सिरे से स्वाध्याय मंडल का कार्य संगठित किया 1969 मे अपने देहान्त के समय तक वे यहीं कार्यरत रहे।

भाषा-शिक्षण के क्षत्र मे “संस्कृत स्वयं-शिक्षक' एक वैज्ञानिक तथा अत्यन्त सफल पुस्तक है

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राजपाल एण्ड सन्ज़ 1590, पदरसा रोड, कश्मीरी गेट -दिल्ली-110006 पनः 011-3869819, 23865488, फेक्सः 011-98867791 €-1ा12।] : 92165 @शएभफणणाअीह.८णा ५५४४८५५. [वणा ह.ल्मा) ५४५/५५.८९000६.601/2}0212705015

परिचय

वेदमूर्ति पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर की गणना भारत के अग्रणी वेद तथा संस्कृत भापा कं विशारदं मे की जाती है। वे सौ वर्ष से अधिक जीवित रहे ओर आजीवन इनकं प्रचार-प्रसार का कार्य करते रहे उन्होने सरल हिन्दी मे चारों वेदों का अनुवाद किया ओर ये अरुवाद देशभर में अत्यन्त लोकप्रिय हुए इसके अतिरिक्त योग के आसनों तथा सूर्य नमस्कार का भी उन्होने बहुत प्रचार किया।

प्र. सातवलकर महाराष्ट्र के निवासी थे ओर व्यवसाय से चित्रकार थे मुम्बई सुप्रसिद्धर जे. जे. स्कूल आव आर्दूस में उन्होने विधिवत्‌ कला की शिक्षा प्राप्त की थी व्यक्ति चित्र (पोर्ट) वनाने में उन्हे विशेष कुशलता प्राप्त थी ओर लाहीर मं अपना स्टृडिवा वनाकर वे यह कार्य करते थे।

महाराष्ट्र वापस लौटकर उन्होने तत्कालीन भौध रियासत मेँ “स्वाध्याय मंडल' कं नाम वेदां तथा संवंधित ग्रन्थों का अनुवाद तथा प्रकाशन कार्य आरंभ किया ' सरल हिन्दी मं वेद कं ये पहले अनुवाद थे जो बहुत जल्द देशभर मे पटे जाने लगे संस्कत भापा सिखाने के निए भी उन्होने अपनी एक सरल पद्धति बनाई ओर इसके अनुसार ककारं चलानी आरम्भ कीं पुस्तके भी लिखीं जिन्हे पट़कर लोग घर बैठे संस्कृत सीख सकते थे

“संस्कृत स्वयं-शिक्षक' नामक यह पुस्तक शीघ्र ही एक संस्था बन गई ओर इस पद्धति का तेजी से प्रचार हुआ संस्कृत को भाषा सीखने की दृष्टि से एक कठिन भाषा माना जाता है, इसलिए भी इस सरल विधि का व्यापक प्रचार हआ इसे दरअसल संस्कृत सीखने की 'सातवलेकर पद्धति' ही कहा जा सकता हे यह 70-80 वर्पं पहले लिखी गई थी आज भी इसकी उपादेयता कम नहीं हुई ओर आगे भी इसी प्रकार बनी रहेगी

ओध में स्वाध्याय मंडल का कार्य बड़ी सफलता से चल रहा था, कि तभी 1948 मेँ महात्मा गांधी की हत्या की घटना हुई नाथूराम विनायक गोडसे चूकि महाराष्ट्रय ओर ब्राह्मण थे, इसलिए सारे महाराष्ट्र मे ब्राह्मणों पर हमले करके उनवी सम्पत्त्या इत्यादि जलाई गई इसी में पं. सातवलेकर के संस्थान को भी जलाकर नष्ट कर दिया गया वे स्वयं किसी प्रकार बच निकले ओर उन्होने गुजरात के सुस्त जिले मेँ स्थित पारडी नामक स्थान मेँ फिर नये सिरे से स्वाध्याय मंडल का कार्य संगठित किया। 1969 मेँ अपने देहान्त के समय तक वे यहीं कार्यरत रहे

भाषा-शिक्षण के क्षेत्र मे “संस्कृत स्वयं-शिक्षक' एक वैज्ञानिक तथा अत्यन्त [- सफल पुस्तक है ५.

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पुस्तक प्रारम्भ करने से पहले इसे अवश्य षठ

इस पुस्तक का नाम “संस्कृत स्वयं -शिक्षक' है ओर जो अर्थं इस नाम से विदित होता है वही इसका कार्य है किसी पंडित की सहायता कं विना हिन्दी जानने वाला व्यक्ति इस पुस्तक के पटने से संस्कृत भाषा का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। जो देवनागरी अक्षर नहीं जानते, उनको उचित है कि पहले देवनागरी पढ़कर फिर पुस्तक को पटं देवनागरी अक्षरों को जाने बिना संस्कृत जानना कठिन है।

बहुत से लोग यह समइते है कि संस्कृत भाषा बहुत कठिन है, अनेक वर्ध प्रयल करने से ही उसका ज्ञान हो सकता है। परन्तु वास्तव मे विचार किया जाए तो यह भ्रम-मात्र है संस्कृत भाषा नियमवद्ध तथा स्वभावसिद्ध होने के करण सब वर्तमान भापाओं से सुगम है मै यह कह सकता हू कि अग्रेजी भाषा संस्कृत भाषा से दस गुना कठिन है मैने वर्षो के अनुभव से यह जाना है कि संस्कृत भाषा अत्यंत सुगम रीति से पढ़ाई जा सकती है ओर व्यावहारिक वार्तालाप तथा रामायण-महाभारतादि पुस्तकों का अध्ययन करने के लिए जितना संस्कृत का ज्ञान चाहिए, उतना प्रतिदिन घंटा-आधा-घंटा अभ्यास करने से एक वर्षं की अवधि मे अच्छी प्रकार प्राप्त हो सकता है, यह मेरी कोरी कल्पना नहीं, परंतु अनुभव की हुई बात है। इसी कारण संस्कृत-जिज्ञासु सर्वसाधारण जनता के सम्मुख उसी अनुभव से प्राप्त अपनी विशिष्ट पद्धति को इस पुस्तक दारा रखना चाहता हू।

हिन्दी के कई वाक्य इस पुस्तक में भाषा की दृष्टि से कुछ विरुद्ध पाए जागे, परन्तु वे उस प्रकार इसलिए लिखे गए है कि वे संस्कृत वाक्य में प्रयुक्त शब्दों के क्रम के अनुकूल हों किसी-किसी स्थान पर संस्कृत के शब्दों का प्रयोग भी उसके नियमों के अनुसार नहीं लिखा है तथा शब्दों की संधि कहीं भी नहीं की गई है। यह सब इसलिए किया गया है कि पाठकों को भी सुभीता हो ओर उनका संस्कृत मँ प्रवेश सुगमतपूर्वक हो सके पाठक यह भी देखेगे कि जो भाषा की शेली की न्यूनता पहले पाठो मे है, वह आगे के पाठे मे नहीं है भाषा-शेली की कुठ न्यूनता सुगमता कं जिए जान-वृज्जकर रखी गई है, इसलिए पाठक उसकी ओर ध्यान देकर अपना अभ्यास जारी रखें, ताकि संस्कृत-मंदिर मेँ उनका प्रवेश भली-भोति हो सके

पाठकों को उचित है कि वे न्यून-से-न्यून प्रतिदिन एक घंटा इस पुस्तक का अध्ययन किया कर ओर जो-जो शब्द आर्पँ उनका प्रयोग बिना किसी संकोच के करने का यल करं इससे उनकी उन्नति होती रहेगी

निस रीति का अवलम्बन इस पुस्तक मे किया गया है, वह केवल सुगम है, परन्तु स्वाभाविक भी है, ओर इस कारण इस रीति से अल्प काल मेँ ओर थोडे-ते परिश्रम से बहुत लाभ होगा

रँ ति्वियपूवक कट सकता हूँ कि प्रतिदिन एक घंटा प्रयल करने से एक

वपं कं अन्दर इस पुस्तक की पद्धति से व्यावहारिक सस्कृत भाषा का जात हो सकता

¦ परट्तु पाठकों को यह वात ध्यान में रखनी चाहिए कि केवल उत्तम शेली से

ही काम नहीं चलेगा, पाठकों का यह कर्तव्य होगा कि वे प्रतिदिन पर्याप्त ओर निश्चित

समव इस कार्य के लिए अवश्य लगाया करे, नही तो कोई पुस्तक कितनी ही अच्छी क्वान दो, विना प्रयल किए पाठक उससे पूरा लाभ ना <न सकते

अभ्यास की पद्धति (1) प्रथम पाट तक जो कुछ लिखा उत जद धकारं पृष छक = पश्चात्‌ प्रथम पाठ को पट्ना प्रारम्भ कीजिए) ५. एक पाट पहले सम्पूर्ण पटना चाहिए, फिर उसको क्रमशः स्मरण करना वाहि पक पाठ को ककम दस वा ५44८ क"

(3) हर एक पाट परे जो-जो संस्कृत वाक्य रह, ४०-य कटस्य करना चाहिए था जिन-जिन शब्दों के रूप दिए है उनको स्मरण करके, उनके समान जो शब्द उन शव्द के रूप वैसे ही वनाने का यल करना चाहिए

(4) जरा परीक्षा कँ प्रश्नं दिए हाँ, वहाँ उनका उत्तर दिए विना आगे नहीं कुनप किप, \ यदि ध्रञनवी का उत्तर देना कठिन हो, तो पूर्व पाठ दुवारा पटना चाहिए दे सकने का यही मतलव है कि पूर्वं पाठ ठीक प्रकार से

(5) जर्हौ दुवारा पटने की सूचना दी हे, वँ अवश्य दुवारा पढ़ना चाहिए

(6) यदि दो विद्यार्थी साथ-साथ अभ्यास करेगे ओर परस्पर प्रश्नोत्तर करके एक-दूसरे को मदद देगे तो अभ्यास बहुत शीघ्र हो सकंगा

(7) यह पुस्तक तीन महीनों कं अभ्यास के लिए है इसलिए पाठकों को चाहिए कि वे समय के अन्दर पुस्तक समाप्त करं जो पाठक अधिक समय लेना चाहे, वे ले सकते है यह पुस्तक अच्छी प्रकार स्मरण होने के पश्चात्‌ ही दूसरी पुस्तक प्रारम्भ करनी चाहिए

4 4 4 न्च ^ 4

अक्षर अआडईउऊऋद्लुलृ एएेओजओअंजः। कखगघड,चषछजञ्जज, टठ्डदटण,तथदधन पफवबभम,यरलव, शषसह, क्षत्र ज्ञ।

शुद्ध स्वर अ,इ,उ, ऋ, तु, ये पांच शुद्ध स्वर है सयुक्त स्वर ओर अथवा मिलकर ११ ११ 4 2१ 29 9? (6, 6, ड्‌ 9 र्‌ (6, ड्‌ # | 9? 1 9) ११ 2 92 पे 6। 9१ 39 9१ स्वर-जन्य अक्षर (स्वरों से बने इए अक्षर) इस्वर के साथ मिलकर “य” 18, 1) 32 ‹१तु” त्र +. 4 “~ ~~

आ-बना ई-बनी है ऊ-बना है ऋ-बनी है ए-बना है ए-बना है ओ-बना है ओ-बना है एे-वना

ओ-वना है

बनाता रै

7

सयुक्त व्यञ्जन

क्‌ ओर ष्‌ मिलकर क्प क्ष] बना है जू ¢ ज्ज [ज्ञ] क्‌ ^ # क्व [क्व] *" र्‌ ४: *? म्‌ र्‌ प्र # | # त्र +

-- द्‌ ओर मिलकर द्र वना है त्‌ ^" # त्य पू्‌ प्त # २। + ल्ल ५; ह्‌ # ह्य ६। + त्र + क्‌ ¢ र्‌ क्र १? म्‌ # म्न + सू #॥ म्र ब्‌ # ^ व्द + द्‌ {+~ द्र्य # प्‌- त्‌- | ण्य # = 9 शर्य _

इस प्रकार संयुक्त अक्षर अनन्त हें हिन्दी भापा कं पाठकों को उचित हि कि वे इस संयुक्त अक्षर पद्धति को जानें ताकि वे अच्छी तरह संयुक्त अक्षरों को पट्‌ सके।

कुछ स्वरो की सन्धि

+ अ~अय + अ=आय + अ=~अव + अ= जाव होता है इसी प्रकार अन्य स्वर मिलने पर पाठक सन्धि जान सकंगे

+ आ=जया। + आयी

+ उ=अवु। + आव्‌ + ए=अये। + ओ=आयो + एअवे। ` + आवो

इस प्रकार “ए, एे, ओ, ओ' की सन्धि पाठक जान सकंगे

पाट 1

नी कुठ संस्कृत शब्द ओर उनके अर्थ दिए हुए हैँ फिर उनके वाक्य बनाये है संस्कृत भाषा के शब्द काले टाइप मेँ छपे है

शब्द

सः=वह त्वम्‌=तू। अहम्‌=में। गच्छति=वह जाता है। गच्छसितू्‌ जाता हे। गच्छामि=मे जाता हू।

वाक्य

अहं गच्छामि=मे जाता हू त्वं गच्छसि=त्‌ जाता है।

सः गच्छति=वह जाता हे

पाठक यहां ध्यान रखे कि संस्कृत वाक्यों का भाषा मेँ अर्थ शब्द के क्रम सेही दिया गया है।

शब्द

कुत्र=कहां यत्र-जहां अ्र=यहां तत्र = वहां सर्वत्र =सव स्थान पर किमु=क्या |

वाक्य

` त्वं कु गच्छसि-तू कहां जाता है ?

- यने सः गच्छति-जहां वह जाता है।

- अह तत्र गच्छामि वहां जाता ह्‌

` सः कत्र गच्छति-वह कहां जाता है ?

` यत्र अहं गच्छामि-जहां मे जाता हू

` त्व सर्वत्र गच्छसि-तू सब स्थान पर जाता हे।

- कि सः गच्छति-क्या वह जाता हे ?

` सः गच्छति किम्‌-वह जाता हे क्या ?

` चः कुन गच्छति-वह कहां जाता है ?

` यन त्वे गच्छसि-जहां तू जाता है।

` त्वं गच्छसि किम्‌-तू जाता है क्या ?

12. अहं सर्वत्र गच्छामि- सव स्थान पर जाता हू पाठकों को यै सव वाक्य ध्यान में रखने चाहिए यदि दो पाठक साथ-साथ [9|

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पट़ते हाँ, तो एक-दूसरे से संस्कृत तथा हिन्दी के वाक्य उच्चारण करके अर्थ पूषन चाहिए, ओर दूसरे को चाहिए कि वह अर्थ बताए परन्तु यदि अकेला ही सस्ता हो तो उसे प्रथम ऊंची आवाज़ में प्रत्येक वाक्य दस बार उच्चारण करके तत्पश्चात्‌ संस्कृत वाक्यों की ओर दृष्टि देकर उनका अर्थं भाषा के वाक्यों की ओर दृष्टि

देते इए मन से लगाने का प्रयल करना चाहिए एेसा दो-तीन बार करने से सव

वाक्य याद हो सकते है।

जो पाठक इन वाक्यों की ओर ध्यान देगे उनको उक्त शब्दों से कई अन्य

वाक्य स्वयं रचने की योग्यता आएगी ओर पता लगेगा कि थोडे-से शब्दों से कितनी बातचीत हो सकती दै।

शब्द्‌ न-नरीं अस्ति-हे। कः -कौीन नास्ति-नहीं हे वाक्य

1. अहं गच्छामि-मै नहीं जाता हू। 2. त्वं गच्छसि-तू नहीं जाता है। 5. सः गच्छति- वह नहीं जाता हे। 4. अह तत्र गच्छामि- मै वहां नहीं जाता हू 5. त्वं सर्वत्र गच्छसि-तू सव स्थान पर नहीं जाता है 6. कि सः गच्छति-क्या वह नहीं जाता है। 7. यन्न त्वं गच्छसि-जहां तू नहीं जाता है। 8. त्वं गच्छसि किम्‌-तू नहीं जाता है क्या ? 9. अहं सर्वत्र गच्छामि-मेँ सब स्थान पर नहीं जाता हूं सूचना-पाठक यह देख सकते हँ कि केवल एक ^न' (नकार) के उपयोग से कितने नये उपयोगी वाक्य वन गए हैँ अव “कः शब्द का उपयोग देखिए- . कः तत्र गच्छति-कौन वहां जाता है ? . कः सर्वत्र गच्छति-कौन सब स्थान पर जाता है? . तत्र कः गच्छति- वहां कोन नहीं जाता ? . कः सर्वत्र गच्छति-कौोन सब स्थान पर नहीं जाता ? . कः तत्र जस्ति-कीन वहां है ? . तत्र कः अस्ति-वहां कौन हे ? . अस्ति कः तत्र-हे कौन वहां ?

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पाठ 2

[चम्नालखित शव्द याद कीजिए- शब्द

गृहम्‌-घर को नगरमू-नगर को ग्राममू-गांव को जापणम्‌--वाजार को। पाठशालाम्‌-पाटशाला को उद्यानम्‌-वाग को

वाक्य

. त्वं कुत्र गच्छसि-तू कहां जाता हे ?

. अहं गृहं गच्छामि-मे घर को जाता हू।

. सः कुत्र गच्छति-वह कहां जाता हे ?

. सः ग्रामं गच्छति-वह गांव को जाता हे।

, त्वं पाठशालां गच्छति किम्‌-तू पाठशाला को जाता हे क्या ? . सः उद्यानं गच्छति किम्‌-वह बागृ को जाता है क्या ? . किं सः ग्रामं गच्छति- क्या वह गांव को जाता हे ?

. किं त्वम्‌ आपणं गच्छसि-क्या तू वाजार को जाता हे ? . यत्र त्वं गच्छसि-जहां तू जाता है।

. तत्र अह गच्छामि-वहां मे जाता हू

. यत्र सः गच्छति-जहां वह जाता हे

. तत्र त्वं गच्छसि किम्‌-वहां तू जाता हे क्या?

शब्द

यदा-जव कदा-कव सदा-सदा, हमेशा सर्वदा-सदा, हमेशा सदेव-हमेशा तदा-तवब।

अब नीचे लिखे हए वाक्यों को याद कीजिए यदि आपने पूर्वोक्त वाक्य याद किए हों तो ये वाक्य आप स्वयं बना सकते है- वाक्य

1. कदा सः नगरं गच्छति-कब वह नगर को जाता है? 2. यदा सः ग्रामं गच्छति-जब वह गांव को जाता हे। | 8. अहं सदेव पाठशालां गच्छामि- मे हमेशा पाठशाला -जाता हू: |11| 11 |

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[ ति याः 9 ^=

4 सः सर्वदा उद्यानं गच्छति-वह सदा वाग को जाता हे। 5. कि त्वं संदा आपणं गच्छसि- क्या तू हमेशा वाजार जाता है? 6. अहं संदेव नगरं गच्छामि-मँ हमेशा नगर को जाता हू 7. यदा त्वं ग्रामं गच्छसि-जव तू गांव को जाता हे। 8. तदाऽहं उद्यानं गच्छामि-तव मँ वाग को जाता हू 9. सः नगरं गच्छति किमू्‌-वह नगर को जाता हे क्या? 10. सः सर्वदा ग्रामं गच्छति-वह सदा गांव को जाता हे। 11. कि त्वम्‌ उद्यानं गच्छसि-क्या तू वाग को जाता हे? 12. अहं सदेव उदानं गच्छामि-मे सदा ही वाग को लाता हू। 13. त्वं कुत्र गच्छसि-तू कहां जाता हे ? 14. त्वं कदा गच्छसि-तू कव जाता हे? 15. सः सदेव गच्छति-वह हशा ही जाता हे पूर्वोक्त प्रकार से इन वाक्यों का भो जोर से वौालकर दस-दस वार उच्चारण करना चाहिए तत्पश्चात्‌ संस्कृत वाक्य की ओर देखकर (हिन्दी के वाक्य को देखते हए) उस्तको हिन्दी का वाक्य वनाना चाहिए तदनन्तर हिन्दी का वाक्य देखकर उसको संस्कृत वाक्य वनाना चाहिए इस प्रकार करने से पाटक स्वयं कई नये वाक्य बना सकते अब कुछ निषेध के वाक्य वताते है- 1* अह हं गच्छामि घर नहीं जाता ह। 2* सः ग्रान गच्छति-वह गोव को नहीं जाता डे। = राला गच्छसि किमू-तू पाठशाला को नदीं जाता है क्या ? उदयान कि गच्छति--क्या वह वाग को नहीं जाता ? कि गच्छति-क्या वह गोव को नहीं जाता ? 6. किं त्वम्‌ , _ गच्छसि-क्या तू बाजार नहीं जाता ? 7 गच्छसि-वर्हो तू क्यों नीं जाता ? 8“ यदा तः ग्राम गच्छति-जव वह गोव को नहीं जाता। गच्छति-कौन हमेशा बाग को नहीं जाता ? 10. सः उद्यानं सर्वदा गच्छति-वह वाग को हमेशा नहीं जाता 11. त्वंतत्रकिन गच्छक्ति-तू व्हा क्यो नहीं जाता ? 12. सः तत्न सदेव गच्छति-वह वरं हमेशा ही नहीं जाता इसी प्रकार पाठक स्वयं वाक्य वना सकते हे

पाठ

यदि आपने पूर्व पाठ के वाक्य तथा शब्द अच्छी प्रकार याद करलियेदोतो अब निम्नलिखित शब्दों को याद कीजिए-

सायम्‌-शाम को प्रातः- प्रातःकाल राजो-रात्रि में। श्वः-कल (आगामी दिन) परश्वः-परसों दिवा-दिन में मध्यादे-दोपहर में अद्य-आज ह्यः-कल (वीता दिन)

वाक्य

. त्वं कुज सदेव प्रातः गच्छसि-तू कलँ हमेशा ही प्रातःकाल जाता हे ? . अहं सदैव प्रातः उद्यानं गच्छामि- मै सदा ही प्रातःकाल वाग जाता हू। . सः सायम्‌ उद्यानं गच्छति-वह सायंकाल बाग को जाता हे।

. अद्य अह पाठशालां गच्छामि-आज में पाठशाला नही जाता हू

- त्वम्‌ अद्य पाठशालां गच्छसि किम्‌-तू आज पाठशाला जाता है क्या ? - त्वं मध्याहे कुतर गच्छसि-तू दोपहर को कहँ जाता हे ?

- अह मध्याहे ग्रामं गच्छामि-यें दोपहर में गौव जाता हं

सः दिवा नगरं गच्छति-वह दिन में नगर जाता हे।

- अहं रात्रौ गृहं गच्छामि-ैं रात्रि मे घर जाता है|

10. त्वं यत्र रात्रौ गच्छसि-जर्हौ तू रात्रि मे जाता है।

11. तन्न अहं दिवा गच्छामि-वर्हो भे दिन में जाता ह।

12. तन्न सः प्रातः गच्छति- व्हा वह प्रातःकाल जाता हे।

शब्द्‌

यदि-यदि, अगर तर्हि-तो गमिष्यसि-त्‌ जाएगा गमिष्यति वह जाएगा यथा-जेते तवा- पैसे कथम्‌- कैसे गमिष्यामि- मे जागा जालन्थरनगरम्‌- जालन्धर शहर को हरिदारनगरम्‌-हरिदार शहर को

वाक्य

1. यदि त्वं जालन्धरनगरं श्वः गमिष्यसि-अगर तू जालन्धर शहर को कल जाएगा 2. तर्हिं अहं हरिद्वारं परश्वः गमिष्यामि-तो मँ हरिद्वार शहर को परसो जाऊंगा 8. यदि त्वं गमिष्यसि तदा अहं गमिष्यामि-जव तू जाएगा तव जाऊंगा [13] 4. यदि त्वं गमिष्यसि तर्हिं अहं गमिष्यामि-अगर तु नहीं जाएगा तो मेँ नहीं (13

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जाऊंगा 5. सः हरिद्वारं श्वः गमिष्यति-वह कल हरिदार जाएगा 6. सः श्वः प्रातः जालन्धरनगरं गमिष्यति-वह कल प्रातः जालन्धर शहर जाएगा 7. यत्र सः श्वः गमिष्यति-जहाँ कल वह जाएगा 8. तत्र अहं परश्वः गमिष्यामि- वहा मै परसों जागा 9. त्वं परश्वः ग्रामं गमिष्यसि किमू्‌-तू परसो गौव जाएगा क्या ? 10. अहम्‌ अद्य साय नगरं गमिष्यामि- नही, मँ आज सायंकाल शहर जाऊँगा 11. यथा त्वं गच्छति तथा सः गच्छति-जैसे तू जाता हे, वैसे वह जाता हे 12. कथं तत्र सः श्वः गमिष्यति-कैते वरं वह कल नहीं जाएगा ? 13. सः तत्र श्वः गमिष्यति-वह वहो कल जाएगा ये वाक्य देखकर पाठकों को पता लगेगा कि वे दैनिक व्यवहार के नए वाक्य स्वयं बना सकते हं इसीलिए वे नए-नए वाक्य ज्ञात शब्दो से वनाने का यल किया करे अव निषेध के वाक्य देखिए-

5" त्वं श्वः जालन्धरं गमिष्यसि किमू-तू कल जालन्धर नहीं जाएगा क्या ? 6 यथा त्व गच्छसि तथा सः गच्छति-जेसे तू नहीं जाता वैसे वह नहीं जाता 7 कथं सः गच्छति-कैसे वह नहीं जाता ?

8 सः रात्रौ कन-क्त गमिष्यति-वह रात्रि मेँ कहा-करहाँ नहीं जाएगा 2

यनि गमिष्यसि, तत-तत्र सः गमिष्यति- -जौ तू जाएगा, वरह -वलं वह नहीं जाएगा

पाठ 4 "गम्‌- (गच्छ) का अर्थ छना परन्तु उससे पूर्व .आ' लगने से- आगम्‌-उसी का अर्थ .आना' होता है जैसे- शब्द्‌

(हि गच्छति-वह जाता है। गच्छसि-त्‌ जाता है। गच्छामि-जाता हू गमिष्यति-वह जाएगा

------ ~

गमिष्यसि-त्‌ जाएगा गमिष्यामि-मे जाऊंगा

आगच्छति-आता रे आगच्छसि-तू आता है। आगच्छामि-आता हू। आगमिष्यामि-मे आगा आगमिष्यसि-तू आएगा आगमिष्यति-वह आएगा अपि-भी। नहि- नहीं च-जर

ओषधालयम्‌-दवाखाने को। वनम्‌-वन को, कूषम्‌-कं को

वाक्य

- यदा त्वं वनं गमिष्यसि-जब तू वन को जाएगा

. तदा अहम्‌ अपि जागमिष्यामि-तवब मे भी आगा

- यदा तत्र सः गमिष्यति-जब वह वहाँ जाएगा

- तदा तेत्र त्वं आगमिष्यसि किम्‌-तव वहौँ तू आएगा क्या ?

- अह प्रातः गमिष्यामि सायं आगमिष्यामि-ै सवेरे जाऊँगा ओर सायंकाल को आगा

- कदा त्वं तत्र गमिष्यासि-तू वां कब जाएगा ?

- अह मध्याहे तत्र गमिष्यामि-मे दोपहर को वर्हौँ जाऊंगा

- यदि त्वं गमिष्यसि-अगर तू जाएगा

- सः अपि आगमिष्यति-वह भी नहीं आएगा

शब्द

भक्षयति-वह खाता है। भक्षयसि-तू खाता है। भक्षयामि-मे खाता अन्नम्‌-अन्न को। फलम्‌-फल को मोदकम्‌-लड्ट्‌ को भक्षयिष्यति-वह खाएगा। भक्षयिष्यसि-तू खाएगा

-में खाऊँंगा ओदनम्‌-चावल को। म्‌-चिचड़ी आप्रम्‌-आम को।

वाक्य

1. तः अनं भक्षयति-वह अनन खाता हे। . ४" त्वं मोदकं भक्षयसि-तू लड्डू खाता हे। 2. अह फल भक्षयामि-मे फल खाता ह|

त्वह $> 3 4

८2 @ ~ @

सः ओदनं भक्षयिष्यति-वह चावल खाएगा

- त्वम्‌ आप्र भक्षयिष्यसि-तू आम खाएगा - अह मुदगौदनं भक्षयिष्यामि-मै चिचड़ी खार्ऊगा

यदि सः वनं प्रातः गमिष्यति-अगर वह वन को प्रातःकाल जाएगा तर्हिं जप्रं भक्षयिष्यति-तो आम खाएगा

अह तत्र गमिष्यामि फलं भक्षयिष्यामि- नैं व्ल जाऊंगा ओर फल खाञँगा।

- सः गृहं गमिष्यति मोदकं भक्षयिष्यति-वह घर जाएगा ओर लड्‌ खाएगा किं सः जन्नं भक्लयिष्यति-क्या वह अन्न खाएगा ? * तया तत्र जहम्‌ जाग्र भक्षयिष्यामि- वैसे वहाँ मँ आम खाऊँगा |

- यथा सः ओदनं भक्षयिष्यति-जैसे वह चावल खाएगा

विभक्तियां अब कूछ विभक्तयो के रूप देते हँ, जिनको स्मरण करने ते पाठकों की योग्यता

बहुत बट्‌ सकती हे।

संस्कृत में सात विभक्तियौँ होती है (य दहिन्दीमें भी रहै) ।- देव" शब्द के सातां विभवितियों के रूप

विणत का नाम॒ विभवित्‌ कः हिन्दी अर्थ

वु देवः देव (न)

2. द्वितीया देवम्‌ देव क्रो

$. तृतीया देवेन देव के दारा न, से)

४० देवाय देव के लिए (को)

चष देवात्‌ देव से

सप्तमी देवस्य देव का, की, के

` देव देव में, पर सम्बोधन _ हि देव हे देव

पाठक देख सकते है कि इन रूपो का बातचीत करने में कितना उपयोग होता हे उक्त रूपोंका उपयोग करके अब्‌ कुछ वाक्य देते है-

1. उक्त वाक्यों मं "पश्य" आदि शब्द नए पाटक जान सकते ह। अर्थ देखने के

1. देवः तत्र गच्छति-देव वरह जाता हे। 2. तत्र देवं पश्य'- वहाँ देव को देख

आए है, उनका अर्थ हिन्दी के वाक्यों को देखकर लिए 1, १, 8, 4 अंक शब्दों के ऊपर रखे ह।

. देवेन अन्नं दत्तम्‌-देव के दारा अन्न दिया गया . देवाय फलं देहि-देव के लिए फल दे। . देवात्‌ ज्ञानं लभते-देव से ज्ञान पाता दे। . देवस्य गृहम्‌ अस्ति-देव का घर है। . देवे ज्ञानम्‌ अस्ति-देव में ज्ञान है। सम्बोधन-हे देव ! त्वं तत्र गच्छसि किम्‌ ?-हे देव ! तु वरहा जाता है क्या ? इस प्रकार पाठक वाक्य बना सकेगे। उनको चाहिए कि वे इस प्रकार नये शब्दों का उपयोग करते रहे अब उक्त वाक्यों के निषेध अर्थ के वाक्य देते है। इनका अर्थं पाठक स्वयं जान सकेगे, इसलिए नहीं दिया है।

@ छर ।ॐ

1. देवः तत्र गच्छति 2. तत्र देवं पश्य 8. देवेन अन्नं दत्तम्‌ 4. देवाय फलं देहि। 5. देवात्‌ ज्ञानं लभते 6. देवस्य गृहं अस्ति।

7. देवे ज्ञानं अस्ति सम्बोधन-हे देव ! त्वं तत्र गच्छसि किम्‌ ?

पाठकों को ध्यान रखना चाहिए कि ये वाक्य कोई विशेष अर्थ नहीं रखते यहाँ इतना ही बताया है कि नकार के साथ वाक्य कैसे बनाए जाते हैँ इनको देखकर पाठक बहुत-से नए वाक्य बनाकर बोल सकते हे

वाक्त

अह नेव गमिष्यामि सः मांसं नेव भक्षयिष्यति सः आप्रं कदा भक्षयिष्यति ? यदा त्वं मोदक भक्षयिष्यसि सः नित्यं कदलीफलं भक्षयति देवः इदानी कुत्र अस्ति ? देवः सर्वत्र अस्ति। सः कदा आगमिष्यति ? सः अन्न श्वः प्रातः आगमिष्यति यत्र-यत्र अहं गच्छामि, तत्र-तत्र सः नित्यम्‌ आगच्छति

पाट 5

पूर्वोक्त वाक्यों तथा शब्दों को याद करने से पाठक स्वयं कई वाक्य बनाकर प्रयोग में ला सकेगे। हमने शब्द तथा वाक्य इत प्रकार रखे है कि व्याकरण का बोज्ञ पाठको पर प्डकर उनके मन पर व्याकरण का सत्कार स्वय ह्ये जाए जीर वे स्वय वाक्य बना सके।/ इसलिए पाठकों को चाहिए कि वे पहला पाठ याद किए बिना आगामी पाठ प्रारम्भ करे, तथा जो-जो शब्द पाठ में दिए हुए हैं उनसे अन्यान्य

[17| 17 | -

__ __ ग्ग

| ~

क्य स्वयं बनाने का यल करं अव नीचे लिखे हुए शब्द याद कीजिए

नक्तम्‌-रात्रि मे। नयसि-तू ले जाता हे। -वह ले जाएगा -मे ले जाऊँगा सर्वम्‌-सव। जानयसि-तू लाता डे। आनेष्यति-वह लाएगा जआनेष्यामि-मेँ लागा

नयति-वह ले जाता हे। नयामि-मे ले जाता हू। नेष्यसि-तू ले जाएगा नवीनम्‌-नया आनयति-लाता हे। आनयामि-मे लाता हू। आनेष्यसि-त्‌ लाएगा पुराणम्‌-पुराना

वाक्य

1. सः फलं नयति-वह फल ले जाता हे। 2. अहम्‌ आघ्रम्‌ आनयामि -मेँ आम लाता ह|

8. त्वम्‌ जन्नम्‌ आनेष्यसि

कि-तू अन्न लाएगा क्या ?

4 अहं ततर गमिष्यामि-मे वहाँ जाऊँगा 5. फलं आनेष्यामि-ओर फल लागा

6. त्वं श्वः कुत्र गमिष्यसि

4. त्वं कदा आगमिष्यसि

तू कल कर्हां जाएगा ?

तू कब आएगा ?

शब्द्‌

जलम्‌-जल पुष्यम्‌-ष्पूल अपपम.-_ कः किमर्थम्‌-किसलिए लेखनी-क्रलम अपूषम्‌-पूडा सूपम्‌-दाल पुस्तकम्‌-पु

उम्‌ -दुषट् वम्‌, नूत

1- जहं जलम्‌ आनयामि-मे जल 2. त्वं पुष्यम्‌ आनयसि-तू षूल . सः वस्त्रं तत्र नयति-वह

3

4. सः सदा नगरं गच्छति लाता है।

5. सः अद्य आगमिष्यति

- स्याही मसीपात्म्‌-दवात वस्त्रम्‌-कपड़ ल।

वाक्य

लाता हू।

लाता हे।

वस्त्र वरह ले जाता हे।

पस्तकं आनयति-वह हमेशा शहर जाता हे ओर पुस्तक

वस्र नेष्यत्ि- वह आज आएगा ओर कपड़ा ले जाएगा

6. अहम्‌ आ्रम्‌ आनयामि-मे आम लाता हू

. त्वम्‌ अपूपम्‌ आनयसि-तू पूडा लाता हे . सः उत्तरीयं नयति-वह दुपट्टा ले जाता हे।

9. कदा सः मसीपात्रं पुस्तक तत्र नेष्यति-वह दवात ओर पुस्तक वहोँ कब

1

छद +> @ 3

ले जाएगा

. सः सायं तत्र मसीपात्रं लेखनी नेष्यति-वह शाम को वरौ दवात ओर कलम

ले जाएगा

. त्वं रात्रो हरिदारं गमिष्यसि किम्‌-तू रात्रि में हरिदार जाएगा क्या?

. नहि, अहं श्वः मध्याहे तत्र गमिष्यामि-नहीं, मे कल दोपहर को वह जाऊंगा

. अहं गृहं गमिष्यामि सूपं भक्षयिष्यामि-मे घर जाऊंगा ओर दाल खाऊँंगा इस समय तक पाठकों के पास वाक्य बनाने का बहुत सा मसाला पर्हुच चुका

हे पूर्वं पाठ में जैसे देवः शब्द की सातों विभक्तियों के रूप दिए थे, वैसे इस पाठ मे "राम" शब्द के रूप रैँ।

("रामः शब्द के रूप विभक्तयो के नाम शब्दो के ख्प

1. प्रथमा रामः

2. दितीया रामम्‌ 3. तुतीया रामेण" 4. चतुर्थी रामाय 5. पचमी रामात्‌ 6. षष्टी रामस्य 7. सप्तमी रामे

सम्बोधन हे राम !

हिन्दी मे अर्थ राम नै)

राम को

राम के दारा राम के लिए, को राम से

राम का, की, के राममे, पर

हे राम !

देव ओर राम इन दो शब्दों के रूप यदि पाठक भली प्रकार स्मरण करेगे तो वे निम्न शब्दों के रूप बना स्वगे

यज्ञदत्त, इश्वर, गणेश, पुरुष, मनुष्य, अश्व, खग, पाठ, दीप, उदय, गण, समूह,

दिवस, मास, कण-ये शब्द देव तथा राम के समान ही चलते डे इनके रूप बनाकर थोडे-से वाक्य नीचे देते हे

` यज्ञदत्तः गृहं गच्छति- यज्ञदत्त घर जाता हे।

- ईश्वरः सर्वत्र अस्ति-ईश्वर सब स्थान पर हे। |

* हे ईश्वर ! दयां कुरु-ठे ईश्वर ! दया करो * हे पुरुष ! धर्म क्ुरु-हे पुरुष ! धर्म करो ` तत्र जश्वं पश्य- वर्ह घोडे को देख

6. अत्र दीपं पश्य-यहोँ दीए को देख ¢ सः रात्रौ दीपेन पुस्तकं पठतति-वह रात्रि मे दीए से पुस्तक पद़ता है 8. ईश्वरेण धनं दत्तमृ-ईश्वर ने धन दिया % मनुष्याय ज्ञानं देहि-मनुष्य को ज्ञान दे 10. अश्वाय जलं देहि-घोडे के लिए जल दे। 11. दीपात्‌ प्रकाशः भवति-दीप से प्रकाश होता हे। 12. ईश्वरात्‌ ज्ञानं भवति-ईश्वर से ज्ञान होता हे। 13. सः गणस्य ईश्वरः अस्ति-वह गण (समूह) का मालिक हि 1 ¢ सः समूहस्य ईशः अस्ति-वह समूह का मालिक हे। 15. पुस्तके ज्ञानम्‌ अस्ति- किताब में ज्ञान हे 16. मासे दिवसाः सन्ति-पहीने में दिन होते ईै। "7" समूहे मनुष्याः सन्ति-समूह मे मनुष्य होते है! 18. जाकाशे खगाः सन्ति-आकाश में पक्षी है। इनके निषेध के वाक्य पाठकं स्वयं बना सकते है पाठकों को चाहिए कि

वे उक्त शब्दों की अन्य विभक्तयो के सुप बनाकर उनसे भी वाक्य बनाएं ओर अपना अभ्यास क्र

वाक्य

1 तन आकाशे खगं पश्य 2. हे देवदत्त ! यज्ञदत्त कुत्र गच्छति ? 3. इदानीं यज्ञदत्तः गृह गच्छति 1 4. श्रीकृष्णस्य उत्तरीयम्‌ अत्रं आनय 5. सः तर व्यर्थं गच्छति। किमर्थ आनयति ?

60. सः पुरुषः पुष्पम्‌ पाठ 6 उपदेशकः-उपदेशक देवदत्तः-देवदत्त करोति-वह करता हे! करष्णचन्द्रः-कुष्णचन्दर करोमि-करता ह| करोषि-तू करता हे। पटः- वस्र, कपड़ा चित्नम्‌-चित्र, तस्वीर लवणम्‌-नमक पुष्यमालाम्‌-एूलों की माला को

[20

वाक््य

. रामचन्द्रः पाठशालां गमिष्यति लेख लेखिष्यति-रामचन्द्र पाठशाला जाएगा

ओर लेख लिखेगा

. सत्यकामः गृहं गमिष्यति मधुरं फलं भक्षयिष्यति- सत्यकाम घर जाएगा ओर

मधुर फल छाएगा।

. अहं वनं गमिष्यामि पुष्यमालां करिष्यामि-मे वन को जाऊंगा ओर ष्ूलों

की माला बनाजगा।

. हरिश्चन्द्रः कदा उद्यानं गमिष्यति-हरिश्चेन्द्र बाग कब जाएगा ?

5. सः श्वः तत्र गमिष्यति-वह कल वरहा जाएगा 6. देवदत्तः सर्वदा उद्यानं गच्छति पुष्पमालां करोति किम्‌-देवदत्त हमेशा बाग

जाता है ओर पुष्पमाला बनाता है क्या?

7. यदि हरिश्चन्द्धः उद्यानं गमिष्यति-अगर हरिश्चन्द्र बाग को जाएगा 8. तर्हिं देवदत्तः अपि गमिष्यति-तो देवदत्त भी जाएगा

4.

शब्द्‌ गच्छ-जा। आगच्छ-आ नय-ले जा। आनय-ले आ। धनम्‌-द्रव्य रूप्यकम्‌- रुपया वरक्षम्‌-वृक्ष को। द्रव्यम्‌-धन चुरु-कर। भक्षय-खा स्वीकुरु-स्वीकार कर देहि-दे

. एकम्‌-एकं गृहाण-ले | धोतम्‌-धुला हुआ अन्यः-दूसरा सूत्रम्‌-सूत्र।

वाक्य

त्व गृह गच्छ, धौतं वस्त्रं आनयतु घर जा ओर धोया हुआ वस्र ले आ।

* जन आगच्छ मधुरं फलं भक्षय- यहां ओर मीठा फल खा। ` चः वनं गच्छति अन्यं पुष्यं आनयति-वह वन को जाता है ओर दूसरा एूल

लाता है। एक रूप्यक देहि-एक रुपया दे।

` अन्न जागच्छ मधुरं दुग्धं गृहाण-यहँ ओर मीढ दूध ले।

|21 | | 21 |

6. उद्यानं गच्छ फलं भक्षय-बाग को जा ओर फल खा। 7. अन्यत्‌ वस्त्र देहि-दूसरा वस्त्र दे। £. अन्यत्‌ पुस्तकम्‌ आनय-दूसरी पुस्तक ले आ। 9. अपूपं देहि सूपं स्वीकुरु-पूडा दे ओर दाल ले। 10. मुद्गौदनं देहि दुग्धं तत्र नय-विचड़ी दे ओर दूध वर्हा ले जा। 11. त्र त्म्‌ आगच्छ स्वादु फलं देहि-यर्हो तू ओर मीठ फल दे 12. ओदनं भक्षय, यत्र कुत्रापि गच्छ-चावल खा ओर जरह चाहे जा।

पूर्व दो पाठो में देव" तथा “राम इन दो शब्दों की सातो विभकितियों के एकवचन के सूप दिए है एकवचन वह होता है जो एक संख्या का बोधक हो, जैसे-छत्रम्‌ (एक छता) 'छाता' शब्द से एक ही छते का बोध होता है बहुत हए तो उनको छते करेगे हिन्दी में एक संख्या के दर्शक वचन को "एकवचन कहते हे। एक से अधिक संख्या का बोधक जो वचन होता है उसको अनेक (बहु) वचन कहते है जैसे-छाता (एकवचन) छाते (अनेकवचन)। संस्कृत मेँ तीन वचन है एक संख्या बतानेवाला "एकवचन, होता है दो संख्या बतानेवाला हिवचन' कहलाता है तथा तीन अथवा तीन से अधिक संख्या बतानेवाले , को "बहुवचन" कहते है। दिवन तथा बहुवचन के रूप इस पुस्तक के दूसरे भाग में दिए गये है इस प्रथम भाग में केवल एकवचन के ही रूप दिए हँ यदि पाठक एकवचन के ही ख्प ध्यान मे रखेंगे तो वे बहुत उपयोगी वाक्य बना सकेगे। इसलिए पाठकों को चाहिए कि वे इन सपो की ओर विशेष ध्यान दे अद कुष्ठ वाक्य देते है- 1. विष्णुमित्रस्य गृहं कुत्र अस्ति-विष्णुमित्र का घर करटौ है ? £ तस्य गृह तत्र अस्ति-उसका घर वहं नहीं हे। 8. हुसैन द्रव्यं दत्तम्‌-हुतैन ने धन दिया £ यज्ञदत्तः कदा अत्र आगमिष्यति-यज्ञदत्त कब यौ आएगा 5. फलस्य बीज कुत्र अस्ति-फल का बीज कल्ल हे ? पश्य सः तत्र अस्ति-देख वह वहम नहीं हे। पर्वतस्य शिखरं रमणीयम्‌ अस्ति-पर्वत का शिखर रमणीय डे पाठे शब्दाः सन्ति-पाठ के अन्दर शब्द है। शब्दे अक्षराणि सन्ति-शब्द के अन्दर अक्षर है। 10. पुस्तक त्यक्त्वा गच्छ-किताब को छोडकर जा। | | 11. एकस्य पुस्तकम्‌ अन्यः कयं नेष्यति-एक की पुस्तक दूसरा कैसे ले जाएगा

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2. मनुष्यस्य बलं नास्ति-मनुष्य का बल नहीं है - बालकस्य मुखं मलिनम्‌ अस्ति-लडके का मुख मलिन हे

14. तस्य मुखं मलिनं अस्ति-उसका मुख मलिन नहीं है 15. राजपुरुषस्य आज्ञा अस्ति-राज्याधिकारी की आज्ञा हे।

पाठ पाठकों को उचित हे कि वे प्रतिदिन पूर्व-पाठों मेँ से भी शब्द याद किया करें

तथा वाक्यों की ओर बार-बार ध्यान दिया कर ओर आए हए शब्दों से अन्यान्य नए-नए वाक्य बनाते रहं एसा प्रयल करने से ही उनकी इस देवभाषा मेँ शीघ्र गति होगी अन्यथा नहीं अब नीचे लिखे शब्द याद कीजिए-

(रि या

कथय-कह दर्शय-दिखा, बता अस्ति-वह है। असि-तू हे। अस्ि-हू। सत्य-सच्चाई दयाम्‌-दया को सन्ध्याम्‌-सन्ध्या को आगच्छ-आ श्यणु-सुन ब्रूहि-बोल वद-कह पश्य-देख कर्म-काम, कार्य | पाठम्‌-पाठ को।

वाक्य

. सत्यं ब्रूहि-सत्य बोल . उद्यानं पश्य-वाग को देख - दयां चुरु-दया कर

सन्ध्यां कुरु-सन्ध्या कर

. सत्यकामः तन्न अस्ति-सत्यकाम वहाँ हे।

हरिश्चदः अत्र अस्ति-हरिश्चन्द्र यँ है ,

- जहम्‌ अस्मि-में हू।

- त्वम्‌ असि-तू है।

- सः अस्ति-वह हे।

- विष्णुमित्रः कुन -अस्ति- विष्णुमित्र करट हे ? ` पश्य सः तत्र अस्ति-देख, वह वहाँ है

8 ~1। चक्क ङु द्ठ (4

' तन नास्ति- नहीं नहीं, वह वर्ह नहीं है

दरार रब्द

वातायनम्‌- रथम्‌-गाडी | ` मुखम्‌-रमुह पडी पात्रम्‌-वर्तन | पिधेहि-बन्द कर उदूषाटय-खोल पिब-पी। | कपाटम्‌-1कवा- नेत्रम्‌-अलख वाक्य

५८३६ पात्रे जने जआनय-दरवाजा खोल ओर बरतन य्ह ले आ। | पिथेहि न्तं चः पिब-चिडकी बन्द कर ओर जल पी। नति तत्र नय-रथ य्ह ले ओर फल वर्हौलेजा। 8 कवं आनय बरतन य्ह ला। आनयसि-तू दूसरा वर्तन क्यो लाता है ? | 1 व, भआनयामि-मे दूसरा बर्तन नहीं लाता हू + प्रभाते गच्छ-रथ ले ओर वन को कल स्वेरे जा। = स्वीकुरु-जल दे, लड्डू ओर दूध ले।

द्‌ 4 सवादु दुग्धं अन्न - दे ओर स्वादिष्ट दूध यहा ले आ। # वहं ते पृष्पमालां तत्र नय-किवाड खोल ओर एूलों की माला जा।

खाता है? 14. नहि, अहं जा भे लड्डू ओर आम खाता ^ तिं अहं हरिदारं गमिष्यामि-अगर तू रथ ले आएगा तो भै हरिदार जाऊगा।

'स्य' ओर मार्ग" शब्द के सातो विभक्तयो के एकवचन के रूप देते

“रथः शब्द्‌ के ख्प (मार्ग शब्द्‌ कै ख्य | मारगः-मार्ग। ~. रयम्‌-रथ को। मार्गम्‌-मार्ग को।

3. रयेन-रथ द्वारा, से। मार्गेण- मार्ग दारा, से। 4. रथाय-रथ के लिए। मागय-मार्गं के लिए। 5. रथात्‌-रथ से। मागति- मार्ग से। 6. रथस्य-रथ का। मार्गस्य-मार्ग का। ध. रथे-रथ में, पर मार्गे- मार्ग में। दे) रथ !-हे रथ ! ढे) मार्ग !-हे मार्ग ! शब्द्‌

इसी प्रकार राम, बालक, मृग, सर्प, सूर्य, आनन्द, आकार, कुमार, लेख, दण्ड इत्यादि अकारान्त पुल्लिंग शब्द चलते हैँ जिन शब्दों के जन्त मे अकार का उच्चारण होता है, उनको अकारान्त शब्द कहते हँ अब कुछ अकारान्त शब्द देते है, जिनके रूप देवः या “रामः शब्दों के समान ही होते हे।

इन्द्रः-राजा, प्रमुख जर्भकः- लड़का ग्रामः-र्गोव। चरणः-पेर नुपः-राजा प्रसादः- मेहरबानी मूषकः- चूहा | रक्षकः-पहरेदार रसः-रस। वत्सः-लडइ़का वासः-रहने का स्थान वृक्षः-दरणत समुद्रः-समुद्र, सागर सर्पः- सोपि स्वरः-आवाज्‌ आचार्यः- गुरु चोरः-चोर जनः-लोक पुत्रः-बेटा वेदः-वेद्‌, ज्ञान दण्डः-सोटी मनुष्यः- मनुष्य वाक्य

1. अर्भकः रथं पश्यति-लडका गाडी देखता हे 2. नृपः चोरं ताडयति-राजा चोर को पीटता हे।

3. सः स्थेन अन्यं ग्रामं शीघ्र" गच्छति-वह रथ से दूसरे ग्राम को जल्दी जाता हे।

4. वृक्षात्‌ फलं पतति-पेड से फल गिरता हे 5. समुद्रात्‌ जलम्‌ आनयति-समुद्र से पानी लाता है।

1. शीप्र-जल्दी। 23

6. आचार्यः धर्मस्य मार्गं शिष्याय, दर्शयति-गुरु धर्म का मार्ग शिष्य लिए दशति हे। 7. तस्य वासः तत्र भविष्यति-उसका वरहा रहना होगा 8. चौरः धनं चोरयति-चोर धन चुराता है। 9. नृपः जनानू रञ्जयति-राजा लोगों का रंजन (समाधान) करता हे। 10. इन्रः स्वर्गस्य राजा.अस्ति-इन्द्र स्वर्ग का राजा हे

अब कुछ वाक्य नीचे देते हैँ जिन्हें पाठक स्वयं समडञ सकेगे-

1. पुत्रः रसं पिवति 2. वत्सः रयं पश्यति। 3. सः मार्गेण गच्छति। £. किं सः रथेन ग्रामं गमिष्यति। 5. यज्ञमिन्ः कदा तत्र गमिष्यति 6. रये नुषः उपविष्ट" 7. मनुष्येण लेख लिखितः 8. आचार्यः कदा आगमिष्यति 9. मनुष्यः '

मूषकं ताडयतिः 10. मार्गे तस्य पुस्तकं पतितम्‌” 11. यथा त्वं गच्छति तथा रामक्रष्णः अपि गच्छति 12. यया त्वं वदसि तया सः वदति। 13. त्वं किमर्थं फलं भक्षयसि 14. सः इदानीं नैव गरामं गमिष्यति 15. यया नुषः अस्ति तथा एव विप्रः अस्ति। 16. यदा आचार्यः तत्र गमिष्यति तदा एव त्वं तत्र गच्छ 17. तस्य पुरः पात्रेण जलं पिवति। 18. यः पात्रेण जलं पिबति सः तस्य पुत्रः नास्ति। ` 19. तर्हिं कः सः। 20. सः आचार्यस्य पुत्रः अस्ति।

पाठ 8 शब्द

श्रवणाय-सुनने के लिए। दर्शनाय-देखने के लिए। गमनाय-जाने के लिए। शयनाय-सोने के लिए। क्रीडनाय-खेलने के लिए। पठति-वह पटृता है। पठसि-तू पट़ता है, पठमि-पटृता हू पठ-पट्‌ स्नानाय-स्नान के लिए। पानाय-पीने के लिए। भोजनाय--भोजन के लिए। भक्षणाय-खाने के लिए। पठनाय-पदट्ने के लिए। परिष्यति-वह पठगा पटिष्यसि-तू पगा पटष्यामि- पर्टूगा लिख-लिख

1. शिष्याय-शागिर्द 2. पिवति-पीता है। 3. उपविष्टः-ैठा है। 4. लिखितः-लिखा है। 5. ताडयति-पीटता है। 6. परतितम्‌-गिरी है।

अकारान्त पुल्लिग शब्द

लेखः-लेख पाठः-पाठ।

देत्यः-राक्षस पान्थः- मुसाफिर अर्थः-पेसा, धन करः-हाथ।

कर्णः-कान चन्दः-र्चोद विप्रः-त्राह्मण। सूर्यः-सूरज।

दीपः-दीप, दीया जनः- मनुष्य समाजः-समाज मृगः-हिरण

वानरः- बन्दर अस्ताचलः-सूर्य जहो इूबता है वह दिवसः-दिन। पश्चिमी दिशा का पहाड़ स्वर्गः-स्वर्ग यत्नः-प्रयत्, पुरुषार्थ क्ुमारः- लड़का पादः-पांव।

वेदः-राजा, विद्वान्‌ पाठकों को चाहिए कि वे इनके सातो विभक्तियों के रूप देव" ओर रामः शब्दों के समान बनाएं 1. स्नानाय जलं देहि-स्नान के लिए जल दे। . पठनाय पुस्तकम्‌ अस्ति-पट्ने के लिए पुस्तक हे . भोजनाय अन्नं भविष्यति किमू-भोजन के लिए अन्नदहोगा क्या? . भक्षणाय फलं देहि-खाने के लिए फल दे। . तत्र सूर्य पश्य- वहाँ सूर्य को देख . विष्णुमित्रः कुमारम्‌ अत्र किमर्थम्‌ जआनयति- विष्णुमित्र लड़के को यहाँ किसलिए लाताहि? 7. हरिश्चन्द्रः अग्नि तत्र नेष्यति किम्‌-हरिश्चन्द्र क्या आग को वरह ले जाएगा ? 8. पठनाय दीपं पुस्तक अत्र आनय-पदृने के लिए दीपक ओर पुस्तक यहौँ ले आ। - 9. प्रातः स्नानाय गच्छामि-सवेरे स्नान के तिए जाता हू! 10. पानाय मधुरं दुग्ध देहि-पीने के लिए मीठा दूध दे। 11. अत्र स्वादु दुग्धम्‌ अस्ति-यर्हौ स्वादिष्ट दूध है। 12. कि स्वादु दुग्धम्‌ अत्र नास्ति-क्या स्वादिष्ट दूध यँ नहीं है ? 13. स्नानाय जलं नय-स्नान कं लिए जल ले जा।

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शब्द

किमूर्थम्‌-किसलिए। अधुना-अब। पश्चात्‌-वाद में पूर्वम्‌-पहले। शीप्रम्‌-जल्दी कुत्वा-करके गत्वा-जा करके दत्वा-देकर भक्षयित्वा-खाकर। विचार्य-सोचकर किमर्थम्‌-किसलिए। इदानीम्‌-अब सत्वरम्‌-शीप्र, जल्दी एव-ही परन्तु-परन्तु, लेकिन स्नात्वा-स्नान करके परित्वा-पटृकर नीत्वा-लेकर दृष्ट्वा-देखकर विलोक्य-देखकर वाक्य

- तत्र जलं पीत्वा शीघ्रम्‌ अत्र आगच्छ-वर्हां जल पीकर जल्दी यहाँ . स्नानाय जलं दत्वा सत्वरम्‌ उद्यानं गच्छ-स्नान के लिए पानी देकर शीघ्र बाग

कोजा।

त्वम्‌ इदानीं पठसि परन्तु अहं पठामि-तू अब पठता हे परन्तु मे नहीं पठता विष्णुमित्रः कर्मं कृत्वा स्नानं करिष्यति- विष्णुमित्र काम करके स्नान करेगा त्व पूर्व गृहं गत्वा पश्चात्‌ स्नानं कुरु-तू पहले घर जाकर बाद में स्नान कर त्र स्नानाय जलम्‌ अस्ति किम्‌-क्या वर्ह स्नान के लिए जल हि?

तन स्नानाय जलं नास्ति परन्तु जत्र अस्ति- वहा स्नान के लिए जल नहीं है परन्तु य्ह हे।

देवदत्तः भोजनं भक्षयित्वा पाठशालां गमिष्यति-देवदत्त खाना खाकर पाठशाला को जाएगा।

- त्वं पठित्वा शीघ्रम्‌ आगच्छ मसीपात्रं देहि-त्‌ पटृकर जल्दी ओर दवात दे 10.

11. 12.

मोदक भक्षयित्वा त्वं कुत्र गमिष्यसि-लड्दू खाकर तू करौ जाएगा ? मोदक शीघ्रं भक्षय पश्चात्‌ जलं पिब-लडूड्‌ जल्दी खा, फिर पानी पी। प्रातः वन गत्वा सायम्‌ आगमिष्यामि-सवेरे वन को जाकर शाम को आरजगा।

अकारान्त पुल्लिंग शब्द

अपराधः-कसूर उपायः-उपाय। पर्वतः-पहाड। ज्वरः-बुखार

कामः-इच्छा, कामवासना विनयः- नम्रता

भृत्यः-नोकर गुणः-गुण

मोहः- संशय, भूल विहगः- पक्षी धूमः--धुओंं समागमः- सहवास, भेट सम्मानः-मान, आदर लोभः-लालच

बुधः- ज्ञानी कासारः- तालाब सङ्ग-मुहव्वत, साथ योधः-लडनेवाला, शूर मनोरथः-इच्छा सेनिकः-फ़ोजी आदमी

इन शब्दो के रूप देव" तथा ^राम' के समान बनते है पाठकों को चाहिए कि वे इनके सातो विभक्तयो के एकवचन के रूप बना अब इनके रूप बनाकर कषठ वाक्य देते है- 1. तेन अपराधः कृतः-उसने अपराध किया। . सः पर्वतस्य उपरि गतः-वह पहाड़ कं ऊपर गया . सः बुधः सायम्‌ अत्र आगमिष्यति-वह ज्ञानी शाम को यहां आएगा . एकः विहगः वृक्षे अस्ति तं पश्य-एक पक्षी दरख्त पर है, उसको देख . भृत्यः तत्र गतः-नोकर वहो गया | . मम पुत्रः अधुना पुस्तकं पठति-मेरा लडका अब किताब पठता हे। . योधः युद्धं करोति-योद्धा लड़ाई करता हे। . सेनिकः तत्र अस्ति-फ़ीजी वर्ह नहीं हे . सः ज्वरेण पीडितः अस्ति-वह बुखार से पीडित हे। 10. गुणः सम्मानाय भवति-गुण आदर के लिए होता है। 11. कुमारस्य पुस्तक कुत्र अस्ति, दर्शय-लडइके की किताब कहो है, दिखा 12. बुधस्य समागमेन तेन ज्ञानं प्राप्तम्‌- ज्ञानी के सहवास से उसने ज्ञान प्राप्त किया अब नीचे एेसे वाक्य देते जो कि भाषान्तर बिना ही पाठक सम्ञ जागे- (1) त्वम्‌ इदानीम्‌ किं तत्‌ पुस्तकं पठसि ? (2) तत्र स्नानाय शुद्धं जलम्‌ अस्ति (3) तव भृत्यः कुत्र गतः ? (4) मम भृत्यः आपणं गतः (5) किमर्थं आपणं गतः ? (6) सः फलम्‌ अन्नं आनेष्यति। (7) अहं फलम्‌ अन्नं भक्षयितुम्‌ इच्छामि (8) सः मोदकं भक्षयित्वा पाठशालां पठितुं गतः (9) सः दिने दिने प्रातः स्नानं कृत्वा वनं गच्छति (10) सः तत्र किं करोति ? (11) सः वनं गत्वा सन्ध्यां करोति (12) नृपः अत्र आगतः (13) बुधः इदानीम्‌ एव तत्र गतः (14) तस्य मनोरथः उत्तमः अस्ति। (15) सः स्नानाय कासारं गच्छति (16) तत्र कासारस्य जल स्वादु अस्ति। (17) तत्र कूपस्य जलं स्वादु नास्ति अब हिन्दी के निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में भाषान्तर कीजिए- 29

८2 @ ~ @ ^> @ 1

तू अव पदता है, परन्तु मै नहीं पट़ृतौ (7)

(1) स्नान के तिए जल दे। (2 खाने के लिए अनन दे। (8) हरिश्चन्द्र करा

जाता है ? (4) हरिश्चन्द्र गोव को जाता है। (5) पीने के लिए मीटा दूध दे। (&)

वहा स्नान के लिए जल है या नही (8) उसका मनोरथ उत्तम है। (9) वह तालाव के पास स्नान लिए जाता हे। (10) तेरे कुँ का जल मीव हे।

पाठ 9

शब्द शिष्यः-शिष्य, पटृनेवाला। ; कृपा- दया, मेहरबानी दासः-नोकर स्वसा- बहिन भानुः- सूर्य माता-्मो। गुरूः-पट़ानेवाला पिता-पिता, बाप। बन्धुः-सम्बन्धी। भगिनी-बहिन पुत्रः-पुत्र, लडका तुभ्यम्‌-तेरे लिए। तवते-तेरा। मृद्यम्‌-मेरे लिए। मम-मेरा। ततमे-उसके लिए। तस्य-उसका अस्मे-इसके लिए

वाक्य

1. तव गुरुः कुत्र अस्ति-तेरा गुरु काँ है ?

2. इदानीं मम गुरुः तत्र अस्ति-अव मेरा गुरु वहाँ है

8. मम माता अद्य सायं वनं गमिष्यति-मेरी माता आज शाम को वन जाएगी 4. अधुना मद्यं पठनाय पुस्तकं देहि-अव मुञ्ञको पदरने के लिए पुस्तक दे। 5. तस्य गृहं कुत्र अस्ति-उसका घर कँ हे ?

6. तव दासः ग्रामं गमिष्यति किम्‌ ?-तेरा नौकर गौव को जाएगा क्या ? 7. तव पुत्रः कदा वनं गमिष्यति-तेरा पुत्र कब वन को जाएगा ?

8. मम वन्धुः इदानी पुस्तक पटति-मेरा सम्बन्धी अब पुस्तक पटृता हे। 9. मम माता पुष्पमालां करोति-मेरी माता पुष्पमाला बनाती हे।

10. तव पिता तव माता-तेरा पित्ता ओर तेरी माता।

11. पानाय मद्यं जलं देहि-पीने के लिए मुञ्चे पानी दे।

12. स्नात्वा सायम्‌ आगमिष्यति-स्नान करके शाम को आएगा

13.

08

नहि, नहि, सः ग्रामं गत्वा रात्रो आगमिष्यति- नहीं, नहीं, वह गोवि जाकर राति को आएगा

शब्द इच्छति-वह चाहता हे लिखति-वह लिखता इहे इच्छसि-तू चाहता हे लिखसि-तू लिखता है इच्छामि-में चाहता हू लिखामि- में लिखता हू पत्रम्‌-पत्र कूपम्‌-कु्जो शुद्धम्‌-शुद्ध, साफ़ ओषधम्‌-ओषध, दवा मार्गः- मार्ग, रास्ता उत्तरीयम्‌-दुपट्टा कर्तुम्‌-करने के लिए। लेखितुम्‌-लिखने के लिए भोक्तुम्‌-खाने के लिए स्वीकर्तुम्‌- स्वीकार करने के लिए दातुम्‌-देने के लिए। गन्तुम्‌-जाने के लिए। भक्षयितुम्‌-खाने के लिए। आगन्तुम्‌-आने के लिए पातुम्‌-पीने के लिए। नेतुम्‌-ले जाने के लिए। पठितुम्‌-पट्ने के लिए। आनेतुम्‌-लाने के लिए। वाक्य - रामचन्दः पुस्तक पठितुम्‌ इच्छति-रामचन्दर पुस्तक पटने की इच्छा करता हे। शुद्धं जलं पातुम्‌ इच्छति-हरिश्चन्द्र शुद्ध जल पीने की इच्छा करता

अहं कूपं गत्वा स्नानं कर्तुम्‌ इच्छामि-में कुँ पर जाकर स्नान करना चाहता

हू

- त्वं श्वः प्रातः स्नानं करिष्यसि किम्‌-क्या तू कल प्रातः स्नान करेगा 7 नहि, अहं श्वः प्रातः स्नानं कर्तुम्‌ इच्छामि-नही, मै कल सवे स्नान करना

नहीं चाहता

- यदि प्रातः करिष्यसि तर्हिं कदा करिष्यसि-अगर सवेरे नहीं करेगा तो कब

करेगा ?

- सायं करिष्यामि-शाम को करूंगा

त्वम्‌ इदानीम्‌ पठितुम्‌ इच्छसि किम्‌-क्या तू अब पटना चाहता है ? - नहि, इदानीम्‌ अहं फलं भक्षयितुम्‌ इच्छामि- नहीं, अव मँ फल खाना नहीं

चाहता

किवे

[रं |

@ ® ~ग @ छर $ &

अकारान्त पुल्लिग शब्द

अलंकारः-जेवर्‌ दण्डः-सोटा। छात्रः-शिष्य ब्राह्मणः त्राह्मण व्याधः-शिकारी स्तेनः- चोर स्नेहः-दोस्ती वर्णः-र्ग कपोलः-गाल चातकः-पपीहा तरड्गः-लहर (पानी की) दिरेफः- भ्रमर, भंवरा नयनम्‌-ओंखि नेत्रम्‌-ओंख प्रवाहः-वेग। शक्रः-इन्द्र आतपः-धूप उद्यमः-उद्योग पुरुषार्थः-प्रयल उपदेशः-उपदेश ओष्ठः-ओठ कुक्कुरः कुत्ता

इन शब्दों के रूप “राम, ओर "देव" शब्दों के समान ही होते है पाठकों को चाहिए इनक सातो विभक्तयो के रूप बनाएं ओर उनका वाक्यों में प्रयोग करे

वाक्य

ष. भु हस्ते अलङ्कारः धृतः-उसने कान मेँ ओर हाथ में जेवर धारण या हे।

मिन्ेण हन्ते श्वेतः दण्डः धृतः-मित्र ने हाथ मँ सफेद सोटी पकड़ी है। मारेण मुखे हस्तः धृतः-लड्के ने मुख मे हाथ डाला ह।

क्ष्णः हस्तेन रामाय फलं ददाति-कृष्ण हाथ से राम के लिए फल देता है। भन्र नलस्य प्रवाहः अस्ति-यँ जल का वेग हे

तः पुरुषः आतपे तिष्ठति-वह व्यक्ति धूप मेँ खडा ह।

हे मित्र, जलस्य तरङ्गं पश्य-दोस्त ! जल की लहर को देख

सः सदा उदयम करोति-वह हमेशा पुरुषार्थं करता हे।

आचार्यः उपदेशं करोति-गुरु उपदेश देता डे।

- जनः मुखेन वदति-पुरुष गुह से बोलता हे।

कमारः व्याघ्रं ताडयति-लड़का शेर को पीटता

- तस्य कुक्कुरः अन्नं भक्षयति-उसका कुत्ता अनन खाता हे। लोकः नेत्राभ्यां पश्यति-मनुष्य ओंखों से देखता हे।

* मनुष्यः कणभ्यां शृणोति-मनुष्य कानों से सुनता हे

. छात्रः प्रातर्‌ अध्ययनं करोति- विद्यार्थी सवेरे पठन करता हे।

अब कुष्ठ वाक्य नीचे देते हैँ जिनको पाठक पटृते ही समञ्ञ जार्णँगे उनका हिन्दी में भाषान्तर देने की जरूरत नहीं

1. तेन कर्णयोः अलङ्कारः धृतः 2. भृत्येन हस्ते दण्डः धृतः 3. कुमारेण हस्ते मोदकः धृतः 4. केशवदत्तः धनञ्जयाय धनं ददाति 5. मनुष्यः कणभ्यां णोति

नेत्राभ्यां पश्यति

निम्न वाक्यों की संस्कृत बनाइए- 1. लडका शेर को पीटता है। 2. मेरा भाई अब याँ नहीं हे

पार 10 शब्द

ज्ञानम्‌- ज्ञान विद्या दानम्‌-दान जानामि- पै जानता हू। जानासि-त्‌ जानता हे। जानाति- वह जानता हे ज्ञात्वा-जानकर विज्ञाय-जानकर जातः-हो गया भो मित्र-हे मित्र! उत्तिष्ठ-उठ। व्यायामम्‌-व्यायाम को प्रक्षालनम्‌-धोना उत्यानम्‌-उटना ददामि-देता हू

ददासि-तू देता है ज्ञातुम्‌- जानने के लिए। शोचम्‌-शौच, टट्टी भोजनम्‌-भोजन

ददाति-वह देता रे प्रातःकालः- सवेरा मुखप्रक्षालनम्‌- मुह, धोना कुतः-क्यो, कर्हा स।

वाक्य

1. भो मित्र ! पश्य, प्रातःकालः जातः-हे मित्र ! देख, सवेरा हो गया 2. उत्तिष्ठ ! शोचं कृत्वा शीघ्र स्नानं कुरु-उट ! शौच करके जल्दी स्नान

कर्‌

8. अह शोचं कुत्वा मुखप्रक्षालनं करिष्यामि-मे शोच करके मुँह धोऊगा 1 4. पश्चात्‌ स्नानं कृत्वा सन्ध्यां करिष्यसि किम्‌-फिर स्नान करके सन्ध्या करेगा

क्या?

5. नहि, अहं पश्चात्‌ व्यायामं कृत्वा स्नानं कर्तुम्‌ इच्छामि-नहीं, मे बाद मे व्यायाम

रके स्नान करना चाहता हू

[ॐ।

=== ~:

| |

स्थास्यति- वह ठ्हरेगा, वैठेगा |

त्यातुम्‌-रहरने के लिए। स्वास्यामि-ठहरगा, वरटूगा उत्तिष्ट-उट।

@० “~ @ ।‡> 3 4

` तथा कुरु-वैसा कर्‌। ` लान सन्ध्या कृत्वा पुस्तक पटिष्यामि- स्नान ओर सन्ध्या करके पुस्तक

पटृगा

* भो मित्र ! किं तवं परात्‌ अग्निहोत्रं करोषि-हे मित्र ! क्या तू सवेरे अग्निहोत्र

नहीं करता? `

` छतः करोमि, सदा करोमि एव- क्यों नहीं करता ? हमेशा करता हू। * पर्चात्‌ मध्याहे किं किं करिष्यसि-फिर दोपहर को क्या-क्या करेगा 2

भोजनं कृत्वा पटनाय पाटशालां गच्छामि-भोजन करके पटने के लिए मेँ पाठशाला जाता ह|

` अहं सर्वदा पुस्तकं पटितुम्‌ इच्छामि हमेशा पुस्तक पदा चाहता शब्द्‌ प्रमणाय--पूमने के लिंए। दानाय-देने के लिए। -किसलिए। तिष्टति-ठहरता है, वैठता है च्‌. ठता ह, वैठ्ता है। तिष्टामि- ठहरता हु वेता हूं।

तिष्ट-टहर, वैठ। रक्तम्‌-लाल या घ्ून। स्थित्वा-टहरकर, बैठकर स्थास्यति-तू ठहरेगा, वैठेगा अथ किम्‌-ओर क्या ? उत्यितः-उठा हुञआ।

:-ठहरा हुआ। :-पीला |

वाक्य

* भत्र त्वं किमर्थं तिष्ठसि, वद-यहो तू किसलिए ठहरता है, वता

इदानीम्‌ अत्र विष्णुमित्रः आगमिष्यति-अव यतँ विष्णुमित्र आएगा

* पश्चात्‌ कि करष्यसि- (त्‌) इसके वाद क्या करेगः ?

- सायं भ्रमणाय अहं गमिष्यामि-शाम को घूमने के लिए जाङ्गा।. धनं किमर्थम्‌ अस्ति-धन किस प्रयोजन वै लिए है?

. धनं दानाय एव अस्ति-धन दान के लिए दही है। | * उद्यानं गत्वा तत्र स्थातुम्‌ दच्छामि-वाग जाकर वँ वैटना चाहता हू। * तत्र स्थित्वा कि करिष्यसि वर्ह वैवकर तू क्या करेगा ?

9. पुस्तक पितुं पत्र लेखितुम्‌ इच्छामि- पुस्तक पटना ओर पत्र लिखना चाहता हू 10. इदानीम्‌ एव उद्यानं गच्छ रक्तं पुष्यं आनय-अभी वाग जा

जा ओर लाल टूल ले जा।

11. पीतं पुष्पं आनय-पीला प्टूल ला।

12. ज्र शुद्धं जलम्‌ अस्ति- शुद्ध जल हे

13. किमर्थं स्नानम्‌ इदानीम्‌ एव करोषि-स्नान अभी क्यों नहीं करता ? 14. इदानीम्‌ एव स्नानं कर्तुं इच्छामि-अभी स्नान करने की मेरी इच्छा नहीं

अकारान्त पुल्लिग शब्द

अक्षः-पांसा, जुजा अनर्थः-कष्ट, दुःख ग्रन्थः पुस्तक प्रभवः--उत्पत्ति पार्थिवः- राजा विन्ध्यः-एक पर्वत श्ुगालः- गीदड कपोतः -कवबूतर्‌ मेषः-वादल सिंहः-शेर।

आश्रमः- आश्रम, रहने का स्थान कोपः- क्रोध, गुस्सा तापः-गर्मी। दुर्गः-क्रिला

वरः- वर, इष्ट वायसः-कीवा | शुकः-तोता देहः- शरीर नागः-सांप। याचकः-्मोगने वाला। जनकः-पिता। सेनिकः- सिपाही

इन शब्दों के रूप भी देव" ओर "रामः शब्दों के समान होते है पाठक इनके रूप सब विभक्तियों मे बना सकते है।

वाक््य

पाठक इन वाक्यों को पट़ते ही समञ्ञ जाएँगे, इसलिए उनके अर्थ नहीं दिए

1. तेन बुधेन ग्रन्थः लिखतः 2. पर्वते सिंहः अस्ति 3. नगरे अद्य नृपः आगतः 4. सः सेनिकः दुर्ग गमिष्यति 5. याचकः मार्गे तिष्ठति 6. तस्य जनकः गृहे तिष्ठति 7 तस्य पुत्रः पाठशालां गतः 8. आकाशे मेषः अस्ति। 9. पार्थिवः युद्धं करोति | 10" तपस्य प्रसादेन तेन धनं प्राप्तम्‌ 11. तेन मित्रस्य गृहात्‌ पुस्तकं आनीतम्‌ - 1: तः वनस्य मार्गं पश्यति। 13. आकाशे सूर्यः अस्ति 14. वने वृक्षः अस्ति 15. वृक्षे खगः अस्ति।

परीक्षा

पाठकों को चाहिए कि वे इन प्रश्ना के उत्तर देकर आगे वटुं अगर ठीक उत्तर दे सके तो पहले दस पाठ दुवारा पटं

(1) निम्न शब्दों के सातां विभक्तियों के एकवचन रूप लिखिए-

ग्राम चरण देव नृप मार्ग रक्षक राम वृक्ष दुर्ग ग्रन्थ आश्रम अनर्थ

(2) निम्नलिखित श्यो का पंचमी तथा षष्ठी का एकवचन लिखिए इस प्रकार

का उत्तर अतिशीघ्र लिखना चाहिए-

नाग पर्वत देह दिन कपोल कृष्ण सिंह लोभ विनय धनिक खल समागम

(3) निम्नलिखित वाक्यों के अर्थं कीजिए-

(1) त्वं श्वः प्रातः स्नानं करिष्यसि किम्‌ ? (2) त्वम्‌ इदानीं पटितुम्‌ इच्छसि किम्‌ ? (3) अहं कासारं गत्वा स्नानं कर्तुम्‌ इच्छामि (4) त्वं तं रथम्‌ आनय (5) न्यत्‌ पुस्तकम्‌ आनय (6) मुदूगोदनं याचकाय देहि याचकः तत्र मार्गे तिष्ठति तं पश्य। (7) अत्र त्वं शीघ्रम्‌ आगच्छ (8) सः सायं तत पुस्तकं नेष्यति। (9) कदा सः आगमिष्यति ? (10) सः श्वः प्रभाते आगमिष्यति

(4) निम्न वाक्यों के संस्कृत वाक्य वनाइए-

(1) वह दुपटूटा ले जाता हे (2) मै कल दोपहर को जाऊँगा (8) लइ्ड्‌ जल्दी खा ओर फिर पानी पी ले (4) देवदत्त भोजन खाकर पाठशाला को जाएगा

(5) तू अब पढ़ता है, परन्तु नहीं पटृती। (6) वाग को जा ओर फल खा। (7) तूघर नजा ओर धोया हज वस्त्र ले आ।

पाट 11

अब दस्‌ पाठ हो चुके है इतने थोडे समय मेँ पाठक बहुत-से वाक्य बनाने

मे समर्थ हो चुके होगे वे अगर धैर्य से ओर वाक्य बनाते जार्पेगे, तो उनकी संस्कृत

मँ बातचीत करने की शवितति स्वयं बदृती जाएगी संस्कृत भाषा की वाक्य-रचना

अ्ुत्तम है अंग्रेजी तथा उर्दू के समान शब्दों को निश्चित स्थान पर रखने की . आवश्यकता नही, देखिए-

जह मोदकं ॒भक्षयामि। अहं भक्षयामि मोदकम्‌

मोदक भक्षयामि अहम्‌। मोदकं अहं भक्षयामि

भक्षयामि अहं मोदकम्‌। भक्षयामि मोदकम्‌ अहम्‌

ये सब वाक्य शुद्ध है ओर इन सबका अर्थ “भे लड्डू खाता है" ही इसीलिए पाठकों को चाहिए कि वे सीखे हुए शब्दों को यथासम्भव उपयोग में नए-नए वाक्य वना अब इस पाठ में कोट नया शब्द नहीं दिया जा रहा पाठक आज कोई नया शब्द याद करं ओर पिछले पाठो मे से कोई वाक्य या शब्द भूल गये हो तो उसको टीक-टीक स्मरण करें इस पाठ में पाठकों को एेसे वाक्य दिए जार्फैँगे जिनके शब्दों का प्रयोग पहले हो चुका हे यहाँ एक बात स्मरण रखनी चाहिए कि मनुष्यों के नाम राक्य मेँ आने से संस्कृत मे कोई नई रचना नहीं होती देखिए- रामचन्द्रः वनं गच्छति-रामचन्द्र वन को जाता है। विलियमः वनं गच्छति-विलियम वन को जाता है। मुहम्मदः वनं गच्छति- मुहम्मद वन को जाता हे। अर्थात्‌ वोलने के समय पाठक चाहे जिसका नाम वाक्य में रखकर अपना आशय प्रकट कर सकते हे। संस्कृत भाषा मे दूसरी आसानी यह हे कि लिंग कं अनुसार शब्दों की विभक्त्या इसमें नहीं बदलतीं जिस अवस्था में बदलती है उस का वर्णन हम आगे करेगे ट्स समय पाठक यही समद्चे कि नहीं बदलती देखिए- तस्य लेखनी-उसकी लेखनी तस्य पुस्तकम्‌-उसकी किताव तस्य फलम्‌-उसका फल तस्य पुत्रः-उसका लड़का पाठक देखेंगे कि हिन्दी में “उसकी, उसका शब्दों मे जिस कारण "की, का यह भेद हुआ है, वैसा कोई भेद संस्कृत में नहीं हे इस कारण संस्कृत के वाक्य बनाना हिन्दी मे वाक्य बनाने से सुगम हे।

वाक्य 1 अद्य गृह गन्तुं किमर्थम्‌ इच्छसि-तू आज घर जाने की क्यों इच्छा करता |

2 अद्य मम पिता गृहम्‌ आगमिष्यति-आज मेरा पिता घर आएगा

8. सः कदा आगमिष्यति, त्वं जानासि किम्‌-वह कब आएगा, तू जानता हे क्या ?

4 नहि जहं जानामि, परन्तु सः रात्रो आगमिष्यति-नहीं, मे नहीं जानता, परन्तु वह रात्रि में आएगा

5. जानसनः इदानीं किं करोत्ि-जानसन अब क्या करता है ?

6. सः पत्रं लिखति-वह पत्र लिखता हे।

दीवानचन्दः धतं वस्त्रम्‌ आनयति-दीवानचन्द्र

रामकृष्णः इदानीं दीपं कुत्र नयति-रामकृष्ण

सः पठनाय दीपं

जाता हे।

` कस्य पुस्तकम्‌ अस्ति-किसकी पुस्तक है ?

* मम पुस्तकम्‌ अस्ति-मेरी पुस्तक है।

` तव वस्रं नास्ति किम्‌-तेरा कपड़ा नहीं है क्या ?

- सत्वरम्‌ अत्र आगच्छ, पीतं पुष्प पश्य-शीप्र यहाँ ओर पीला ्ूल देख पूरय पाठो के अकारान्त शब्दों मेँ रूप बनाने का प्रकार वताया गया है। अव

धोया हुजा कपड़ा लाता ह। कष्ण जब दीया करट ले जाता है? पुस्तक नयति-वह पट़ने के लिए दीया ओर पुस्तक ले

इकारान्त पुल्लिंग शब्दों के रूप वनाने का प्रकार वताते हे

1“ =

इकारान्त पुल्लिग “रविः शब्द 1. प्रथमा रविः

रवि (सूर्य) 2. दितीया रविम्‌ रवि को 8. तृतीया रविणा रवि से (दारा) 4. चतुर्थी रवये रवि के लिए 5. पञ्चमी रेः रवि से ` 6. षष्ठी रवेः रवि का, की, के 7. सप्तमी रवी रवि में, पर सम्बोधन दे) खे हे रवि अग्नि, अरि, अहि, उदधि, कवि इत्यादि इकारान्त पुल्लिंग शब्द भी इसी प्रकार चलते रै शब्द्‌ अग्निः-आग। जअहिः-सप। अरिः-शवु। उदधिः- समुद्र कविः-कवि। वहस्पतिः-देवताओं का गुरु पतत्रिः-पक्षी। कपिः-वन्दर्‌ | शनिः-शनि, तारा नृपतिः-राजा। पाणिनिः-व्याकरणाचार्य। गिरिः-पहाड

^रवि' शव्द के समान ही इनके एकवचन के रूप होते है।

वाक्य

1. रविः आकाशे आगतः- सूर्य आकाश में गया। वालकः रविं पश्यति-लड़का सूर्य को देखता हे रविणा प्रकाशः क्रतः-सूर्य ने रोशनी की रवये नमः क्ुरु-सूर्य को नमस्कार कार रवेः प्रकाशः भवति-सूर्य से प्रकाश होता डे। रवेः प्रकाशं पश्य-सूर्य का प्रकाश देख . रवो प्रकाशः अस्ति-सूर्य में प्रकाश ह। अव नीचे कुछ एसे वाक्य होते है, जिन्हे पाठक आसानी से समञ्ञ जार्पैगे उनका हिन्दी में अर्थ देने की आवश्यकता नीं

1. त्र अग्निः अस्ति 2. नरेन्दः अग्निम्‌ अत्र आनयति 1 3. दिष्णुमित्रः अग्निना जलम्‌ उष्णं' करोति 4. नृपतिः अरिणा सहः युद्धं करोति 5. कवेः काव्यः पठामि 6. तं हिमगिरि" पश्य 7. हिमगिरेः गङ्गा प्रभवतिऽ 8. कपिः वृक्षे अस्ति, तं पश्य, कथं सः मुखं करोति 9. तस्य मुखः कृष्णः” अस्ति 10. वृहस्पतिः आकाशे उदितः 11. हिमगिरो मेः जगतः 12. उदधौ जलम्‌ अस्ति 13. तत्र अहिः अस्तिः अतः तत्न गच्छ 14. पाणिनिना व्याकरण रचितम्‌» 15. पतत्रि: आकाशे गच्छति

16. पश्य, कथं सः पत्रिः आकाशे गच्छति 17. यथा पतनः आकाशे गच्छति ? तथा कपिः गच्छति

निम्न हिन्दी वाक्यों के संस्कृत-वाक्य बनाइए-

1. तू जव क्या पठता है ? 2. तेरा नौकर कँ गया ? 3. भँ बाजार जाता ह। 4. मे फल ओर अनन खाना चाहता हू। 5. राजा गया 6. ज्ञानी अभी वहं गया। 7. मेरे कुएं का पानी मीठा है। 8. वह बाग मे जाकर संध्या करता हे। 9. मोदक खा ओर पानी पी। 10. देख, लड़का कैसा दौडता हे !

०.

1* उल्नम्‌-गरम। 2. सह-साथ। 8. काव्यम्‌-कविता पुस्तक 4. हिमगिरिं-हिमालय 5. प्रभवति--उत्पन्न होता है 6. कृष्णः-काला। 7. उदितः-उदय हुआ 8. व्याकरणम्‌- 39 व्याकरण (ग्रामर)। 9. रचितम्‌-रचा। |

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पाट 19

शब्द धावनम्‌-दौडना स्वीकरणम्‌-स्वीकार करना धावति-वह दौडता है। धावसि-तू दौडता रै धावामि-दौडता हू! इच्छया-इच्छा से अन्तरिभि-आकाश में। नगरे-शहर मेँ शीतम्‌-टण्डा। रचनम्‌-रचना

भ्रमणम्‌-घूमना। पश्यसि-तू देखता हे

धूप्रयानेन-रेलगाड़ी से। पश्यामि-देखता हू बुभुक्षा-भूख पिपासा-प्यास। उष्णम्‌-गरम

वाक्य

1. सः इच्छया स्वीकरिष्यति-वह इच्छा से स्वीकार करेगा 2. प्रकाशदेवः उद्याने व्यर्थं धावति-प्रकाशदेव बाग मेँ व्यर्थं दौडता है। 3. त्वम्‌ इदानी किमर्थं धावसि-तू अव क्यों दौडता है ?

4.

5 6

अहम्‌ अधुना धावामि-में अव दौडता हू

` अन्तरि सूर्यं पश्यसि किमू-क्या तू आकाश में सूर्य को देखता है ?

* रात्रौ सूर्यं पश्यामि-रत्रि में सूर्य को नहीं देखता

* विश्वामित्रः ्रमणाय सायं गमिष्यति किम्‌- विश्वामित्र घूमने के लिए क्या शाम को जाएगा ?

. सः तत्र स्थातुम्‌ इच्छति-वह वरहा ठहरना चाहता है।

. जालन्धरनगरे मम गृहम्‌ अस्ति-जालन्धर शहर मे मेरा घर हे

. भो मित्र ! तव गृह कुत्र अस्ति-मित्र, तेरा घर करटौ है?

. मम गृह पेशावरनगरे अस्ति-मेरा घर पेशावर शहर मेँ हे।

. धूम्रयानेन त्वं तत्र गमिष्यति किम्‌-रेलगाडी से वर्ह जाएगा क्या ? . अथ किमू, धूप्रयानेन अहं तत्र परश्वः गमिष्यामि-ओर क्या, रेलगाड़ी से मै वहां परसों जाऊगा। | . इदार्नी पिपासा अस्ति, मद्यं शीतलं जलं देहि-अव प्यास लगी है, मुञे वडा

जल दे।

. अधुना बुभुक्षा अस्ति, अन्नं देहि-अव भूख नहीं है, अन्न दे।

@ 1 ^~

शब्द

कन्या-पुव्री, लड़की भ्राता-भाई कुश-दुर्बल संयोगः- मिलाप मित्रम्‌-मित्र, दोस्त स्वसा- बहिन पितव्यः- चाचा जामाता-दामाद पिवसि-तू पीता हे। अवश्यम्‌-अवश्य पिवति- वह पीता हे। नोचेत्‌- नहीं तो पिवामि-पीता हू सन्धिः- सुलह, मित्रता सघातः- समूह नेव-नरीं। पास्यति- वह पिएगा पास्यसि-त्‌ पिएगा नास्ति-नहीं हे स्पष्टम्‌- साफ़ वाक्य

तव जामाता मधुरं दुग्धं रात्रो पास्यति-तेरा दामाद रत्नि में मीठा दूध पिएगा

. अहं रात्र दुग्धं नेव पिवामि-मैं रात्रि में दूध नहीं पीता। . मम स्वसा उष्णं जलं पिवति- मेरी बहिन गरम पानी पीती है।

जहं कदा अपि उष्णं जल पातुं इच्छामि-में कभी भी गरम जल पीना नहीं चाहता

5. तव भ्राता मद्रासनगरं कदा गमिष्यति-तेरा भाई मद्रास शहर कब जाएगा ? 6. यदि तव पिता गमिष्यति तर्हिं सोऽपि गमिष्यति-अगर तेरा पिता जाएगा तो

1 4 15.

वह भी जाएगा

. नोचेत्‌ नेव गमिष्यति-नहीं तो, नहीं जाएगा . सः पीतम्‌ उत्तरीयं कदा आनयति-वह पीला दुपट् कब लाता है?

भो मित्र ! इदानीं पीत वस्त्रं जआनय-हे मित्र ! इस समय पीला वस्र ला। मम रक्तं वस्त्रं कुत्र अस्ति, जानासि किम्‌-मेरा लाल कपड़ा कर्हौँ है, जानते हो क्या?

अत्र दीपः नास्ति, जानामि तव रक्तं वस्त्रमू-यर्हौ दीया नहीं है, भ) तेरा लाल कपड़ा नहीं जानता

. इदानी सायंकालः जातः, भ्रमणाय गच्छ-अब शाम हो गई, घूमने कं लिए जा

त्वं कदा भ्रमणं करिष्यसि-तू कब भ्रमण करेगा ? 1 अह प्रातः भ्रमणाय गच्छामि, सायम्‌-मै सवेरे घूमने जाता ह, शाम को नहीं। त्वं कदा अपि आगच्छसि-तू कभी भी नहीं आता हे।

(

| इकारान्त पुल्लिंग शब्द

| भूपतिः-राजा। ऋषिः- रपि

| ्षेत्रपतिः- घेत का मालिक नरृपतिः- राजा

| प्राणपतिः-प्राणों का स्वामी प्रजापतिः-ईश्वर, राजा

| मारुतिः-हनुमान्‌ | सुमतिः-उत्तम वुद्धिवाला यतिः-तपस्वी मुरारिः -विष्णु तेनापतिः-फ़ीज का वड़ा अफ़सर। वहिः -आग। मुनिः- तपस्वी दर्मतिः-वुरी वुद्धिवाला राशिः-दटेर | विधिः-देव, ब्रह्मा, ईश्वर

वाल्मीकिः-रामायण के लेखक का नाम . सव शब्द पूर्वोक्त “रवि शब्द के समान ही चलते नमूने के लिएु “नृपति" आर्‌ भुनि' करूप देते हे।

1. नृपतिः-राजा। 1. मुनिः- मुनि 2. नृपतिम्‌-राजा को। 2. मुनिम्‌-मुनि को 3. वृपत्तिना-राजा ने, दारा। 3. मुनिना-मुनि ने, दारा 4. नुपतये-राजा के लिए। 4. मुनये-मुनि के लिए। 5. नृपतेः-राजा से। 5. मुनेः- मुनि से। 6. नृपतेः-राजा का। 6. मुनेः-मुनि का। 7. नृपती -राजा मेँ 7. मुनी-मुनि में। सं. हे नृपते-हे राजन्‌। सं. हे मुने-े मुनि

पाटकरं को चाहिग्‌ कि वे इस प्रकार अन्यान्य शब्दों के भी रूप बना ओर विभक्ति दवारा उनके अर्थं कैसे होते है, यह देख

(1) कि कषेत्रपत्तिना तव उत्तरीयं दत्तम्‌ ? (2) तस्य गृहे अय यतिः आगतः (3) दु्मत्तिना सह मित्रतां कुरु (4) सुमतिना सह मिनतां कुरू (5) सेनापतिः सन्य पश्यतति। (6) पश्य कयं सः मुनिना सह गच्छति (7) वाल्मीकिना रामायणं रचितम्‌ (8) रामायणे रामचन्धस्य चरितम्‌" अस्ति! (9) तव बन्धुः रान्न एव उष्णं जलं पिवति (10) उष्णं जलं तस्मे इदानीम्‌ एव देहि (11) अत्र रक्तं दीपं शीघ्रम्‌ मानय (12) नृपतिः अद भ्रमणाय गमिष्यति (13) त्वम्‌ इदानीं यत्र कुत्र अपि गच्छ (14) विष्णुमित्रः उद्यानं गत्वा पश्चात्‌ गृहं गमिष्यति (15) यत्र जगदीशचन्द्रः गमिष्यति तत्र विष्णुदत्तः अपि गमिष्यति एव (16) अहम्‌ ओदनं नेव भक्षयिष्यामि (14) सः

[42 1. चरितम्‌-कथा।

दुग्धम्‌ एव पिवति, कदापि अन्नं नेव भक्षयति (18) सः व्यर्थं तत्न गतः

तस्य पुस्तक तत्र नास्ति। पार 13 शब्द्‌ मन्दः- सुस्त मूकः- गगा उपरि-ऊपर अधः-नीचे।

, मध्ये-वीच में। शनैः- आहिस्ता, धीरे-धीरे वदामि-वोलता हू। वदसि- (तू) वोलता हे। वदति- (वह) बोलता है। डिण्डिमः- टोल अगदः-दवा उच्यैः-ऊचा नीचेः-धीमे। वक्तुम्‌-वोलने के लिए उक्त्वा- बोलकर वदिष्यामि-में वोर्लूगा वदिष्यसि-तू बोलेगा वदिष्यति- वह वोलेगा

वाक्य

11.

- त्वम्‌ उपरि गच्छ, अहम्‌ अधः गमिष्यामि-तू ऊपर जा, मैं नीचे जागा ` न, अहम्‌ उपरि तिष्ठामि, त्वम्‌ अधः गच्छ-नहीं, मै ऊपर ठहरता हू, तू नीचे

जा।

- भो मित्र ! इदानीं शनैः अधः गच्छ-हे मित्र ! अव धीरे-धीरे नीचे जा। ` सः सदा तत्र तिष्टति उच्यैः वदति च-वह हमेशा वहन बैठता डे ओर ऊँचा

बोलता हे।

` त्वं किं सर्वदा नीचैः एव वदसि-तू क्या हमेशा धीमे ही बोलता हे ? | ` अहं सदा नीचैः एव वक्तुम्‌ इच्छामि-में हमेशा धीमे ही बोलना चाहता हू।

भो मिनन ! त्वं मध्ये किमर्थ तिष्टसि- मित्र त्‌ बीच में किस लिए ठहरता | है 2 अह जल पीत्वा रात्रौ उपरि गमिष्यामि- मे जल पीकर रात्रि में ऊपर जाऊंगा

` अहं रात्रौ नेव जलं पिवामि- में रात्रि मे जल नहीं पीता

कि त्वं रात्री उष्णं मिष्टं दुग्धं पास्यसि-क्या तू रात्रि में गरम ओर मीठा दूध नहीं पिएगा ? `

चतः पास्यामि एव- क्यों नहीं पीगा

12. उत्तिष्ठः इदानीं तस्मै फलं देहि-उठ, अब उसको फल दे। 13. फल स्वादु नास्ति, कयं दास्यामि-फल मीठा नहीं है, कंसे दू। 14. यथा अस्ति तथा एव देहि-जैसा है, वैसा ही दे।

शब्द इति-एसा। पर्यन्तम्‌-तक वा-अथवा, या। क्रीडामि-मे खेलता हू अथवा-या। क्रीडसि-त्‌ खेलता हे किवा-या। क्रीडति-वह खेलता अवश्यम्‌-अवश्य सुष्टु-टीक, अच्छा

` वरम्‌-श्रेष्ठ, अच्छा कन्दुकः-गेद

क्रीडिष्यति-वह खेलेगा क्रीडिष्यसि-तू खेलेगा क्रीडिष्यामि-मे खेर्तूगा मदीयम्‌-मेरा।

वाक्य

1. देवदत्तः तत्र क्रीडति-देवदत्त वर्ह खेलता रे

2. सः तत्र सायंकाले गत्वा क्रीरिष्यति-वह व्हा शाम को जाकर खेलेगा। 3. सः तत्र प्रातः गमिष्यति वा-वह वरहा सबेरे जाएगा या नहीं ?

4. अह तत्र सायकालपर्यन्तं स्थास्यामि-में वर्ह शाम तक ठहरूगा

5. त्वम्‌ अवश्यम्‌ आगच्छ-तू अवश्य आ।

6. सः कन्दुकेन सुष्टु क्रीडति-वह गेद से अच्छा खेलता है।

7. सः तथा सुष्टु क्रीडति यया विष्णुमिन्नः-वह वैसा अच्छा नहीं खेलता जैसा विष्णुमित्र

8. सत्यम्‌ अस्ति-सत्य है

9. यथा त्वं वदसि तथा एव अस्ति-जैसा तू कहता हे, वैसा ही हे। 10. रात्री जलम्‌ उपरि नयसि वा-तू रात्रि मे जल ऊपर ले जाता है या नहीं ? 11. अवश्यं नेष्यामि, सत्यं वदामि-अवश्य ले जाऊँगा, सत्य वोलता ह| 12. यदि त्वं सत्यं वदसि नेष्यसि एव-जगर तू सच बोलता है तो ले जाएगा ही। 13. वरं यथा, वदसि तथा कुरु-अच्छा, जैसा बोलता है, वैसा कर।

14. इदानीं भोजनं कर्तुम्‌ इच्छामि, अन्नम्‌ जआनय-अब भोजन करना चाहता हू अन्न ले जआ।

15. अन्नं नास्ति, मोदकम्‌ भस्ति-अन्न नहीं है, द्द्‌ है। यहा तक पाठक जान चुके हँ कि अकारान्त तथा इकारान्त पुल्लिंग शब्द कैसे

चलते अब आपको उकारान्त पुल्लिंग शब्दों के रूप बनाना सीखना है आशा है कि पहले का ज्ञान भूलकर पाठक आगे पदृगे

उकारान्त पुर्त्लिग “भानु शब्द कं रूप

1. प्रथमा भानुः भानु (सूर्य)

2. दितीया भानुम्‌ भानु को

8. तुतीया भानुना भानु ने, दारा

4. चतुर्थी भानवे भानु के तिए

5. पञ्चमी भानोः भानु से

6. षष्टी + भानु का

7. सप्तमी भानौ भानु मं, पर सम्बोधन हे भानो भानु

इकारान्त तथा उकारान्त पुल्लिंग शब्दों कं पंचमी तथा पष्ट कं एकवचन कं रूप एक जैसे होते है पाठकों ने यह वात “रवि, नृपति, मुन' शब्दा दला हागा तथा "भानु" शब्द के रूपों मेँ इस पाट में स्पष्ट हा गइ हागो पचमा तथा पष्ठ के रूप समान होते है, इस कारण पष्ठी कं स्थान पर (,) एेसा चिह दिया गिसका मतलब यह है कि य्ह का रूप पूर्वं की विभक्ति कं समान ही ह। जशाहकि पाठक इस विशेषता को ध्यान में रखेंगे

उकारान्त पुल्लिग शब्द

भानुः- सूर्य गुरुः- अध्यापक

कारूः-कारीगर विष्णुः-विप्णुदव

अशु -किरण तरुः-पेद्‌

सिन्धुः- समुद्र, नदी मरः-रेगिस्तान

शम्भुः-शिवजी शतुः- दुश्मन

जिष्णुः-विजयशील मृत्युः- मौत

ऋध्तुः- यज्ञ वाहुः-भुजा

साधुः-सन्त, महात्मा लइड्‌ः-लडड्‌, पड़ा

शङ्कुः नुकीला पदार्थं शान्तनुः-भीप्म पितामह कं पिता।

स्नाघुः-पुटूठा, रग। ये सब शब्द पूर्वोक्त “भानु' शव्द के समान ही चलत

वाक्य

` युः पाठशातां गच्छति-अध्यापक पाठशाला जाता हे। भानोः अंशु पश्य-सूर्य की किरण देख

सिन्धोः जलम्‌ आनयति-नदी से जल लाता हे।

` मरौ देशे जलं नास्ति-रेतीते देश में जल नहीं है।

मृत्यवे किं दास्यसि-मौत के लिए क्या दोगे ?

शतु पश्यसि किम्‌-दुश्मन को देखते हो क्या ?

" शान्तनुः राना आसीत्‌-शान्तनु राजा था

. शान्तनुना ऋतुः तमाप्तः-शान्तनु ने यज्ञ समाप्त किया। - शम्भुना राक्षसो हतः-शिवजी ने राक्षस मारा।

` साधुना उपदेशः कृतः-साधु ने उपदेश किया।

- तरोः फलं पतितम्‌-पेड से फल गिरा ¦

अव कु एसे वाक्य देते हँ कि जिन्हे पाठक स्वयं समञ्च सकते है-

& ~ग ® $ 6० ^~

|, मि दं न्न, >.

सः तं मागं पृच्छति मृगः मृगेण सह गच्छति मनुष्यः मनुष्येण सह गच्छति

}

सदा मूर्खः मूर्खेण सह वदति। वानरः वने धावति। विष्णुः सर्वत्र अस्ति। ईश्वरः सदा सर्व पश्यति नृपः रक्षकं वदति सः नंगरात्‌ धनम्‌ आनयति वशिष्ठस्य चरणं पश्य बालकाय मोदकं देहि वराहणाय धनं देहि तस्मै जलं देहि शम्भुः राक्षसं हन्ति उने तरर () अस्ति! शतुः ग्रामे नास्ति कारूः गृहं करोति भानुः प्रकाशं ददाति सः कदापि तुष्यति पुष्पम्‌ आनयति पुष्यं जज्ञे पतितम्‌ तस्य पुत्रः कूपे पतितः तस्य बाहुः शोभनः" अस्ति सः कनकेन करीडति तत्र गला तं पश्य वालकः अधुना

7 जगतः त्वं गच्छ भोजनं कुरु हिन्द के निम्नं वाक्यो कँ संस्कृत-वाक्य वनाइए-

1. वह अखि से देखता है। 9. वह वालक कंसे गया ? 3. वालक धूप में गया, उसको यहो ले आ। 4. अव राजा कर्ठा है ? 5. नौकर ने हाथ में सीटी ली। 6. गाव भे शतु है 7. वह पूल लाता है। 8. वहा जाकर देख 9. वह दुर्मति के साथ मित्रता करता है 10. जह राम नाएगा, वहां कृष्ण भी जाएगा जँ मै जाऊँगा,

वहतू जा।

(46 | | पलकन्ललनरसस्कः | 46 1. ददाति-दता है। 2. तुष्यति-घुश होता हे। 3. शोभमः --उत्तम।

पाठ 14

शब्द श्रमः-कष्ट | अतः-इसलिए। कुतः-किसलिए यतः-जिसलिए। ताडयति-वह पीटता हे ताडयसि-तू पीटता हे। ताडयामि- पीता हू। ज्वरितः- ज्वर से पीडित दुर्बलः-बलहीन अतीव- बहुत परिश्रमः- मेहनत एतद्‌-यह यद्‌-जो कि तदु-वह ताडयिष्यति-पीटेगा ताडयिष्यसि-पीटेगा ताडयिष्यामि -पीर्टूगा केवलम्‌-केवल, सिर्फ़ अल्पम्‌- थोड़ा नीरोगः- स्वस्थ, तन्दुरुस्त वाक्य

. यज्ञदत्तः किमर्थ पठति- यज्ञदत्त क्यों नहीं पठता ? - सः ज्वरेण पीडितः अस्ति, अतंः पटति-यह ज्वर से पीडित टै, इस कारण

नहीं पठता

- किमू एतत्‌ सत्यमस्ति यत्‌ सः ज्वरेण पीडितः अस्ति--क्या यह सच हे कि वह

ज्वर से पीडित है?

जर्थं कि सः केव॑लं ज्वरितः अस्ति, परन्तु सः अतीव दुर्बलः अपि अस्ति-ओर

क्या, वह केवल ज्वरग्रस्त है, परन्तु बहुत दुर्बल भी हे।

- कि सः अन्नं भक्षयति नवा? कथय-वह अन्न खाता डे या नहीं?

बता।

~ भक्षयति परन्तु अल्पम्‌ अल्पं दुग्धं पिवति- नहीं खाता, परन्तु थोड़ा-थोडा

दूध पीता है।

` कदा सः पुनः नीरोगः भविष्यत्ि-वह कब स्वस्थ होगा ? * एतद्‌ जह जानामि-यह मैं नहीं जानता

` सः कि किं वदति-वह व्या-क्या बोलता हे ? 19.

11.

सः किमपि वदति-वह कुछ भी नहीं बोलता ~ यवा सः पुनः नीरोगः भविष्यति-जव वह फिर नीरोग होगा

3 (6

12. तदा तः अत्रे भागमिष्यति एव-तव वह यहां आएगा ही 13. प्राठ चे परिष्यति-ओर पाठ पठगा।

शब्द स्वपिति-वह सोता है। स्वपिषि-तू सोता हे स्वपिमि-मै सोता हू। दश-वादने-दस वजे। दशवण्टासमये-दस बने। तदानीम्‌-उसी समय एषः-यह। शोभनः-उत्तम इतिहासः-इतिहास खादति-वह खाता हे। खादसि-तू खाता है। खादामि- मेँ खाता हू। भवति-वह होता है। भवसि-तू होता हे। भवामि-टोता ह| दखिः- निर्धन भृत्यः-सेवक मेरुः-मेरु पर्वत

वाक्य

1. त्वं रात्री कदा स्वपिषि-तू रात्रि मेँ कव सोता हे? 2. अहं दशवण्टात्मये स्वपिमि-्ँ दस वजे सोता हू 2. परन्तु विश्वनाथः तदानीं स्वपिति-परन्तु विश्वनाथ उस समय नहीं सोता 4. यदि सः स्वपिति तर्हि तदा सः किः करोति-अगर वह नहीं सोता तो क्या करताहि? 5. सः तदानी पुस्तकं पठति अतीव कोलाहलं करोति-तब वह पुस्तक पठता है ओर बहुत शोर मचाता है। 6. सः किमर्थं कोलाहलं करोति-वह कोलाहल क्यो करता है ? 7. सः उच्यैः पठति अतः कोलाहलः भवति-वह ऊँचे से पढ़ता है इसलिए शोर होता है। | 8. कोलाहलं करु इति त्वं तं वद-शोर कर. तू उससे कह। 9. सः प्रातः कि पिवति मध्याहे किं भक्षयति-वह सवेरे क्या पीता है ओर दोपहर मेँ क्या खाता है? | 10. तः प्रातःकाले दुग्धं पिबति मध्याहे स्वादु भोजनं खादति-वह सेर दूध पीता | है ओर दोपहर को स्वादिष्ट भोजन खाता हे। 11. सः इदानीं तं किमर्थं ताडयति-वह अब उसको क्यों पीटता है ? 12. यतः तः लिखति- क्योकि वह नहीं लिखता 13. एषः शोभनः समयः, भ्रमणाय गच्छामि-यह उत्तम समय है, घूमने के लिए

जाता हू। 14. सः ददिः अस्ति, अतः दरव्यं ददाति-वह निर्धन हे, इसलिए पैसा नहीं देता हे।

उकारान्त शब्दों कं रूप बनाने का प्रकार पिछले पाठक मेँ चुका है। अव

ऋकारान्त पुल्लिग “धातुः शब्द

1. प्रथमा धाता ब्रह्मा

2. दितीया धातारम्‌ ब्रह्मा को

8. तुतीया धात्रा ब्रह्मा ने (दारा)

4. चतुर्थी धात्रे ब्रह्मा के लिए

5. पञ्चमी धातुः ब्रह्मा से

6. षष्टी धातुः ब्रह्मा का

7. सप्तमी धातरि ब्रह्मा मे, पर सम्बोधन हे धातः ! हे ब्रह्मा

ऋकारान्त शब्दों के रूप इस पाठ में बनार्पेगे। | | | | | | | | | |

ऋकारान्त पुल्लिंग शब्द

| धात्र-ब्रह्मा, विश्वकर्ता, उत्पन्नकर्ता कर्त बनानेवाला नेतु-ले जानेवाला | शास्तु-शासन करनेवाला उदुगात॒-गानेवाला | गातु-गानेवाला नप्त॒-पोता। | गन्त॒-जानेवाला दात॒-देनेवाला वक्तु-बोलनेवाला द्रष्टू-देखनेवाला श्रोत॒-सुननेवाला भोक्त॒-खानेवाला | खष्ट-उत्पन्न करनेवाला पातु-रक्षा करनेवाला देष्टू-देष करनेवाला ध्यात॒-ध्यान करनेवाला वाक्य 1. धाता सकलं विश्वं रचयति-त्रह्मा सब विश्व को रचता हे। 2. दातुः इच्छा कीदृशी अस्ति-दाता की इच्छा कसी है ?

. भोक्त्रे मोदकं देहि-खानेवाले को लड्ड्‌ दे . नप्त्रा भोजनं कृतम्‌-पोते ने भोजन नहीं किया [५9 ] . मम देष्टारं पश्य-मेरे देष करनेवाले को देख =

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6. ध्याता ईश्वरं ध्याति-ध्यान करनेवाला ईश्वर का ध्यान करता हे।

7. मूषकः धान्यं खादति-चूहा धान खाता हे

8. वक्ता सत्यं वदति-वोलनेवाला सच वोलता हे।

9. भुवनस्य कर्तारम्‌ ईश्वरं कुत्र पश्यसि- (तू) जगत्‌ के कर्ता ईश्वर को करटौ देखता हे।

10. अहं भुवनस्य कर्तारम्‌ ईश्वरं वन्दे-में जगत्‌कर्ता ईश्वर को नमस्कार करता हूँ।

(1) त्वं तं ग्रामं गच्छसि ? (2) त्वं तं ग्रामं कदा गमष्यिसि ? (3) त्वं तं ग्रामं

किमर्थं गच्छति ? (4) त्वं तं ग्रामं गत्वा किमू आनेष्यसि ? (5) त्वं तं बहुशोभनं

ग्रामं गत्वा शीप्रम्‌ अत्र आगच्छ (6) त्वं तं शोभनम्‌ उदयपुरनामकं नगरं गत्वा तं

मित्र दृष्ट्वा शीघ्रम्‌ एव अनर आगच्छ (7) हे धातः ! त्वं भुवनस्य कर्ता असि, त्वया

एव सर्वम्‌ एतत्‌ निर्मितम्‌ (8) ब्राह्मणाय धनं दुग्धं देहि (9) ब्राद्मणः अत्र एव अस्ति। (10) तम्‌ अत्र आनय

पार 15 शब्द साधु-साधु, फ़कीर वेतनम्‌-तनखाह धावति-वह दौडता हे। धावसि-तू दोडता हे। धावामि-दौडता ह| पतितः-गिर गया कर्दमे-कीचड मे। स्बलितः-फिसल गया दुकूलम्‌-रेशमी वस्त्र अञ्जनम्‌-सुरमा, अंजन यज्ञः-यज्ञ हसति-वह हसता हे हससि-तू हसता हे। हसामि-में हसता हू। वृद्धः-वृटा | युवा-जवान वालः-लड़का वाक्य

1. सः किमर्थं हसति-वह व्यो हँसता है ? 2. यतः विष्णुदत्तः तत्र कर्दमे पतितः-क्योकि विष्णुदत्त वँ कीचड़ में गिर गया हे। [5 | 8. कथं सः कर्दमे पतितः-वह कीचड़ मे कैसे गिर पड़ा ? | 4. सः पूर्वं स्खतितः पश्चात्‌ पतितः- वह पहले फिसला ओर फिर गिर गया।

@ छर > @ 2

- त्वं तथा धावसि किम्‌, यया अहं धावामि-क्या तू वैसे दौडता हे जैसे दौडइता

हू।

- त्वम्‌ अपि तथा लिखसि यथा विष्णुशर्मा लिखति-तू भी वैसा नहीं लिखता

जैसा विष्णुशर्मा लिखता है।

- यदा त्वं पटति तदा अहं क्रीडामि-जव तू पढ़ता है तव मे खेलता हू . सः कन्दुकेन वरं क्रीडति-वह गेंद से अच्छा खेलता हे। - यदा सः कन्दुकेन क्रीडति तदा सः धावति-जव वह गेंद से खेलता हे, तब

वह दौइता है

- यदा सः धावति तदा अहं हसामि-जब वह दौड़ता है, तव भैं हसता है . मह्यम्‌ आप्र देहि-मुञ्े आम दे।

. किम्‌ अद्य त्वम्‌ आप्र भक्षयिष्यसि-क्या तू आज आम खाएगा ?

. अद्य किम्‌ अस्ति-आज क्या रहै?

- अद्य उष्णं दिनम्‌ अस्ति अतः आप्र भक्षय-आज गर्म दिन है इसलिए आम

चखा।

. तर्हिं शीत दुग्ध देहि-तो ठंडा दूध दे। ` स्वीक्रु, अन्न शीतं मिष्टं दुग्धम्‌ अस्ति-ले, यह ठंडा ओर मीठा दूध है

शब्द्‌ खनति- (वह) खोदता हे खनसि-(त्‌) खोदता है खनामि-खोदता ह| रक्षति-वह रक्षा करता है। रक्षसि-तू रक्षा करता हे। रक्षामि-में रक्षा करता भूमिम्‌-जमीन को व्य्थम्‌- व्यर्थ | गाम्‌-गाय को। गानम्‌-गाना। स्वकीया-अपनी परकीया-दूसरे की कूपम्‌-कूएं को नर्तनम्‌-नाचना

वाक्य

. तस्य पिता अतीव वृद्धः अस्ति-उसका पिता बहुत बूटा हे

- परन्तु तस्य भ्राता युवा अस्ति-परन्तु उसका भाई जवान हे

- सः भूमिम्‌ अद्य किमर्थं खरति-वह भूमि को आज किसलिए खोदता हे ? - सः अद व्यर्थं खनति-वह आज व्यर्थ खोदता है।

सः स्वकीयां भूमिं रक्षति वा-वह अपनी भूमि की रक्षा करता हे या नहीं ?

सः स्वकीयां गाम्‌ आनयति-वह अपनी गाय को लाता है।

?. सः गृहं एति किमृ-वह घर की रक्षा करता हे क्या ? | 8. अथ किमू ! सः केव गृह रक्षति-ओर क्या ! वह केवल घर की रक्षा | | कता है। | 9. प्रल्तु उयानम्‌ अपि वरं रक्षति-परतु बाग की भी अच्छी तरह रक्षा करता है। 10, तया रक्षति यया देवगप्रियः-वह वैसी रक्षा नहीं करता जैसी देवप्रिय करता | |

11. देवप्रियः अतीव बालः अस्ति-देवप्रिय अत्यन्त बालक (छोटा) हे। 12. पल्तु भद्रसेन युवा अस्ति-परन्तु भद्रसेन जवान | 13. अतः सः प्रातः काले सुष्ठु धावति-इस कारण वह प्रायः अच्छा दौडता है। | 14. अहं पश्यामि, देवदत्तः खनति इति-म देखता हू कि देवदत्त खोदता है। | 15. देवदत्तः कूपं खनति-देवदत्त कओं खोदता हे | 16. पर्य इदानीं सः तत्र कथं खनति-देख, अव वह वर्ह कैसे खोदता है। |

17. सः जलपानर्थं कूपं खनति-वह पानी पीने के लिए कुजं खोदता हे। ` पूर्व पाठ मँ ऋकारान्त पुल्लिंग शब्दो को चलाने का प्रकार बताया गया है। इस पाठ मेँ दुबारा ऋकारान्त पुल्लिंग शब्दो का रूप बताते है | | | | | | |

ऋकारान्त पुत्लिग “पालयित शब्द

1. प्रथमा पालयिता रक्षक

2. दितीया पालयितारम्‌ रक्षक को

8. ततीया पालयित्रा (रक्षक के दारा)

£. चतुरी पालयित्र रक्षक के लिए, को

5. पञ्चमी पालयितुः रक्षक से

6. षष्टी 4 रक्षक का

7. सप्तमी पालयितरि रक्षक मे, पर | सम्बोधन दे) पालयितः हे रक्षक |

ऋकारान्त पुल्लिग शब्द

अन्न खानेवाला ज्ञात्-जाननेवाला

विजञातु-जाननेवाला अध्येत्र-पट्नेवाला

निहन्त-हनन करनेवाला किक्रेत्र-बेचनेवाला -खरीदनेवाला अवज्ञात्र-अपमान करनेवाला

भरतु-पोषण करनेवाला, पति। भेत॒-भेद करनेवाला हर्तु-हरण करनेवाला चोरयित्र-चोरी करनेवाला

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12.

13.

स्तोतु-स्तुति करनेवाला सस्कर्तु-संस्कार करनेवाला सत्कर्तु- सत्कार करनेवाला सहर्तु- संहार करनेवाला

वाक्य

. अत्ता अन्नम्‌ अत्ति-खानेवाला अन्न खाता हे।

. अत्रे अन्नं देहि-खानेवाला को अन्न दे।

. ज्ञात्रा ज्ञानं ज्ञातम्‌- ज्ञानी ने ज्ञान जाना।

. ज्ञात्रे नमः कुरु- ज्ञानी के लिए नमस्कार कर।

. निहन्त्रा व्याघ्रः हतः-मारनेवाले ने शेर मारा

. भर्तुः सेवा कर््तव्या-पति की सेवा करनी चाहिए `

. स्तोतुः स्तोत्रं श्रणु-स्तोता की स्तुति सुन।

. धान्यस्य विक्रेता कत्र गतः-धान्य बेचनेवाला कां गया ? . अध्येत्रे पुस्तक देहि-पटठ्नेवाले को पुस्तक दे

. अश्वस्य क्रेता जत्र जागतः-घोडे का खरीदार यहां आया . अश्वस्य चोरयिता नगरे अस्ति-घोडे को चुरानेवाला शहर में हे

अन्नस्य संस्कर्ता मम गहे अन्नं संस्करोति-अन्न का संस्कार करनेवाला मेरे घर में अन्न को ठीक करता हे।

व्याकरणस्य अध्येता जय्य जागतः- व्याकरण अध्ययन करनेवाला आज नहीं जया।

रच्च धूमः-धुज शास्त्रम्‌- शास्त्र यामि-जाता ह, वसति- (वह) रहता हे वससि- (तू) रहता रे वसामि-रहता ह| यासि- (तू) जाता है। याति- (वह) जाता हे उदकम्‌-जल गुणः-गुण संस्कत वाक्य

यत्र धूमः तत्र अग्निः अस्ति ! अहं तं ग्रामं गच्छामि, यत्र वेदस्य ज्ञाता वसति

तस्मे गुरवे नमः नूपतिः शास्रस्य ज्ञात्र द्रव्यं ददाति यस्य बुद्धिः बलम्‌ अपि तस्य एव शतु भूपतिः जयति अहं सायं नगराद्‌ बहिः गच्छामि तस्य हस्तात्‌ माला पतिता सः एव पर्वतः यत्र वसिष्ठः मुनिः वसति व्याघ्रात्‌ भयं भवति गुरोः ज्ञानं भवति

(पा

मृगः वनात्‌ वनं गच्छति

___---~-- ~

-- -- - --------

हिन्दी के निम्न वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए-

(1) ऊंट, ऊँचे बोल (2) तू उस गोव को जा (8) उसका धन दे (4) मुञ्ञे अन्न दे। (5) मँ ऊपर ठहरता हू (6) मेँ गर्म जल कभी नहीं पीता (7) उठ, मेरे गुरु के लिए फल ला। (8) अव तू खेल (9) आज नहीं खेरलूगा (10) तू सच बोलता हे

पाट 16 शब्द यस्य-जिसका। कस्य-किसका अस्य-इसका क्व-कटा दूरम्‌-दूर नियमः-नियम। सर्वस्य-सबका मित्रस्य-मित्र का। देवस्य-ईश्वर का नितान्तम्‌-बिल्कुल पादत्राणम्‌-जूता मिष्टान्नम्‌-मिठाई वेद्यः-यैद्य, डाक्टर वाक्य

1. यस्य पुस्तकम्‌ अस्ति तस्मै देहि-जिसकी पुस्तक है, उसी को दे 2. एतत्‌ कस्य गृहम्‌ अस्ति-यह किसका घर है ? 3. एतत्‌ मम मित्रस्य गृहम्‌ अस्ति-यह मेरे मित्र का घर्‌ हे। ४. त्वं कयं जानाति-तू कैसे जानता है ? 5. यदू अहं वदामि तत्‌ सत्यम्‌ अस्ति-जो मै कहता ह, वह सच हे 6. तस्य माता किं वदति-उसकी माता क्या कहती है ? . ¶. मम पादत्राणम्‌ आनय-मेरा जूता ले आ। 8. कुर अस्ति तव पादत्राणम्‌-कर्ा हे तेरा जूता ? 9. तत्र अस्ति, तत्‌ पश्वा है, वह देख 10. सः दूरं गच्छति किम्‌-वह दूर जाता हेक्या? 11. सः मिष्टान्नं भक्षयति-वह मिटई खाता है। 12. अस्य लेखनी कुत्र अस्ति-इसकी कलम कर्हो है ? 13. त्वम्‌ इदानीं किं लिघसि-तू अब क्या लिखता है ?

14. सः रक्तं पुष्यं पश्यति-वह लाल एूल देखता 8ै।

करपटिका-रोटी, पुलका कुण्डलिनी-जलेबी क्वयिका-कढुी गृहममि-लेता हू गृह्ाति-वह लेता है। नवनीतम्‌-मक्खन दुग्धम्‌ दू

गृहाण-ले।

लिख-लिख

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नहीं

शब्द

तक्रम्‌-छाछ, लस्सी

दधि-दही

व्यञ्जनम्‌-सब्जी, भाजी, तरकारी गृह्यसि-तू लेता है। देवम्‌-भाग्य

घृतम्‌-घी

सूपम्‌-दाल

वद-बोल, कह

दरदेवम्‌-दुभग्य, आफ़त

वाक्य

. मद्यम्‌ इदानीम्‌ एव करपद्िकां देहि-मुङ्े अभी रोटी दे।

. त्वं प्रातः तक्र पिबसि किम्‌-क्या तू सवेरे लस्सी पीता है ?

सः प्रातः कुण्डलिनीं भक्षयति-वह प्रातः जलेवी खाता है।

म्यं क्वथिकां ददासि किमू-मुञ्े कदी देता है क्या ?

- सः भक्षणार्थं व्यञ्जनम्‌ इच्छति-वह खाने के लिए सब्जी चाहता हे

- एतत्‌ नवनीतं गृहाण-यह मक्खन ले

- धृत तत्र किमर्थं नयसि ? वद-घी वर्ह किसलिए ले जाता है ? बता। अह भक्षणार्थं घृतं दधिं नयामि-मँ खाने के लिए घी ओर दही ले जाता हू यदि त्वं सूपम्‌ इच्छति तर्हि गृहाण-अगर तू दाल चाहता है तो ले

` तः बहु व्यञ्जन भक्षयति, तत्‌ वरम्‌-वह बहुत सब्जी खाता है, यह अच्छा

11. वद, त्वं गच्छसि-बोल, तू काँ जाता है ? पूर्व | मे ऋकारान्त पुल्लिंग शब्दों के रूप बनाने का प्रकार दिया हे करई ऋकारान्त शब्दों के रूप भिन्न भी होते है विशेष भिन्नता नहीं होती, केवल एक

रूप में भेद होता है-

ऋकारान्त पुल्लिग "पित्रः शब्द

1. प्रथमा पिता

पिता

2. दितीया पितरम्‌ पिताको `

|

8. तृतीया पित्रा पिताने

4. चतुर्थी ` ` पित्र पिता के लिए, को

5. पञ्चमी पितुः पिता से

6. षष्ठी ( पिता का

4. सप्तमी पितरि पिता मे, पर सम्बोधन हि) पितः हे पिता

, "पिता शब्द में ओर “धाता शब्द में इतना ही भेद है कि “धाता शब्द का दितीया का एकवचन “धातारम्‌ हे ओर "पिता' शब्द का "पितरम्‌" हे, "पितारम्‌" नहीं

यही विशेषता निम्न शब्दो में होती है पाठकों को उचित है कि इस बात को स्मरण रखें |

पितु" शब्द के समान चलनेवाले ऋकारान्त पुल्लिंग शब्द

भरातु-भाई जामात्र-दामाद न-नर। देब्रु-देवर श॑स्त॒-स्तुति करनेवाला सव्येष्ट-गाड़ीवान

वाकव्त्य

1. पिता पुत्रं पश्यति-पिता पुत्र को देखता हे

2. पुत्रः पितरं पश्यति-लडका पिता को देखता हे

3. पित्रा पुत्राय वस्त्रं दततमू-पिता ने पुत्र को वस्त्र दिया 4. भ्राता भ्रातरं देष्टि-भाई भाई से देष करता हे

5. भ्रात्रा धन दत्तम्‌-भाई ने धन दिया

6. जामात्रे वस्त्र देहि-दामाद के लिए वस्त्र दे।

7. पित्रे नमः कुरु-पिता को नमस्कार कर

इस प्रकार पाठक कड वाक्य बना सकते है उक्त वाक्यों के विपरीत अर्थ के वाक्य- | 1. पिता पुत्रं पश्यति। 2. पुत्रः पितरं पश्यति। 3. पित्रा पुत्राय वस्तं

दन्तम्‌ 4. भ्राता भ्रातरं देष्टि 5. भ्रात्रा धनं दत्तम्‌ 6. जामात्रे वस्त्रं नं देहि। |

निम्न वाक्यों की संस्कृत बनाइए- 1. वह गोव जाता है। 2. जर्हौँ तू जाता है, वरहो मै जाता हू। 8. क्या तू

सदा बाग जाता है ? 4. तू करा जाता है ? 5. वह दिन मेँ नगर जाता है ओर रातं मे घर जाता है। 6. हरिश्चन्द्र फल खाता है।

म्न

निम्न वाक्यों के हिन्दी-वाक्य बनाइए-

1. अहम्‌ इदानी फलं नेव भक्षयामि 2. हरिश्चन्द्रः पुस्तक तत्र नयति 3. किमर्थ त्वम्‌ अपूपं तत्न नयसि 4. अहं गृहं गत्वा निजधोतं वस्त्रम्‌ आनेष्यामि 5. ब्रूहि यज्ञप्रियः कुत्र अस्ति ?

पाठ 17 शब्द्‌ शक्तिः- सामर्थ्य शक्यः- मुमकिन शक्नोमि-सकता हू ` शक्नोषि-(त्‌) सकता हे

शक्नोति- (वह) सकता है। वक्तुम्‌-बोलने के लिए स्वभाषाम्‌-अपनी भाषा को। नारङ्ग-संतरा का वृक्ष।

चन्द्रः-रचौद सस्कृतम्‌- संस्कृत भाषा आग्लभाषा-अग्रेजी भाषा देशभाषा-देशी भाषा नवीनम्‌-नवीन, नई पुराणम्‌- पुराना मातुभाषा-मादरी जवान आसनम्‌-जासन

नारङ्गः-संतरा (फल) वाक्य.

. त्वं सस्कृतं वक्तुं शव्नोषि-तू संस्कृत बोल सकता है ? . नहि नहि, अहम्‌ आंग्लभाषा वक्तुं शक्नोमि- नहीं नहीं, मे अंग्रेजी बोल सकता ह्‌। किम्‌ एतत्‌ वरम्‌ अस्तियत्‌ त्वं स्वभाषां वक्तुं शक्नोषि-क्या यह अच्छा है कि तू अपनी भाषा नहीं बोल सकता ? कः एव वदति-कौन कहता है ? तिं संस्कृतं किं पटसि-तो संस्कृत क्यों नहीं पढ़ता ? जह पठामि एव-मे पट्ता हू त्वं तत्र गन्तुं शक्नोषि किम्‌-क्या तू वर्ह जा सकता है ? सः क्रीडितुं शक्नोति-वह खेल सकता है। ॥: 9. अह लेखितुं शक्नोमि-े लिख नहीं सकता 10. सः वरं लेखितुं शक्नोति-वह अच्छा लिख सकता है।

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11. सः नवीनं पुस्तकं ्िखति किम्‌-वह नई पुस्तक लिखता हे क्या ? 12. तस्य गृहम्‌ अतीव पुराणम्‌ अस्ति-उसका घर बहुत पुराना हे 18. भो.मिन्र ! एतत्‌ आसनं गृहाण-मित्र ! यह आसन ले

शब्द अनृतम्‌-असत्य, इट अप्रियम्‌-अप्रिय प्रियम्‌-प्रिय। भव-हो। अलङ्कारः-भूषण, जेवर आचार्यः- गुरु, शिक्षक अध्यापकः-पठ़ानेवाला तूष्णीम्‌-चुपचाप वक्ता-वोलनेवाला प्रियवादी-प्रिय वोलनेवाला किरणः-किरन। असत्यवादी-्ूठ वोलनेवाला वृथा-व्यर्थ। वाक्य 1. किमर्थम्‌ अनृतं वदसि-तू क्यो असत्य वोलता हे ? 2

` अहं कदापि असत्यं नैव वदामि-मँ कभी असत्य नहीं वोलता | ` सः वक्ता सदा एव अप्रियं वदति-वह (बोलनेवाला) सदा अप्रिय बोलता है। ` कि त्वम्‌ अलङ्कारं गृहासि--क्या तू जेवर लेता हे ? - आचार्यः सत्वरम्‌ आगमिष्यति-गुरु शीघ्र आएगा सः अध्यापकः शीघ्र गमिष्यति-अध्यापक शीघ्र नहीं जाएगा * संत्य प्रियं वद-सत्य ओर प्रिय बोल | ` सः ततर तूष्णीं तिष्ठति-वह वँ चुपचाप चैठा है | ` बालकः तूष्णीं नैव तिष्ठति-बालक चुप नहीं रहता | 10. सः आचार्यः सदा पुस्तक पटति-वह शिक्षक सदा पुस्तक पदता है। 11. सः एव वृथा वदति-वह एसा व्यर्थ बोलता हे। 12. सः प्रियवादी आचार्यः कुत्र गतः-वह प्रिय बोलनेवाला आचार्य कं गया ? 13. सः अन्यं नगरं गच्छति-वह दूसरे शहर को जाता हे। इस समय तक पाठकों ने अ, इ, उ, ये स्वर जिनके अंतमेंहै एसे | पुल्लिंग शब्द प्रयोग का प्रकार जान लिया है। अव कुछ पुल्लिंग सर्वनामो के | रूप देते है, जिनको जानने से पाठक संस्कृत मेँ अनेक प्रकार के वाक्य बना सकते ` > 2। .

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१. सप्तमी

अकारान्त पुल्लिग “सर्व शब्द

सर्वः

सर्वस्मिन्‌

सब

संबको सबने (दारा) सबके लिए सबसे सबका

स्वम

इन रूपों को जानकर पाठक बहुत से वाक्य बना सकते है देखिए-

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विश्वः-सब कः-कौन।

. सर्वः जनः अन्नं भक्षयति-सब लोग अनन को खाते है।

सर्वं धनं तस्मै देहि-सारा धन उसको दे।

, सर्वेण द्रव्येण सः किं करोति-सारे धन से वह क्या करता है ?

. सर्वस्मे याचकवर्गय मोदकान्‌ देहि-सब भिक्षुओं को लइूड्‌ दे

. सर्वस्मात्‌ ग्रामात्‌ जनः आगतः-सब गोव से लोग आए है।

. सर्वस्य पुस्तकस्य किं मूल्यम्‌ अस्ति-सारी पुस्तक का क्या मूल्य है ?

. सर्वस्मिन्‌ ग्रन्थे धर्मः प्रतिपादितः-सारे ग्रन्थ में धर्म का प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार निम्न सर्वनाम चलते है- अन्यः-दूसरा। एकः-एक

पाठक इनके रूप बना सकते है ओर वाक्यों में प्रयुक्त कर सकते हैँ अब नीचे कुठ वाक्य देते है, जो पाठक पढ़ते ही समञ्ञ जार्णँगे

1. एकस्मिन्‌ दिवसे अह तस्य गृह गतः 2. अन्यस्मिन्‌ दिने जगदीशराजः अत्र आगतः 3. अन्यस्य धनं स्वीकुरु 4. देवदत्तः सर्व द्रव्यं तस्मे ददाति किम्‌ ? 5. यदि एकस्मात्‌ ग्रामात्‌ पुरुषः आगतः 6. तर्हिं अन्यस्मात्‌ ग्रामात्‌ सः कथम्‌ आगमिष्यति ? 7. एकस्मिन्‌ मार्गे यथा दुःखम्‌" अस्ति तथा अन्यस्मिन्‌ मार्गे अस्ति। 8. अतः अन्येन मार्गेण एव तं ग्रामं गच्छ 9. एकेन गुरुणा एव सर्व पुस्तकं पाठितम्‌ 10. अन्यस्मिन्‌ पुस्तके साः कथा नास्ति

1. दारं पिधेहि 2. पात्रम्‌ इदानीं कत्र नयसि 3. सः मोदकम्‌ आप्र मध्याहे भक्षयति 4. वृके मूषक पश्य 5. नृपतिः चोरं ताडयति 6. यदा चौरः तत्र गमिष्यति तदा त्वम्‌ अपि तत्र एव गच्छ 7. यया तवं दुग्धं पिबसि तथा एव सः पिबति 8. स्वर्गस्य दारं तेन उदुघाटितम्‌। 9. हरिदारनगरे यथा स्वादु दुग्धं भवति तया

1. दुःखम्‌-तकलीफ़ 2. ` पाठितम्‌-पट़ाई 3. सा-वह

अमृतसरे 10. यथा विहगः आकाशे गच्छति, तथा मनुष्यः अन्न गच्छति 11.

कुमारः कुत्र वर्तते ? | पाठ 18 शब्द मार्जनलेपः- साबुन पर्यकः-पलंग आलस्यम्‌-आलस। आनन्दः- आनन्द इन्धनम्‌-लकडी, ईधन शोचम्‌-शोच उत्तिष्ठामि-उठ्ता हू। उत्तिष्ठसि- (त्‌) उठता हे | पड्कः- कीचड़ सूत्रमू-धागा। हवनार्थम्‌-हवन के लिए। इह-यो हवनङ्कुण्डम्‌-हवनकुण्ड यज्ञसामग्री-हवन-सामग्री वाक्य

1

भो शिष्य ! उत्तिष्ठ, आलस्यं कुरु-हे शिष्य ! उठ, आलस कर। जहम्‌ उत्तिषठामि, शौचं स्नानं कृत्वा हवनार्यम्‌ आगच्छामि उठता है शौच ओर स्नान करके हवन के लिए आता हू शीघ्रम्‌ उत्तिष्ठ तत्र सत्वरम्‌ आगच्छ-जल्दी उठ ओर वहाँ शीप्र आ। तत्र हवनार्थमू ईन्धनं नास्ति-वर्ल हवन के लिए लकड़ी नहीं हे। यज्ञकुण्ड कुन अस्ति-हवनकुण्ड कलँ हे ? अह जानामि-मे नहीं जानता। | | तन एव पश्य शीघ्रं अत्र आनय-वर्ह ही देख ओर शीग्र यह ले आ। भोमित्र! हवनण्डम्‌ अहम्‌ आनयामि, त्वम्‌ ईन्धनम्‌ आनय-मित्र ! हवनकण्डु मँ.लातार्हू त्‌ लकड़ी ले आ। | 9. यज्ञसामग्री अत्र .अस्ति-हवन सामग्री य्ह हे।

10. स्नानं करत्वा एव हवनं करोमि-स्नान करके ही हवन करता हू्‌।

11. स्नानं सन्ध्यां कृत्वा हवनं कुरु-स्नान ओर सन्ध्या करके हवन कर 12. इदानीं देवदत्तः सन्ध्यां करोति-अब देवदत्त सन्ध्या करता हे।

9 |

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इति-पेसा। उत्तिष्ठति- (वह) उठता है।

| | | | | | |

\

शब्द

आरभे- मे आरम्भ करता हू आरभसे-त्‌ आरम्भ करता डे

आरभते-वह आरम्भ करता हे। उपास्य-उपासना करके

एहि-आओ। कुशलः-स्वस्थ, प्रवीण

माम्‌-मुञध कम्बलम्‌-कम्बल

आज्ञापयत्ति-आज्ञा देता हे आज्ञापयसि-त्‌ आज्ञा देता हे।

आज्ञापयामि- आज्ञा देता हू त्वाम्‌-तुञ

तम्‌-उसको शुभम्‌-अच्छा।

इति-एेसा, यह ऊणविस्रम्‌-ऊनी कपड़ा वाक्य

. रामचन्द्रः इदानीं कुशलः अस्ति-रामचनद्र अब स्वस्थ हे . सः प्रातः एव सन्ध्याम्‌ उपास्य बहिः गच्छति-वह सवेरे ही सन्ध्या करके बाहर

जाता हे।

सः मध्यादहे आगच्छति तदा भोजनं करोति- वह दोपहर के समय आता है

जर तब भोजन करता है।

. सः माम्‌ आज्ञापयति-वह मुञ्े आज्ञा देता दे

. अहं त्वां जाज्ञापयामि-में तुञ्चको आज्ञा नहीं देता

. सः तं किमर्थम्‌ आज्ञापयति- वह उसको किसलिए आज्ञा देता है।

. सः कदापि आज्ञापयति-वह उसको कभी आज्ञा नहीं देता।

- एषि, पश्य एतत्‌-आ, इसको देख

- सः शुभं कर्म इदानीम्‌ आरभते-वह अब श्रेष्ठ कार्य आरम्भ करता हे।

- आहम्‌ इदानीं संस्कतं पठितुम्‌ आरभे--मेँ अव संस्कृत पढना प्रारंभ करता

हू

. त्वम्‌ अपि कि आरभसे-तू भी क्यों नहीं आरम्भ करता ?

. समयः अस्ति, अतः आरभे-समय नहीं हे, इसलिए नहीं आरम्भ करता . त्वम्‌ इदानीं कुशलः असि किमू-त्‌ अब कुशलपूर्वक हे क्या ?

. सः तत्र गत्वा भूमिं खनति-वह वँ जाकर जमीन खोदता हे

, तत्र गच्छ इति सः त्वाम्‌ आज्ञापयति- वलँ (तु) जा, एेसी वह तुज्ञे आज्ञा

देता है।

पुल्लिग मे किम्‌" शब्द के रूप

1. प्रथमा कः कोन 2. दितीया कम्‌ किसको 3. तृतीया केन किसने 4. चतुर्थी कस्मे किसकं लिए 5. पञ्चमी कस्मात्‌ किससे 6. षष्टी कस्य किसका 7. सप्तमी कस्मिन्‌ किसमें शब्द्‌ गतः-गया आलेख्यम्‌-चित्र, तस्वीर मन्दिरम्‌-घर, पूजास्थान आलिख्य-लिखकर ददाति- (वह) देता हे | -ददासि- (तू) देता हे भवति- (वह) होता हे भवसि- (तू) होता हे भवामि-होता हू मत्वा-मानकर्‌ गृहीत्वा-लेकर भूत्वा-टोकर वाक््य

1. कः तत्र अस्ति-वर्टां कौन है ? 2. त्वं पश्यसि-तू किसको देखता है ? 3 कंन मार्गेण सः गतः-वह किस मार्ग से गया ? 4 कस्मै धनं ददाति-किसके तिएु (को) धन देते हो ? 5. कस्मात्‌ ग्रामात्‌ सः आगच्छति-वह किस गोव से आता हैः 6. कस्य एतत्‌ पुस्तकम्‌ अस्ति-यह पुस्तक किसकी श, 7 कस्मिन्‌ पुस्तकं तत्‌ आलेख्यम्‌ अस्ति-किस पुस्तक मे वह तस्वीर हे ? 8. कः तत्र गच्छति- वर्ह कौन नहीं जाता ? 9. कस्मै कारणाय त्वं धनं ददासि-तू किस कारण धन नहीं देता 7 10. कस्मिन्‌ स्याने तस्य पाठशाला अस्ति-उसकी पाठशाला किस स्थान मेँ हे? किं करष्णः मन्दिरं गच्छति ? अय कृष्णः मन्दिरं नैव गच्छति देवदत्तः यदि रामचन्द्राय पुस्तक ददाति तर्हि कस्म ददाति ? त्वं कुत्र गत्वा इदानीम अन्र आगतः ? [ह] मित्र, पश्य, तस्य, गृहम्‌ अत्र एव अस्ति। मम गृहम्‌ अत्र नास्ति तव वस्त्र मलिनम्‌। 6 प्रणम्य सः जगतः? सः गुरु प्रणम्य जागतः

[ -

निम्न वाक्यों के संस्कृत-वाक्य बनाइए-

हे विष्णुदत्त, तू कब आएगा ? मै शाम के समय सन्ध्या करके वहं आँगा तू वर्ह क्यों नहीं जाता ? बता, यदि तू जाएगा तो मेँ अवश्य जाऊंगा वह तुमको पीटता है रामचन्द्र यज्ञदत्त के लिए पुस्तक नहीं देता देख, मेरा घर कंसा अच्छा है ! भै ठंडे पानी से स्नान करके आया तू अब पुस्तक पठ्‌ मे भोजन करके पत्र पर्टृगा

पाठ 19

शब्द मसूराः-मसूर यवाः-जो तिलाः-तिल गोधूभाः-गेह्‌, कनक मनुष्यः-मनुष्य काचः-शीशा। पुरुषः- मर्द तण्डुलाः- चावल कलमः-लेखनी माषाः-माष, उडद मुटूगाः-मूंग सन्ति-रे। स्त्री-स्त्री। अर्धम्‌-आधा कृष्णाः-काले

वाक्य

| 1

` सः पुरुषः नगरं गत्वा जलम्‌ आनयति-वह पुरुष शहर जाकर जल लाता है। - तत्र गोधूमाः सन्ति परन्तु यवाः सन्ति-वहौँ गेहू है परन्तु जौ नहीं हे। कृष्णाः सन्ति तथा एव माषाः अपि-तिल काले है, माष भी वैसे ही

© 2

‰* माषाः तथा कृष्णाः यथा तिलाः-माष वैसे काले नहीं, जैसे तिल

5. पश्य, अन पुरुषः अस्ति-देख, यह आदमी हे।

6. अन पुरुष; अस्ति परन्तु स्त्री नास्ति-यहौँ पुरुष परन्तु स्त्री नहीं है

7. दुर्गादासः किं करोति-दुरगादास क्या करता है ?

8. वाबूरामः तत्र तिष्ठति लिखति च-वबादूराम वलँ ठहरता है ओर लिखता हे।

9. तव दूतः लेखितुं शक्नोति-तेरा दूत लिख नहीं सकता 10. मम स्त्री संस्कृतं वक्तुं शक्नोति-मेरी स्त्री संस्कृत बोल सकती हे।

12. जत्र बालकः नास्ति-यर्हौ बालक नहीं है। | | 18. तर्हि सः कुत्र अस्ति इति अहं जानामि-तो वह कर है, यह भैं नहीं जानता। 14. सः इदानीम्‌ उपरि अस्ति-यह अव ऊपर है |

| 11. तन उपविश, यत्र. बालकः स्वपिति-व्हो बैठ, जहाँ बालक सोता है | |

| 15. त्व नीचै गच्छ-तू नीचे जा। | | शब्द |

त्यजति-छोडता है। त्यजसि-तू छोडता है। त्यजामि-छोइता त्यक्त्वा-छोडकर

त्यक्तुम्‌-छोडने के लिए। हस्तौ-दोनों हाथ ्क्षालयति-(वह) धोता है। प्रक्षालयसि-(तू) धोता हे

्र्लालयामि-धोता ह| ्क्षालयितुम्‌-धोने के लिए। प्र्ालय-धो। मुखम्‌- मुह पादौ-दोनं पौव प्रक्षालनम्‌-धोना कठिनम्‌-सल् | त्यज-छोड प्रथमम्‌-पहले। जडः-मूर्ख वाक्य

1* सः इस्त पादौ प्क्षालयति--वह हाथ ओर पौव धोता है। ““ अह वस्त्र प्रक्षालयामि कपडा धोता हू ` त्वम्‌ इदानीं किं प्रक्नालयसि-तू अब क्या धोता ? | त्वम्‌ इदानीम्‌ एव किमर्थ तत्‌ परत्तालयति-तू अभी किसलिए उसे धोता है! - जलम आनय वस्त्रं प्रक्नालय-आज सायंकाल जल ला ओर ¢ त्वम्‌ अनृतं किम्ं त्यजसि-तू शूठ बोलना क्यों नहीं छोड़ता ? 7 सः असत्यं शीघ्रम्‌ एव त्यनति-वह असत्य को जल्दी छोड़ देता है। 8. प्रथम हस्तौ पादौ प्रक्षालय-पहले हाथ-पैर धो 9. पश्चात्‌ भोजनं कुरु-बाद मेँ भोजन कर 10. प्रातर्‌ एव उत्तिष्ठ मुखं प्रक्षालय-सवेरे ही उठ ओर मंड धो। 11 सः प्रात्‌ उत्तिष्ठति, बहिर्‌ गच्छति, तत्र मुखं प्रालयति-वह सवेरे उठता है, बाहर जाता है, वह मुँह धोता है। 12. सः उष्णं जलं पिबति-वह गरम जल नहीं पीता।

| | | | | | | | 13. अहं शीतं जल पिवामि-रमै ठंडा जल नहीं पीता! |

14

, त्वं तत्र गच्छ वस्त्रं सालय

धो 15. जडः पठति-मूर्खं नही ` प-त्‌ वहा जा ओर कपड़ा 16. सः बालकः मूटः नेव भसि

वह बालक मूटु नदी

अस्मत्‌" शब्द

1. प्रथमा

2. दितीया जहम्‌

8. तृतीया माम्‌ 4. चतुर्थी मया =

5. पञ्चमी मह्यम्‌ ति

6. षष्ठी मत्‌

१. सप्तमी ९५ =

शब्द

लिखित्वा, लेखित्वा- लिखकर हतम्‌-हरण किया - त] जानता जानाति-वह जानता है » जानामि-जानता हूं ८३ क्र लिप्‌ आलस्यम्‌-सुस्ती प्रुत्‌ पून लिए आचरति--आचरण करता है। हन्तुम्‌-हनन (मारने) के लिए। पाहि-रक्षा कर हन्तु ? पाखाना

कु -- लिए गन्तुम्‌-जाने के लिए। आगन्तुम्‌-आने कं

वेत्तुम्‌-जानने के लिए

वाक््य

अहं भ्रात्रा सह ग्रामं गच्छामि भाई के साथ गाव को जाता हू। ` मया सह त्वम्‌ अपि आगच्छ-मेरे साथ तू भी आ।

मह्य वस्त्र देहि-मेरे लिए (मुञ्ञे) कपड़ा दे।

. हे ईश्वर ! मां पाहि-हे परमात्मन्‌ ! मेरी रक्षा कर

८5

(66 |

5. मम धनं तेन हतम्‌-मेरा धन उसने चुरा लिया हे। 0. मत्‌ अन्नं गृहीत्वा तस्मे देहि-मु्से अन्न लेकर उसे दे। 7. मयि पातक नास्ति-मुञमें पाप नहीं टे।

सुगम वाक्य

ते मुनिं पश्य सः मुनिः प्रातर्‌ एव उत्तिष्ठति सः प्रातर्‌ उत्थाय कि करोति ?

पः प्रातर्‌ उत्याय तपः आचरति यज्ञमित्रः भूमित्रस्य पुत्रः अस्ति। सः तं मुनिं प्रणम्य

तर आगच्छति सः मुनिः कस्मात्‌ स्थानात्‌ अत्र आगतः इति त्वं जानासि किम्‌ मुनिः कस्माद्‌ ग्रामाद्‌ अव्र आगतः अहं नेव जानामि, यज्ञमित्रः जानाति हे मित,

तवं जानासि ? सः मुनिः अयोध्यानगरात्‌ अत्र आगतः कदा आगतः इति अहं जानामि सः सर्वं शास्त्रं जानाति

पार 20

इस समय तक आपके उन्नीस पाठ हो चुकं हे, ओर आपके पास नित्य व्यवहार उपयुक्त होनेवाले वहुत शाब्द चुकं हे अगर आपने ये शब्द याद कर लिये तथा पाल मे जो वाक्य दिए है, उनकी पद्धति की ओर ध्यान देकर, उन वाक्यों का भो अच्छी तरह याद कर्‌ लिया होगा, तो दैनिक व्यवहार मेँ उपयोगी कुछ वाक्य पाप वना सकेगे ! प्रत्येक पाठ में दस-वीस नये उपयोगी शब्द आते हैँ जर जो पाठक उनका उपयोग करेगे वे जल्दी संस्कृत वोल सकेंगे जज पाठ मेँ कोई नया शब्द नहीं दिया जा रहा, जो शब्द ओर वाक्य ~८ ४/७ चुके है, उन्हीं को आज आप दुबारा याद कीजिए, ताकि " "गए आप पिष्ठला पाठ भूलगे तो आगे नहीं वट्‌ सकगे हम क्रम चै वाक्य देने का यल करते कि शब्दों कोरटेविनादीवे याद हो जार हमारा प्रयल सफल होने के लिए आपका दृट्‌ अभ्यास भी तो आवश्यक है गन जाप नए संस्कृत-वाक्य वनाने के समय उरते होगे कि शायद वाक्य अशुद्ध , परन्तु आप एसा डर मन मेँ लाये आपके वाक्य शुद्ध हों अथवा अशुद्ध, कोड वात नही, आप वाक्य वनाते जाइए ओर साथ-साथ हमारे दिए हए वाक्यों की पद्धति ध्यान मेँ रखिए। आपके वाक्य धीरे-धीरे ठीक हो जार्गे इस पाट में पहले आए हुए शब्दों मे से करई नए वाक्य दिए गण हैँ स्वयं उनको विशेष ध्यान से पद्िए अगर आपके साथ पटृनेवाला कोई नहीं है, तो आप स्वयं ही ऊचे स्वर से पटृते रदिये तात्पर्य यह है कि आपकं कानों को संस्कृत भाषा

सुनने का अभ्यास हो जाए कई लोग शब्द तथा वाक्य मन मेँ ही याद करते है, यह वड़ी भारी गृलती है जव तक भाषा सुनने का कानों को अभ्यास होगा, तब तक कोई भाषा अच्छी तरह नहीं सकती इस कारण दो विद्यार्थियों का साथ पटना बहुत लाभकारी होता हे तथा बोलकर पटने से भी लाभ हो सकता हे। अब आगे लिखे हृए वाक्य स्मरण कीजिए-

वाक्य

1. तत्र शङ्करदासः गन्तुं शक्नोति वा-वहां शंकरदास जा सकता हे या नहीं ? 2. सः तत्र यदा गन्तुम्‌ इच्छति तदा गच्छति-वह वहो जब जाना चाहता है, तब जाता ह। 3. ईश्वरः सर्वत्र अस्ति-ईश्वर सव जगह हे। 4. सः आपणं गत्वा कुण्डलिनीम्‌ आनयति-वह बाजार जाकर जलेवी लाता है 5. यदा सः पाठशालां गच्छति, तदा उद्यानम्‌ अपि गच्छति-जब वह पाठशाला नहीं जाता, तव वाग भी नहीं जाता 6. त्वं सदा किमर्थं नगरं गच्छसि-तू हमेशा शहर क्यों जाता है ? 7. श्वः जालन्धरनगरं गमिष्यति, देवव्रतं आनेष्यति-वह कल जालन्धर आएगा ओर देवव्रत को ले आएगा 8. यदि जानसनः घटिकायन्त्रं सुष्टु करिष्यति तर्हि अहम्‌ आनेष्यामि-अगर जानसन घड़ी को ठीक करदेगातो मँ ले आंगा। 9. त्वम्‌ ओषधालयं कदा गमिष्यसि ओषधं कदा आनेष्यसि-तू दवाखाने कब जाएगा ओर दवा कव लाएगा ? 10. अह सर्वदा फलं भक्षयामि, अन्नं कदापि नेव भक्षयामि- मे हमेशा फल खाता हू, अनन कभी नही खाता | 11. तस्मे धनं, वस्त्रं अन्नं देहि-उसको धन, कपड़ा ओर अन्न दे। 12. शीघ्रं रयम्‌ आनय, अहं बहिः गन्तुम्‌ इच्छामि-जल्दी गाड़ी ले आ, मै बाहर जाना चाहता हू

| 13. हे दास ! दारम्‌ उद्घाटय, अहं आगन्तुम्‌ इच्छामि-अरे नौकर ! दरवाजा खोल, मे आना चाहता हू 14. पानार्थं मह्यं मधुर दुग्ध रेहि-पीने के लिए मुम मीठा दूध दे। (1) तस्मे फलं देहि। (2) यस्मै त्वया अन्नं दत्तं तस्मै जलम्‌ अपि देहि। (3) यस्मात्‌ स्थानात्‌ त्वम्‌ अय आगतः तस्मात्‌ स्थानात्‌ यज्ञदत्तः अपि आगतः ! (4) रामदेवः तत्र नास्ति इति कः वदति (5) धर्मद्तस्य एतत्‌ पुस्तकम्‌ अस्ति। (6) तत्‌ | सोमदत्तेन तत्र नीतम्‌ (7) कः प्रथमम्‌ उत्तिष्ठति (8) विश्वामित्रः शीप्रं वदति (67.

परीक्षा

पाठकों के इस समय तक वीस पाट हो चुके है य्ह उचित हे कि पाठक पूर्व पाठ को दुबारा पटठ़कर सव शब्द तथा वाक्य स्मरण करें ओर इन प्रश्नों का उत्तर देने के पश्चात्‌ ही इक्कीसर्वे पाठ को प्रारम्भ कर्‌।

प्रश्न (1) निम्न स्वरों की सन्धि कीनिए- + आ+ओ आ+इ उ+अ अ~+षए द्+आ | ओ~+आ +ड

| (2) निम्न शब्दो को सारतो विभवितियों के एकवचन के रूप दीजिए-

राम देवदत्त ग्राम इन्द्र नृपति भूपति। भानु कर्तृ धर्तृ

(3) निम्न शदो के पंचमी के एकवचन रूप लिखिए-

नरपति। चित्रभानु वसु किम्‌। अस्मद्‌ भोक्तु दातृ रथ कवि शम्भु

(4 निम्न वाक्यों के अर्थं लिखिए-

1. किं त्वम्‌ अय ग्रामं गच्छसि ? 2. सः तत्र गत्वा किं कि करोति ? ^“ अहं रानौ ग्रामाद्‌ बहिः गच्छामि 4. सः दिवा यत्र कुत्र अपि भ्रमति 5. अह परश्वः हरिदारं गत्वा गङ्गाजलम्‌ आनेष्यामि 6. पर्वतस्य शिखरं रमणीयं नास्ति 7. तेन उत्तमं पुस्तकं रचितम्‌ 8. सः स्नात्वा पठति, पठित्वा भोजनं करोति 9. रेः प्रकाशो भवति। 10. नृपतेः प्रसादेन तेन धनं प्राप्तम्‌ 11. मुनिना मोदकः भक्षितः 12. सः रानौ भोजनं करोति। 13. सेनापतिना सैन्यम्‌ अत्र आनीतम्‌ 14. वहिना सरव गृहं दग्धम्‌। 15. वाल्मीकिना रामायणं रचितम्‌ 16. व्यासेन महाभारतं लिखितम्‌

(5) निम्न वाक्यो का संस्कृत मेँ अनुवाद कीजिए-

1* वह नगर कब जाएगा ? 2. अब तू कहँ जाता है ? 3. बोल, तू वाँ क्यो नहीं जाता ? 4. भाई तू वहं शीघ्र जा। 5. जँ तू दिन मेँ जाता है, वरहो वह रत्नि मे जाता है। 6. वँ वह परसों कैसे जा सकता ? 7. तू अव वनकोजा, मै नगर जाङ्गा ओर मेरा भाई गोव जाएगा 8. भँ घर जाऊंगा 9. तू वर्ह जल्दी जा। 10. आज विष्णुशर्मा गया। 11. मँ परसों स्नान कस्गा

| | 68| 68 | 1. दग्धम्‌-जला।

पाट 321

रेखा-लकीर लोभः- लालच

सिद्धम्‌-तेयार शुः - स्वच्छ

वायुः-हवा नगरे-शदहर में

स्वभावः-जादत वेषः- पहनावा

मार्नारम्‌-विल्ली को अश्वम्‌-घोडे को

आकाशः- आकाश तारकाः-तारागण वाक््य

, तव भोजनं सिद्धम्‌ अस्ति इति त्वं जानासि किम्‌-तेरा भोजन तैयार है, यह

तू जानता है क्या? |

, भो मित्र ! अहं जानामि-मित्र ! मै नहीं जानता। , एतत्‌ ज्ञात्वा भोजनाय कथं आगमिष्यामि-यह जानकर भोजन के लिए केसे

नहीं आगा

. प्रातर्‌ एव उत्तिष्ठ व्यायामं कुरु-सवेरे ही उठ ओर व्यायाम कर

त्वं प्रातः वनं किमर्थं गच्छसि-त्‌ सवेरे वने को क्यों जाता है ?

. तत्र प्रातः शुद्धः वायुः भवति-वहौँ सवेरे शुद्ध वायु होती हे। . किं नगरे शुद्धः वायुः भवति-क्या शहर में शुद्ध वायु नहीं होती ?

नगरे शुद्धः वायुः कदापि भवति-शहर में शुद्ध वायु कभी नहीं होती

. त्वम्‌ अत्र सायङ्कालपर्यन्तं स्थातुं शक्नोषि किम्‌-त्‌ यहां शाम तक ठहर सकता

हे क्या?

. सः अतीव दुर्बलः जातः, अतः गन्तुं शक्नोति-वह बहुत ही दुर्बल हो गया

हे, इसलिए जा नहीं सकता।

. त्वम्‌ इदानी ज्वरितः असि, अतः अल्पम्‌ अन्नं भक्षय-तू अब ज्वर युक्त है,

इसलिए थोडा अन्न खा।

. सः किमर्थं मारं ताडयति-वह बिल्ली को क्यों मारता है ? . सः कदा नीरोगः भविष्यति-वह कब स्वस्थ होगा ?

. आकाशे तारकान्‌ पश्य-आकाश में तारे देख

. बालकः वने क्रीडति किम्‌-क्या बालक वन मेँ खेलता है ?

शब्द अस्तसमये-सूर्य डूबने के समय। भानुः-पूर्य

उदयतसमये-उदयकाल मे उदयते-उगता हे

हसनम्‌-हंसना प्रतिमा-मूर्ति।

रजकः-धोवी गृहीत्वा-लेकर

दुग्धपानार्थम्‌-दूध पीने के लिए। गोदुग्धम्‌-गाय का दूध

नमनम्‌- नमस्कार आलोकचित्रम्‌-फ़ोरोग्राफ़ वाक्य

1. एष भानुर्‌ आकाशे उदयते-यह सूर्य आकाश मेँ निकलता हे 2. यदा भानुर्‌ उदयते तदा आकाशः रक्तो जायते-जव सूर्य निकलता है तव आकाश लाल हो जाता है। | 3. यथा उदयसमये तया अस्तसमये अपि भवति-जैसा उदयकाल मेँ होता है, वैसा ` ही अस्तसमय र्मे भी होता है। * भद्रतेनः अतीव दिः अस्ति इति त्वं जानासि किमू-भद्रसेन अत्यन्त दद्र ` है, क्या यह तू नहीं जानता ? 5. पश्य, सः किमर्थं हसति-देख, वह व्यो हँसता ? | 6. अहमदः मार्गे पतितः अतः सः हसति-अहमद सड़क पर गिर पड़ा, इसलिए - वह हसता हे। | 7. किमू एतद्‌ वरम्‌ अस्ति-क्या यह टीक हे ? 5. एव हसन वरं नैव अस्ति-इस प्रकार हँसना ठीक नहीं हे। 9. इदानीं सः रनकः वस्त्रं कुत्र नयति-अव वह धोवी वस्त्र कहां ले जाता है। 10. सनकः प्रात्‌ एव वस्रं गृहीत्वा कूपं गच्छति-धोवी सवेरे ही वस्त्र लेकर कृ पर जाता है। 11. सः तन्र गत्वा वस्त्र प्र्नालयति-वह वरँ जाकर वस्र धोता ₹ै। 12. सः परकीयां गां किमर्थ गृहम्‌ आनयति-वह दूसरे की गाय किसलिए घर मेँ लाता है? 13. दुग्धपानार्थं गाम्‌ आनयति-(वह) दूध पीने कं लिए गाय लाता हे। 14. गोदुग्धं त्वं पिवति किमू्‌-गाय का दूध तू पीता हे क्या? 15. गोदुग्ं मिष्टं भवति अतः तदू एव अहं पिवामि-गाय का दूध मीठा होता है, इसलिए वही मेँ पीता हू। 16. श्रृणु, अद्य अह तत्र नैव गमिष्यामि-सुन, आज गैं वहाँ नहीं जागा

"7 @ > @3 78 चज

पुल्लिग मे युष्मत्‌" शब्द

1. प्रथमा त्वम्‌ तू 2. दितीया त्वाम्‌ तुञे 8. तुतीया त्वया तूने, तेरे दारा 4. चतुर्थी तुभ्यम्‌ तेरे लिए, तुद्य 5. पञ्चमी त्वत्‌ तुद्यसे 6. षष्टी तव तेरा 7. सप्तमी त्वयि तुज्ञमे, पर शब्द स्थातुम्‌-बेठने के लिए। उत्थातुम्‌ -उठने के लिए। आसितुम्‌-वेठने के लिए भोक्तुम्‌-खाने के लिए। पातुम्‌-पीने के लिए। स्वप्तुम्‌-सोने कं लिए। जेतुम्‌-विजय पाने के लिए। वक्तुम्‌-बोलने के लिए। स्वीकर्तुम्‌-स्वीकार करने के लिए। भक्षयितुम्‌-खाने के लिए गणयितुम्‌-गिनने के लिए। चोरयितुम्‌-चुराने के लिए। हसितुम्‌-हंसने के लिए। पठटितुम्‌-पट्ने के लिए। मार्ष्ठुम्‌-मोजने के लिए। ताउयितुम्‌-पीरने के लिए। जागरितुम्‌-जागने के लिए। चिन्तयितुम्‌-विचार करने के लिए। ्रष्टुम्‌-देखने के लिए। स्मर्तुम्‌ू-याद करने के लिए। वाक्य

त्व प्रष्टु गच्छ-तू पष्ठने के लिए जा।

- तत्र अन्नं भोक्तुं गच्छति- (वह) वहाँ अन्न खाने के लिए जाता हे।

` अहं जल पातुम्‌ अत्र आगतः-मे जल पीने के लिए यहां जया हू

- इश्वरदत्तः स्वप्तु स्वगृहं गतः- ईश्वरदत्त सोने के लिए अपने घर गया

- बालकः पठितुं इच्छति-वालक पटना नहीं चाहता

- सेनापतिः जेतुम्‌ उद्यमं करोति- सेनापति विजय पाने के लिए उद्योग करता है - त्वम्‌ अध्यापकस्य समीपे तं प्रशं प्रष्टुं गच्छसि किम्‌-क्या तू गुरु कं पास वह

प्रश्न पृषठने के लिए जाता है ?

- आः ! विष्णुशर्मा तत्र शीघ्रं गन्तुं धावति-अरे ! विष्णुशर्मा वर्ह जल्दी पहुचने [7]

के लिए दौडता है।

| 72 | 1. निवसति-रहता हे ४. भ्राता-भाई। 3. द्रष्टुम्‌-दखन के लिए। 4. अदच्चा-न देकर

9. सः गुरु प्रणम्य अध्ययनं करोति-वह गुरु को प्रणाम करके अध्ययन | |

है। सरत बवाक्त्य

1. किं त्वं तस्य गृहे तिष्ठसि ? 2. अहम्‌ आचार्यस्य समीपं वेदं पठितुं नित्यं गच्छामि 3. त्वं तस्मात्‌ स्थानात्‌ उत्थातुं इच्छसि किम्‌ ? 4. सः आसनाद्‌ उत्थातुम्‌ अपि इच्छति 5. त्वं कदा ग्रामं गन्तुम्‌ इच्छसि ? 6. अहं वने गत्वा व्याप्रं हन्तुम्‌ इच्छामि 1 7. केन सह त्वं वनं गमिष्यसि ? 8. अहम्‌ अद्य रात्रो सरदारदिलीपतिहेन सह वनं गमिष्यामि 9. केन दितीपसिंहेन सह त्वं गन्तुम्‌ इच्छसि ? 10. यः दिलीपतिंहः अमृतसरनगरे निवसति' 11. कस्य सः पुत्रः ? 12. सः सरदारसिंहस्य पुत्रः ज्वालासिहस्य भ्राता अस्ति ? 13. अहम्‌ अपि तं द्रष्टुम्‌" आगमिष्यामि 14. देवशर्मा इदानीं कत्र गतः ? 15. यत्र विश्वदेवः गतः तत्र एव देवशर्मा अपि गतः 16. देवदत्तः पुष्पमालां गृहीत्वा धावति 10. किमर्थं सः धावति ? 18. सः शीघ्रं गृहं गन्तुम्‌ इच्छति, अतः एव धावति 19. तेन द्रव्य दत्त्वा पठितम्‌ 20. परन्तु मया द्रव्यम्‌ अदत्वा, एव पठितम्‌ 21. यदि सः वेदं पटति तर्हि त्वम्‌ अपि वेदं पट 22. प्रातःकाले उत्थाय ईश्वरस्य स्मरणं" कर्तव्यम्‌ 28. प्रातःकाले उत्थाय विद्याऽभ्यासः कर्तव्यः।

24. प्रातःकाले अभ्यासे कृतेः विद्या सत्वरम्‌ आगमिष्यति 25. विद्यां विना व्यथ जीवनम्‌। 26. सः तत्र गत्वा आगतः किम्‌ 2

1. क्यातू उसके घर में रहताहै? 2. मैं गुरु के पास वेद पटने के लिए हमेशा जाता हू। 8. क्या तू उस स्थान से उठना नही चाहता ? 4. वह आसन से उठना भी नहीं चाहता। 5. तू कव गोव जाना चाहता है 6. मैँ वन जाकर बाघ मारना चाहता हू। 7. तू किसके साथ वन जाएगा ? 8. मै आज सरदार दिलीपसिंह कं साथ जाना चाहता हूं। 9. कौन से दिलीपसिंह के साथ जाना चाहते हो ? 10. जो अमृतसर में रहता है 11. वह किनका लडका हे ? 12. देवशर्मा आज ययँ नहीं है। 13. तू ऊपर जा, मँ नीचे जाता हू। 14. जलेविर्यौँ जल्दी ले आ।

| | | |

पाठ 2

शब्द स्मृत्वा-स्मरण करके ज्ञानम्‌-ङ्गन सदाचारः-सदाचार्‌ शृङ्गवेरम्‌-अदरक स्मरति-वह स्मरण करता है। स्मरसि-त्‌ स्मरण करता है। स्मरामि-स्मरण करता हू गणयति-वह गिनता हे। स्थान-जगह सकलम्‌- सम्पूर्ण विये -विषय में शास्त्रस्य- शास्त्र का।

स्मरिष्यति- वह स्मरण करेगा। चोरयति-वह चुराता हे। स्मरिष्यामि- स्मरण करूगा

वाक्य

1. सः स्मृत्वा वदति-वह स्मरण करके बोलता हे। 2. यस्य ज्ञानं नास्ति तस्मिन्‌ विषये सः किमर्थं वदति-जिसका ज्ञान नहीं हे, उस विषय मं वह क्यों बोलता है ?

3. सदाचारः एव धर्मः अस्ति-सदाचार ही धर्म हे

4. शृङ्गवेरं त्वं भक्षयसि किम्‌-क्या तू अदरक खाता हि?

5. देवदत्तस्य स्थानं त्वं जानासि किम्‌-देवदत्त का स्थान तू जानता हे क्या ?

6. इदानीं तु जानामि-अब तो नहीं जानता |

7. परन्तु स्मृत्वा वदिष्यामि-परन्तु स्मरण करके बताऊंगा

8. तस्य गृहम्‌ अतीव दूरम्‌ अस्ति-उसका घर बहुत दूर हे

9. तत्र त्वम्‌ इदानीं किमर्थं गन्तुम्‌ इच्छसि - वरह तू अब क्यों जाना चाहता ?

- सः शास्त्रस्य सवं ज्ञानं जानाति- वह शास्त्र का सब ज्ञान जानता है।

यदि त्वं तद्‌ ज्ञातुम्‌ इच्छसि तर्हि आगच्छ-अगर तू उसे जानना चाहता है, तो आ।

12. त्वं घृतं कथं पिवसि-तू धी कैसे पीता है?

13. अह तु पातुं शक्नोमि- में तो नहीं पी सकता

14. पश्य अह कथ पिवामि-देख, मँ कैसे पीता हू

1. स्मरणम्‌-याद 2. विद्याभ्यासः

-पटृना। 3. अभ्यासे कृते-अभ्यास करने पर 4. व्यर्थ 3 जीवनम्‌-जिन्दगी व्यर्थ है।

रबव्व

रिपुः-शतु | केशः-कंश

हस्तः-हाथ रोचते-पसन्द टे। मालिन्यम्‌-मलीनता माषवरी- कचोरी विक्रीय-वेचकर्‌ क्रीणति-वह खरीदता हे

क्रीणासि-तू खरीदता हे। क्रीणामि-खरीदता हू आलोकयति-वह देखता है। कृष्णः-काला

चेत्‌-यदि मा-नटीं। वा-अथवा | विलोकयति-वह देखता दै वाक्य

1. मालिन्यं वरं नास्ति- मलिनता अच्छी नहीं टै। 2. तस्य केशाः अतीव कृष्णाः सन्ति-उसकं वाल वहत काले हें . यदि रोचते तर्टिं गृहाण-अगर पसन्द हं तो ले। . रोचते चेत्‌" मा कूरु-यदि* पसन्द नहीं है (तो) कर - कि क्रीणाति पुष्पं फलं वा-क्या खरीदते हो फूल या फल > अहम्‌ इदानीं पुष्यं क्रीणामि नापि फलम्‌-न मे अव पूल खरीदना हँ ही फल . तर्हिं किमर्थम्‌ अत्र मार्गे तिष्टसि-ता तू क्यां यहां मार्ग में टहटरता हे ? - मम मित्रम्‌ इदानीम्‌ अत्र आगमिष्यति-मेरा मित्र अव यहा जाएगा ` 9. सः किम्‌ आनेष्यति-वह क्या लाएगा ? 10. सः इदानीं माषवटीः भक्षणार्थम्‌ आनेष्यति वह अव शवायै = ~+ "ना सान क्ते = कचोरी लाएगा। खान कं लिए कचौरी , तः दग्धं वह 5 11. तः दगध विक्रीय आगच्छति-वह दूध वैचकर आता हे।

दकारान्त पुल्लिंग ^तद्‌ शब्द

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1. प्रथमा

सः वह १, दितीया तम 8. त्तीया तेन

उसने

ˆ चत्‌ शब्द वाक्य पश्चात्‌ आता है, परन्तु उसका भाषा मं अर्थं पहले लिखा जाता है तथा "तो" शब्द संस्कृत मे वोता हुमा भी भापा मेँ अर्थ से वोला जाता हे।

4. चतुर्थी तस्मे उसके लिए

5. पञ्चमी तस्मात्‌ उससे

6. षष्टी तस्य उसका

7. सप्तमी तस्मिन्‌ उसमें, पर दकारान्त पुल्लिंग यद्‌" शब्द

1. प्रयमा यः जो

2. दितीया यम्‌ जिसको

3. तृतीया येन जिसने

4. चतुर्थी यस्मे जिस्तकं लिए

5. पञ्चमी यस्मात्‌ जिससे

6. षष्ठी यस्य जिसका

7. सप्तमी यस्मिन्‌ जिसमे, पर

- येन सह त्वं वदसि, सः साधुः अस्ति-जिसके साथ तू बोलता है, वह उत्तम

मनुष्य नहीं हे।

. यस्मे त्वं धनं दातुम्‌ इच्छसि, सः तत्र नास्ति-जिसके लिए तू धन देना चाहता

हे, वह वह नहीं है

यस्य गृहम्‌ अग्निना दग्धम्‌, सः अत्र आगतः-जिसका घर आगे से जला, वह

यर्हो गया हे।

- यस्मिन्‌ पात्रे दुग्धं रक्षितम्‌ तत्‌ पात्रं भिन्नम्‌-जिस बरतन में दूध रखा था,

वह टूट गया

` यस्मात्‌ ग्रामात्‌ त्वम्‌ इदानीम्‌ आगतः, तस्य कि नाम अस्ति-जिस गौव से

तू अब आया, उसका क्या नामदहै?

. यंत्वं पश्यतति सः कः अस्तिः-जिसको तू देखता है, वह कौन है ? ` यः पुस्तक पठति सः एव मम भ्राता अस्ति-जो पुस्तक पड़ता है, वह मेरा

भाई हे।

- यस्मे धनं दातुम्‌ इच्छसि किम्‌ सः ददिः अस्ति-(तू) जिसको धन देना चाहता

हे, क्या वह निर्धन हे ?

. येन सह वदसि तम्‌ एवं कथय-(तू) जिसके साथ बोलता है, उससे एेसा कह - चः कूपस्य जल पातुम्‌ इच्छति तस्मै कूपस्य एव जलं देहि-जो कुणँ का जल

पीना चाहता है, उसको कुरु का ही जल दे।

तथा यः गङ्गाजलं पातुम्‌ इच्छति तस्मै शुद्धं गङ्गाजलं देहि-ओर जो गंगाजल

पीना चाहता है उसको शुद्ध गंगाजल दे।

5

सरल वाक्य

1. श्रीरामचन्दस्य पत्रम्‌ आगतम्‌" 2. अहं पत्रं पठामि 3. देवदत्तः कन्दुकेन क्रीडति। 4. पश्य, सः युवा लक््मणशर्मा अत्र आगतः 5. विष्णुदत्तेन रामायणं नाम पुस्तकम्‌ आर्यमाषायांः लिखितम्‌ 6. तेन शूरेण व्याघ्रः हतः 7 सः आचार्यः सदा अन्न एव निवसति। 8. यदा सः पाठशालां गच्छति तदा दशवादन-समयः* भवति

9. यदा त्वं गङ्गाजलम्‌ आनेष्यसि तदा कूपस्य जलम्‌ अपिजनय 10. मध्याहसमयः

जातः पाठ 23 क्रीणति-खृरीदता डे इसके पहले "वि" लगाने से बेचता है" एेसा अर्थ होता हे देखो- क्रीणति-वह ख॒रीदता है क्रीणास्ि-तू खरीदता है। क्रीणामि-खरीदता दू क्रीत्वा-खुरीदकर्‌ सूची-सुई नौका-किश्ती विक्रीणीते-वह वेचता हे। . विक्रीणीषे-तू बेचता हे विक्रीणे-बेचता हू विक्रीय-बेचकर समीपम्‌-पास। कण्ठः-गला | | वाक्य 1. आपणं गत्वा त्वं कि क्रीणासि-अब तू बाजार जाकर क्या खरीदता 7 2. अहं पुस्तक मसीपात्र लेखनीं क्रीणामि-र्मे पुस्तक, दवात ओर कलम खरीदता ह| 8. त्वं यत्र स्यास्यति अहमपि तत्र स्थातुम्‌ इच्छामि-जहाँ तू ठदरेगा, मै भी वहोँ ठदहरना चाहता हू 4. यत्‌ त्वं तेखितुम्‌ इच्छति, तद अत्र लिख-जो तू लिखना चाहता है, वह यरो +

नवनीतं विक्रीय घृतं क्रीत्वा जआगच्छ-मक्खन बेचकर ओर घी खरीदकर आ।

-आया। 2. नाम-नामक। 3. आर्यभाषायाम्‌-हिन्दी भाषा ्मेँ। 4. दशवादन-

76 | समयः--दस बजे।

6. अयश्च आपणे पुराणं मलिनं ृतमस्ति-आजकल बाजार में पुराना ओर मलिन घीहे।

4. यदि तत्र नवीनं शुद्ध स्वादु घृतं नास्ति-अगर वहां नया, शुद्ध ओर मजेदार धी नहीं हे।

8. तर्हिं तद्‌ आनय-तो उसको ला।

9. अहं शुद्धम्‌ एव पृतं भक्षयामि-म शुद्ध धी ही खाता हू पहले हमने कहा है कि स्वर आगे आने से अनुस्वार का भम्‌" बन जाता है।

उदाहरण देखिए-

अहं अस्मि अहमस्मि मेरहू।

त्वं इच्छसि त्वमिच्छसि त्‌ चाहता हे। दुग्धं आनय दुग्धमानय दूध ला।

धृतं उत्तमं अस्ति घृतमुत्तमस्ति घी उत्तम है। त्वं ओषधं आनय त्वमोषधमानय तूदवाले आ।

इसी प्रकार संस्कृत में शब्द जोडे जाते है इसको देखकर पाठकों को घवबराना नहीं चाहिए इस समय तक हमने जोड़ (जिनको संस्कृत मे सन्धि कहते है) नहीं बताए, परन्तु अब बताना चाहते है यदि पाठक थोडा-सा ध्यान देगे तो उनको कोई कठिनता प्रतीत नहीं होगी जो-जो जोड (सन्धि) हम देगे, उनके अलग-अलग शब्द हम नीचे रिप्पणी मेँ देंगे जिससे पाठक यह जान सकेगे कि किन-किन शब्दों की वह सन्धि है जसे-त्वमत्र आगच्छ -तु यहो सः दुग्धमानयति-वह दूध लाता है। त्वमिदार्नी" क्र गच्छसि-तू अब करां जाता हे ? अहमत्र तिष्ठामि-मे यतँ ठहरता हू

जर्हो-जहौं इस प्रकार की सन्धि आए, वर्हा-वरह पाठकों को सोचना चाहिए कि किन-किन शब्दों की यह सन्धि हो सकती है।

पाठकों ने इस समय तक पुत्लिग शब्दों के प्रयोग का प्रकार जान लिया हे प्रायः पन्द्रह शब्द सातो विभक्तियों मे बताए हैँ अगर पाठक उनको ठीक स्मरण रखेंगे तो शब्दों के उनके समान रूप बनाने मेँ कोई कठिनाई नहीं होगी स्त्रीलिंग शब्दों के विषय में पाठकों को ध्यान रखना चाहिए कि कोई अकारान्त शब्द स्त्रीलिंग नहीं हे आकारान्त शब्द स्त्रीलिंग हुजा करते है क्षमा, कृपा, दया, भार्या, जाया,

1. अहं + अपि' इन दो शब्दों का जोड़ “अहमपि' होता है। शब्द कं अन्त में जो नुक्ता होता है उसको अनुस्वार कहते है, जैसे तं, दुग्धं" इत्यादि इस अनुस्वार के आगे स्वर आने से इसका “म्‌" बनता हि; जैसे "दुग्धं + अस्ति" इतका दुग्धम्‌ अस्ति दुग्धमस्ति) हो जाता है 2. त्वम्‌ अत्र) 3. दुग्धम्‌ आनयति 4. त्वम्‌ इदानीम्‌ 5. अहम्‌ अत्र

र)

बालिका, गंगा, ब्रह्मपुत्रा, विद्या, माला, लता, प्रविष्टा इत्यादि शब्द आकारान्त हैँ इनको | आकारान्त कहते हैँ क्योकि इनके अन्त मेँ “आः रहता है अव इनके रूप देखिए

आकारान्त स्नीलिग विद्याः शब्द

1. प्रयमा विद्या विद्या

2. दितीया विद्याम्‌ विद्या को

8. तृतीया विद्यया विद्याने

4. चतुर्थीं विद्यायै विद्या के लिए

5. पञ्चमी विद्यायाः विद्या से

6. षष्ठी विद्यायाः विद्या का

त, सप्तमी विद्यायाम्‌ विद्या में सम्बोधन दे) विदे हे विद्ये

निद्या के समान बननेवाले आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द

कुपा-दया | दया-कृपा, मेहरबानी

भार्या-स््री। बाला-लडकी

बालिका-लड़की गङ्गा-गंगा नदी

-यमुना नदी अम्बा-माता। | शाला-गृह, घर बृह्मपुत्रा- ब्रह्मपुत्र नदी | लता-बेल , माला-माला।

त्रिका-लडकी जाया-स्त्री, धर्मपत्नी प्रतिष्ठा-यश सुता-लडकी शर्करा-खांड, शक्कर पाठशाला-पाटशाला | धर्मशाला-धर्मशाला, सराय प्रपा-प्याऊ वाक्य 1. दयां कु-दया कर

भार्यया सह रामः वनं गतः-स्त्री के साथ राम वन को गये। यमुनायाः जलम्‌ आनीतम्‌-यमुना का जल लाया बालिकायाः वस्त्रम्‌ आनय-लडकी का कपड़ा ले आ। कुत्र गता-लडकी कहाँ गई ? दुग्धाय शकरा देहि-दूध के लिए शक्कर दे। [7] >, शर्करया मिष्टं भवति-शक्कर से मीठा होता है

8. धर्मशालायाः रक्षकः छत्र अस्ति-धर्मशाला का चौकीदार काँ हे

9. अम्बा बालिकया सह जच ग्रामं गता-माता लडकी के साथ आज गौव को नहीं गई

10. गङ्गायाः जलम्‌ आनयामि-गंगा का जल लाता हूं!

11. ईश्वरस्य दया अस्ति-ईश्वर की दया है।

12. ईश्वरस्य कृपया सर्वं शुभं भवति-ईश्वर की कृपा से सब -शुभ होता है,

13. तस्य शाला उत्तमा अस्ति-उसका मकान उत्तम हे।

14. या कृष्णस्य सुता सा पालकस्य भार्या-जो कृष्ण की लड़की है, वह पालक की धर्मपत्नी हे।

15. त्वया कस्मात्‌ स्थानात्‌ सा पुष्पमाला आनीता-तुम किस स्थान से वह ्ूलों की माला लाए हो।

सरल वाक्य

1. सः तत्र तिष्ठति 2. अहम्‌ अत्र क्रीडामि 3. सः पाठशालां गत्वा पुस्तकं पठति 4. त्वं शुद्धं गङ्गाजलं पिबसि 5. त्वं तत्‌ स्मरसि किम्‌ ? 6. सः स्वगृहं गत्वा अन्नं भक्षयति 7. रामः तम्‌ एवं वदति। 8. शृणु, इदाना हरिः दिल्लीनगरं गन्तुम्‌ इच्छति 9. इदानीं तत्र गन्तव्यम्‌ इति त्वं तं कथय 10. नरः ग्रामं गच्छति किम्‌ ! अथ किम्‌ ? सः अद्य एव ग्रामं गमिष्यति 11. चौरः धनं चोरयति। 12. पण्डितः पुस्तक पठति 13. धेनुः वनं गमिष्यति 14. सा पुननिका पुष्पमालां करोति। 15. रामः फलं भक्षयति 16. अद्य सा बालिका अम्बया सह वनं गता 17. रामेण सह लक्ष्मणः वनं गतः। सीतया सह रामः वनं गतः

पाट 24 शब्द

पादुके-जूता, खड़ाऊं वृषभः- वेल मेषः- मेढा श्रुणोति-वह सुनता है शृणोषि- तू सुनता है। शुणोमि-सुनता ह| मस्तकपीडा-सिर दर्द। धूम्रयानम्‌-रेलगाडी धरटिका-घड़ी अश्वः-योड़ा। श्रुत्वा-सुनकर श्रोतुम्‌-सुनने के लिए। क्क

श्रुतम्‌-सुना ` स्मरणपुस्तकम्‌-डायरी। 2

वाक्य

1. मम पाटुके गृहाण तस्मै देहि-मेरी खडाऊं ले ओर उसको दे। | * पश्य, तत्‌ धूम्रयानं कथं शीप्रं गच्छति-देख, वह रेलगाड़ी केसी जल्दी जाती है। मेषः धावति परन्तु अश्वः तिष्ठति- मेदा दौडता है, परन्तु घोड़ा खड़ा हे। इह इदानीं श्रीकृष्णः हवनार्थम्‌ आगमिष्यति-यरहौँ अव श्रीकृष्ण हवन के लिए | आएगा। 5. सः इदानीं सन्ध्याम्‌ उपास्य पठनम्‌ आरभते-वह अब सन्ध्या करकं पढ़ना आरम्भ कत्ता है। 6. त्वं माम्‌ अधुना किम्‌ आन्ञापयसि-तू अव मुल्ञे क्या आज्ञा करता हे ? 7. शृणु, त्वम्‌ इदानीं वनं गच्छ, अत्र एव तिष्ठ-सुन, तू अब वन को जा (ओर) यहीं ठहर | 8. किं त्वं कुशलः असि इदानीम्‌-क्या अव तू नीरोग हे ? 9. अहमिदार्नी" कुशलः अस्मि-मे अब स्वस्थ हू 10. भो मित्र ! तण्डुलाः कुत्र सन्ति-हे मित्र ! चावल कहाँ हैँ ? 11. सः यया श्रुतमस्ति" तथा एव वदति-वह जैसा सुनता है वैसा ही बोलता है। 12. यथा-यथा सः मालिन्यं त्यजति, तथा-तया शुद्धः भवति-जैसे-जैसे वह मलिनता | छोडता है, वैसे-वैसे शुद्ध होता है। |

¢> © +ॐ

शब्व

कथाम्‌-कथा को ` उपदेशम्‌-उपदेश को व्याख्यानम्‌-व्या्यान को। पण्डितः-पंडित, विदान्‌ श्रवणाय-सुनने के लिए। उद्याने-बाग में। शिवालये-शिवालय में दास्यति-वह देगा दास्यसि-तू देगा। दास्यामि-दूगा त्यक्त्वा-छोडकर्‌। दष्ट्वा-देखकर

वाक्य

1. त्वम्‌ इदानीं कुत्र गन्तुम्‌ इच्छसि-तू अब करा जाना चाहता है ? 2. अहमदः उपदेशं श्रोतुं गच्छामि आज उपदेश सुनने के लिए जाता

स्थापय-रख चल-चल, जा | | |

| | 1. अहम्‌ इदानीम्‌ 2. धतम्‌ अस्ति। 3. अहम्‌ अद्य |

3. कुत्र अस्ति उपदेशः अद्य-कर्टँ है उपदेश आज ? 4. तत्र उद्याने पण्डितः विश्वामित्रः उपदेश दास्यति- वहाँ वाग में पंडित विश्वामिन्न उपदेश देगे। 5. न, उद्याने उपदेशः नास्ति, शिवालये अस्ति-न्हीं नहीं, वाग में उपदेश नहीं हे, शिवालय में हे 6. कः वर व्याख्यानं ददाति-कीन अच्छा व्याख्यान देता हे। 7. पण्डितवरः देवव्रतः एव उत्तमं व्याख्यानं ददाति-पण्डित देवव्रत ही अच्छा व्याख्यान देते हे 8. व्याख्यानश्रवणाय आलस्यं त्यक्त्वा गच्छ-व्याख्यान सुनने के लिए आलस्य छोडकर जा। 9. प्रथमं शुद्धं जलम्‌ आनय, पश्चाद्‌ भोजनं कुरु-पहले शुद्ध जल ला, पीछे भोजन कर। 10. सः अश्वं दष्ट्वा कि स्मरति-घोडे को देखकर उसे क्या याद अती हे ? 11. तत्र वायुः नास्ति, जलमपि' नेवास्तिः-वहँ वायु नहीं है, जल भी नहीं है 12. मन्दिरे मार्जारः नास्ति, अतः दुग्धं तत्र स्थापय-मन्दिर मे बिल्ली नहीं है इसलिए दूध वर्ह रख 13. त्वं गोदुग्धं गृहीत्वा एव शिवालयं गच्छ-तू गाय का दूध लेकर ही शिवालय जा। 14. सः पण्डितः कत्र अस्ति इदानीम्‌-वह पण्डित करा है अब ?

आकारान्त स्त्रीलिग प्रतिज्ञाः शब्द

1. प्रथमा प्रतिज्ञा प्रतिज्ञा

2. दितीया प्रतिज्ञाम्‌ प्रतिज्ञा को

3. तुतीया प्रतिज्ञया प्रतिज्ञा से

4. चतुर्थी ` प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञा के लिए 5. पञ्चमी प्रतिज्ञायाः प्रतिज्ञा से

6. षष्ठी प्रतिज्ञा का

7. सप्तमी प्रतिज्ञायाम्‌ प्रतिज्ञा में

सम्बोधन (ह) प्रतिज्ञे हे प्रतिज्ञा

आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के पंचमी तथा षष्टी एकवचन के रूप एकः ही होते हैं। इसलिए पष्टी के रूप के स्थान पर () एेसा चिह दिया हे

1. जलम्‌ अपि। 2. न-एव-अस्नि।

मतलव यह हे कि यह का रूप ऊपर के रूप के समान ही होता है आगे भी जर्ह-जहन स्पोँके नीचे (*) एेसा चिह दिया होगा, वहाँ पाठक समज्ञँ कि यँ का रूप उपरिवत्‌

होता है। आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द इच्छा-ए्वादिश कामात्मता-विषयीपन, कामीपन। चिन्ता-फरिकर निह्ा- जवान ।. दीक्षा-त्रत। मुक्ता-मोती रेखा-लकीर कन्या-लड़की निद्रा-नीद। पूजा-सत्कार पाषाणपटिका-स्लेट मूर्खता-पागलपन मलिनता-गंदगी बुधा- भू देवता-देवी। गीता-गीता। आज्ञा-हक्म ` | चेष्टा-प्रयल जरा-वुदरापा। ` ` वारिका-वगीचा। पत्रिका-पत्र, खत अपूजा- सत्कार करना खक्षता-रूखापन पूपला-खांड की पूरी हद्धिा-हत्दी। _ सन्ध्या-ध्यान

वाक्य सः इच्छा करोति-वह इच्छा करता ह। | | त्वया सा मुक्ता कुत्र स्थापिता-तूने वह मोती कँ रखा ? | गीतायां किमू उक्तम्‌ ?-मीता मेँ क्या कहा है | तस्य आज्ञया अहम्‌ इद कार्य करोमि-उसकी आज्ञा से मैँ यह कार्य कर रहा | 4 | | त्वं देवतायाः पूजा कुरु-तू देवता की पूजा कर

| |

भर ७७ +

तेन पत्रिका प्रेषिता किम्‌-क्या उसने पत्र भेजा है ? जरायै किम्‌ ओषधम्‌-वुटापे की क्या दवा ?

: पीतः वर्णः-हल्दी का पीला रंग। | ` तस्य कन्यया मुक्ता न्म आनीता-उसकी लडकी मोती नहीं लाई | ` मनुष्यः निढया वदति-मनुष्य जृवान से बोलता है |

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सरल वाक्य

1. रामः मित्रेण सह कुत्र तिष्ठति ? आचार्यः शिष्येण सह वदति गुरुः कुमारिकिया सह कयां वदति 2. कन्यया सह सः मनुष्यः उद्यान गच्छति किं सः मनुष्यः प्रतिदिनं कन्यया सह उद्यानं गच्छति ? अथ किम्‌, सः पुरुषः प्रतिदिनं सायंकाले पंचवादनसमये भ्रमणाय कन्यया सह उद्यानं गच्छति ? 3. तदा तनत्वम्‌ अपि गच्छसि किम्‌ ? अय किम्‌ अहम्‌ अपि तस्मिन्‌ एव समये उद्यानं गच्छामि ? 4. रामाय नमः ईश्वराय नमः नमः ते। नमस्ते तस्मै नमः। अम्बायै नमः। 5. वृक्षात्‌ फलं पतति। पर्वतात्‌ वक्षः पतितः। नगरात्‌ जनः आगच्छति। तडागात्‌ जलम्‌ आनयामि उद्यानात्‌ पुष्पम्‌ आनयति आपणात्‌ वस्त्रम्‌ आनय।

पाट 25

शब्द स्थापयति- वह रखता है स्थापयसि-तू रखता हे। स्थापयामि-रखता ` प्रत्येकम्‌-हरएक नित्यम्‌- नित्य परमेश्वरम्‌-ईश्वर को कृतम्‌-किया स्थापनम्‌-रखना सवति-चूता हे। स्थापयित्वा-रखकर स्थापयितुम्‌-रखने के लिए। स्थापनाय-रखने के लिए्‌। मञ्चः- मेज विष्टरः-कुरसी, आसन गतः-गया आगतः-आ गया सस्थाप्य-रखकर विरोधः-मुक्राबला

वाक्य

1. नित्यं परमेश्वरं स्मृत्वा कर्म कुरु-नित्य परमेश्वर को समरण करके कार्य कर ˆ तः मम पुस्तक कुर स्थापयति-वह मेरी पुस्तक करौ रखता है ? यन मचः अस्ति तत्र सः तत्‌ स्थापयति-जलँ मेज्‌ है, वँ वह उसे रखता हे। 4 सः तत्र दीपं स्थापयितुं गतः-वह वरँ दीप रखने के लिए गया हे। 5. त्वं मसीपात्रं कुत्र स्थापयितुम्‌ इच्छसि-तू दवात करा रखना चाहता हे >

७9 †ॐ

| | | | |

6. सः तत्र फलं स्थापयित्वा अत्र आगतः- वह वर्ह फल रखकर यहाँ आया। |

7. कृतं कर्म स्मर-किया हुमा कर्म स्मरण कर

8. अत्र स्थित्वा कर्म कुरु नोचेत्‌ अत्र तिष्ठ-यर्हौ रहकर कार्य कर, नहीं तो |

याँ ठहर 9. यदि वरं कर्म कर्तुमिच्छति" तर्हि एव अत्र तिष्ठ-अगर श्रेष्ठ कार्यं करना चाहता

है, तो ही यहा रह | 10. नोचेत्‌ यत्र इच्छसि तत्र दतं गच्छ-नटीं तो जहा चाहता हे, वर्ह शीघ्र जा 11. अहं निर्धनः अस्मि, पुस्तकं पठितुमिच्छामि' मे निर्धन दू, पुस्तक पटना चाहता

ह्‌ 12. सः मञ्चं गृहीत्वा अत्र एव आगच्छति-वह मेज लेकर यहीं आता हे।

शब्व

आलेख्यम्‌-तसवीर 1 कस्य-किसका

तस्य-उसक उपविश-वैठ

उपविशति-(वह) बैठता है। उपविशसि-(तू) वेठता हे

उपविशामि-बेठता हू उपविश्य-वैटकर वाक्य

एतत्‌ कस्य आलेख्यम्‌ अस्ति-यह किसका चित्र हे ?

सः पुरुषः श्रुतमपिः स्मरति-वह मनुष्य सुना हुआ भी नहीं स्मरण रखता त्वं तस्य व्याख्यानं शृणोषि किम्‌-तू उसका व्याख्यान सुनता है क्या ? अन्न एव उपविश व्याख्यानं श्ृणु-यहीं वेठ ओर व्याख्यान सुन

सः तत्र एव उपविश्य सर्वं पश्यति-वह वहीं बैठकर सव कुछ देखता हे कः अत्र उपविश्य आलेख्यं करोति-यहोँ बैठकर कौन तसवीर खीचता है ? श्रीधरः अत्र स्थित्वा आलेख्यम्‌ आलिखति- श्रीधर यहौँ ठहरकर चित्र खीचता

9

उक्तमेवः पनः पुनः वदति-वह के इए, को ही बार-बार बोलता हे। यदि त्वम्‌ अत्र एव उपविशति तर्हि अहं तुभ्य द्रव्य दास्यामि-अगर तू यहीं ` वैठेगा, तो ्ैँ तुज्ञे धन रदूगा। | 0. सः किमर्थं सदा शिवालयं गच्छति-वह हमेशा मन्दिर क्यों जाता है? 11, सः तत्र गत्वा सन्ध्यामुपास्तेऽ, ईश्वरं स्मरति-वह वर्ह जाकर सन्ध्या करता

11 = कर्तम्‌ इच्छसि। 2. पठितुम्‌ इच्छामि 3. श्रुतम्‌ अपि। 4. उक्तम एव 5. सन्ध्याम्‌ उपास्ते

1

हे ओर ईश्वर का स्मरण करता हे। 12. अहं स्वरम्‌ अत्र स्थापयामि- मं अपनी गाड़ी यहाँ नहीं रगा ! 13. मम विष्टरः कुत्र अस्ति-मेरी कुर्सी कहाँ है ? 14. यत्र द्यः स्यापितः तत्र एव अस्ति-जर्हा कल रखी थी वहीं

ईकारान्त स्रीलिग “नदीः शब्द

1. प्रथमा नदी नदी

2. दितीया नदीम्‌ नदी को

3. तृतीया नद्या नदी से

4, चतुर्थीं नदी को लिए

5. पञ्चमी नयाः नदी से

6. षष्ठी नदी का

7. सप्तमी नयाम्‌ नदी में

सम्बोधन (हे) नदि हे नदि

नदी" शब्द के समान चलनेवाले शब्द

मातुलानी, मातुली-मामी मात॒भगिनी-मासी

पित्रभगिनी-वुज भगिनी-वहिन

मातामही--नानी ब्राह्मणी ब्राह्मण की स्ी।

उर्वी- पृथ्वी कण्डलिनी-जलेवी

पित्तामही-दादी करुमारी-लड़की

कमलिनी-कमल की वेल इनक सव विभक्तियां के रूप वनाकर पाठक उनसे बहुत-से वाक्य बना सकते है। सरल वाक्य

1. यज्ञदत्तात्‌ देवदत्तः पुस्तक गृहाति 2. सोमदत्तात्‌ व्राद्मणः धनं गृयाति सः व्राद्यणः तडगात्‌ रक्तं कमलम्‌ आनयति 3. रामस्य रावणेन सह युद्धं भवति रावणस्य रामेण सह युद्धं भवति भीमस्य जरासन्धेन सह युद्धं जातम्‌" जरासन्धस्य भीमसेनेन सह युद्धं जातम्‌ 4. तत्र हरिः अस्ति तं हरिं पश्य हरिणा पुस्तकं लिखितम्‌ हरये नमः हरेः लेखनीम्‌ आनय इदं हरेः" गृहम्‌ अस्ति। हरौ पापं नास्ति।

85 1. जातम्‌-हा गया। 2. हरेः-हरि स। 3. हेः-हरि का। (85 |

पाठ 26

| शब्द | | भाक्रोशति गर्जति शति-चिल्लाता है पुी-नगर, शहर | | हि (वह) गरजता है। गर्जसि- (त्‌) गरजता हे। | : --गरजता हू! कीदृशम्‌-कंसा

वाढमू- निश्चय से। महिषः-र्भसा |

ग्तयम्‌-गोल ` अड्गनम्‌- आंगन |

उपथिः-स्ूल धरिका-घरिका

तूष्णीम्‌ -चुपचाप ! शूकरः-सूअर।

तिह

1. वने सिंहः गर्जति, ग्रामे शूकरः गर्जति-वन में शेर गरजता है, ग्राम में सूअर `

गरजता है | 2. त्वं वृथा किमर्थं गर्जति-तू व्यर्थ क्यों गरजता है ? 3. आकाशे अधुना गर्नति-अव आकाश में मेघ गरजता हे | 4. ` : सायप्रातः गेरजति-वागर मे शेर सायंकाल तथा प्रातःकाल गरजता ¦ 5. यदि त्व तत्र गमिष्यसि तर्हि तत्‌ कथं ज्ञास्यसि-अगर तू वरटा जाएगा तो उते कंसे जानेगा ? - ` | 6. त्वम्‌ इदानीमेव" ओषधालयं गच्छ ओषधं आनय-तू अभी दवाछाने जा ओर दवा ले आ। 7. यदि त्वं मुदृगौदनं भक्षयिष्यसि तर्हि स्वस्थः भविष्यसि-अगर तू खिचड़ी खाएगा तो अच्छहो जाएगा , ,. | 8. सः दुग्धम्‌ अपूपं भक्षयितुमिच्छति°--वह दूध ओर पेडा खाना चाहता है। ` 9. -तिंहः कदापि अन्नं भक्षयति-शेर कभी अन्न नहीं खाता | 10. अहम्‌ इदानीमेव स्नात्वा शीघ्रमागमिष्यामि* अभी स्नान करके जल्दी आँगा ` #: शुद्धं धौत वस्त्र देहि-शुद्ध धोया हुआ वस्त्र दे |

--- भरि इच्छति 3. शीघ्रम्‌ आगमिष्यामि

1.

शब्द

भोजनात्‌- भोजन से। अभ्यन्तरे-अन्दर

परिचारकः-नोकर नगरात्‌-शहर से।

ग्रामात्‌-गोंव से। गृहात्‌-घर से।

कूपात्‌-कू्णं से। प्रायः- बहुधा वाक्य

1. ब्रूहि, त्वं प्रातः सन्ध्यां करोषि वा-वोल, तू सवेरे सन्ध्या करता है या नहीं ?

2. वद, त्वं तत्‌ पुस्तकं पठसि वा-बतला, तू वह पुस्तक पठता है या नहीं ?

8. यद्‌, अहं त्वामाज्ञापयामि तत्‌ कर्म शीघ्रं कुरु-में तुञ्चे जो आज्ञा करता हुं उसे जल्दी कर

4. नोचेत्‌ त्वाम्‌ अधुना एव ताडयिष्यामि-नहीं तो तुञे अभी पीर्ठूगा

5. अहं भोजनात्‌ पूर्वं किमपि' कर्म कर्तुं इच्छामि- मं भोजन के पूर्वं कोड भी

कार्य नहीं करना चाहता

6. ठे परिचारक ! कपाटमुदुघारय अहमभ्यन्तरेः आगन्तुमिच्छामिः-अरे नौकर ! दरवाजा खोल, मे अन्दर ` आना चाहता हू

7. यद्‌ अहं वदामि तत्‌ श्रृणोषि किम्‌-जो मै कहता हू, वह तू नहीं सुनता

हे क्या?

8. यदि त्वम्‌ उच्यैः वदसि तदा अहं तव भाषणं श्रोतुं शक्नोमि-अगर तू ऊंचा

बोलता हे तो मेँ तेरी बात सुन सकता हू।

9. सः नगरात्‌ नगरं गच्छति-वह (एक) शहर से (दूसरे) शहर को जाता है। सः ग्रामाद्‌ वहिः गत्वा वनं गतः-वह गोव से बाहर जाकर नन को गया। सः मनुष्यः कूपात्‌ जलमानयति'-वह आदमी कुँ से जल लाता है

12. सः इदानीमेव. गृहात्‌ वहिर्गतः- वह अभी घर से बाहर गया हे। सः पुनः कदा गृहमागमिष्यति°-वह फिर घर कब आएगा ?

14. सः प्रायः सायङ्कालमागमिष्यतिः-वह शाम तक आएगा

15. सुतः रक्षति-लड़का रक्षा करता हे।

16. कुमारी तिष्ठति--लड़की ठहरती हे।

17. अहमत्र लिखामि-मे यहौँ लिखता हू

18. मातामही नीचैः स्वपिति-नानी नीचे सोती है।

1. किम्‌ अपि 2. अहम्‌ अभ्यन्तरे 3. आगन्तुम्‌ इच्छामि 4. जलम्‌ आनयति। 5. इदानीम्‌ पव 6. गृहम्‌ आगमिप्यति। 7. सायंकालम्‌ आगमिष्यति

£: - 19; तस्य भ्राता धर -तिघति-उसका भाई अच्छा नहीं लिखता ˆ -- 20. कः त्वम्‌-तू कोन है ? | 21. सः कः अस्ति-वह कौन ? | 22. सः दूरं तिष्ठति-वह टूर ठहरता है 29. तव उपानत्‌ कुत्र अस्ति-तेरा जूता करटौ है ? | 24. तस्य भ्राता शीघ्रं आगमिष्यति-उसका भाई जल्दी नहीं आएगा 25. एष कः अस्ति-यह कौन है ? | 26. तव भ्राता क्व अस्ति-तेरा भाई कँ है ? | 27. सः किं लिखति-वह क्या लिखता हे ?

सरल वाक्य

1. तस्मे कुण्डलिनीं देहि 2. तस्य सुतः दुग्धम्‌ पिवति 3. तस्य भ्राता गह गच्छति 4. धनं दत्वा फलं गृहाण 5. मित्राय पत्रं लिख 6. तस्मे पुष्यं देहि। 2. यदा त्वं स्वपिषि तदा तव भ्राता कुत्र भवति ? 8- सः वनं गत्वा फलं भक्षयति। 9. यदा सः वनं गतः तदा अहं गतः। 10. सः मां ताडयति। 11. सः तन्‌ एव किमर्थं ताडयति ? 12. त्वम्‌ तस्य पुस्तकं गृहीत्वा शीप्रम्‌ अत्र आगच्छ 13. सः त्वा

जानाति किम्‌ ? 14. तस्य पुत्रः पुस्तकं चोरयति 15. कः तुभ्यम्‌ अय भोग

जाः पाट 2 शब्द अटति-वह पूमरता है। अटसि-त्‌ पूमता हे। अटामि-पूमता हू अटित्वा-घूमकर अटितुम्‌-घूमने के लिए। अरिष्यति- (वह) घूमेगा अरिष्यसि-तू धूमेगा अरिष्यामि-घूरमूगा चक्वम्‌-पका हु पठितम्‌-पट़ा हजा। ` वाक्य

1. कृष्णवन्रः नित्यं गमद ग्रामम्‌ अटति- कृष्णचन्द्र नित्य (एक) गोव से (दूर) गोव घूमता है।

` 2: तं कुमारं पश्य किं सः करोति इति-उस लड़के को देख कि वह क्या कर रहा है। 3. सः भोजनाय पक्वमन्नं! पानाय जलं इच्छति-वह भोजन के लिए पका हुआ अन्न ओर पीने के लिए जल चाहता हे। 4. सः पठितमपि पाठं स्मरति-वह पटे हए पाठ को भी नहीं स्मरण करता। 5. सः द्रव्यं दक्वा धान्यं क्रीणाति-वह धन देकर धान खरीदता हे 6. सः रात्रौ किमपि भक्षयति-वह रात्रि में कुठ भी नहीं खाता। 7. सूर्यं दृष्ट्वा जनः उत्तिष्ठति-सूर्य को देखकर मनुष्य उठता है 8. तथा तारकान्‌ दृष्ट्वा मनुष्यः स्वपिति-सितारे देखकर मनुष्य सोता है। 9. सः सर्वदा वृथा अरितुमिच्छतिः-वह हमेशा व्यर्थ घूमना चाहता है। 10. सः इदानीं किं करोति इति अहं ज्ञातुमिच्छामिः- वह अव क्या करता है, यह मे जानना चाहता हू। 11. शीघ्रं रथमानयः, अहम्‌ अन्यं नगरं गन्तुमिच्छामिः-जल्दी गाड़ी ले आ, मेँ दूसरे नगर जाना चाहता हू 12. इदानी मेषः गर्जति, अतः वहिर्‌ गच्छ-अब मेष गरज रहा हे, इस कारण

बाहर जा।

शब्द व्टुः- बालक पीडयति- (वह) दुःख देता हे। पीडयसि- (तू) दुःख देता है। पीडयामि-दुःख देता हू ऊर्ध्वम्‌-ऊपर, पश्चात्‌ उपरि-ऊपर यतिः-सन्यासी। ` ब्हु-वहुत वृक्षस्य-वृक्ष के श्रान्तम्‌-थका हुआ प्रतीयते-मालूम होता हे खण्डः-टुकड़।

वाक्य

1. पश्य, सः वालः कथ शीघ्रं धावति-देख, वह बालक कैसा तेज दौडता हे 2. भो मित्र ! इदानीं मां वुधुक्षा अतीव पीडयति-मित्र ! अव मुञ्ञे भूख बहुत ही दुःख देती हे।

1. पक्वम्‌ अन्नम्‌ 2. असितुम्‌ इच्छति 3. ज्ञातुम्‌ इच्छामि 4. रथम आनय 5. गन्तुम्‌ इच्छामि | 39

त्व मह्य पक्वम्‌ अनन दातुं शक्नोषि किम्‌-त्‌ मुञ्चे पका हुआ अन्न दे सकता

क्या?

भोजनाद्‌ ऊर्ध्वं त्वं शीतं जलमपि' पातुमिच्छसि" किमू्‌-भोजन के पश्चात्‌ क्या |

तू टंडा जल भी पीना चाहता है?

. यदि त्वं शीतं जलमपि आनेतुं शक्नोषि तर्हि शीघ्रम्‌ आनय-अगर तू ठंडा जत

भीलासकतादटहेतो जल्दी ले जआ।

. यत्‌ त्वम्‌ इच्छसि तत्‌ अहम्‌ आनेष्यामि-जो. तू चाहता है, वह मँ

लाजंगा।

* एतद्‌ अन्नम्‌ अतीव उष्णम्‌ अस्ति-यह अन्न बहुत ही गरम दहे। . मम भ्राता इदानीं कुत्र गतः, जानामि-मेरा भाई अव करटा गया है, (भै)

नहीं जानता

12.

13.

. सः उद्याने वृक्षस्य अद्यः इदानीं स्वपिति-वह वाग मेँ वृक्ष कं नीचे रहा सो रहा

हे।

. सः वहु कर्म कृत्वा श्रान्तः इति प्रतीयते-वह बहुत कार्य करके धका हज

है, एेसा मालूम होता है।

. सः तत्र तूष्णीमेव स्थितः, किमपि+ वदति-वह वँ चुपचाप वैटा है, कुठ

भी नीं बोल रहा है। सः स्वपाठं स्मरति इति प्रतीयते- वह अपना पाठ याद करता है, एेसा मालूम

होता है। सः स्वगृहमिदारनीः रक्षति अतः वहिर्‌ गन्तुं शक्नोति-वह अपने धर की रक्षा

कर रहा है इसलिए बाहर नहीं जा सकता

उकारान्त स्त्रीलिग “येनु" शब्द

1. प्रथमा धेनुः गौ

2. दितीया धेनुम्‌ गौ को

3. तृतीया पेन्वा ` ` गौ से

4. चतुर्थी . येन्वे . गौ के लिए धेन्वै |

5. पञ्यमी धेनोः गौ से धेन्वाः

6. षष्ठी धेनोः | गोका

धेन्वाः 7. सप्तमी धेनो गोमें धेन्वाम्‌ | सम्बोधन (हे) धेनो हे गी

चतुर्थी से सप्तमी तक चारों विभक्तयो मे एकवचन के रूप दो-दो होते हे

यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।

८2 @ >~ @ >> @3 39

क, म्य गां @ॐ 89 => >

शब्द रज्जुः-रस्सी तनुः-शरीर हनुः-टृडी वाक्य

. मातृदेवो भव-माता को देवता समञ्ञ

. पित्॒देवो भव-पिता को देवता समञ्च

. आचार्यदेवो भव-गुरु को देवता समञ्च

, अतिथिदेवो भव-अतिथि को देवता मान।

. सत्यं ब्रूयात्‌-सच बोल

, प्रियं ब्रूयात्‌-प्रिय वोल

. सत्यम्‌ अप्रियं ब्रूयात्‌-अप्रिय सत्य वोल

. प्रियम्‌ असत्यं ब्रूयात्‌- प्रिय असत्य बोल

. सत्यात्‌ परः धर्मः नास्ति-सत्य से ऊँचा धर्म नहीं हे।

. असत्यसमः नः कः अपि अधर्मः-असत्य के समान कोई अधर्म भी नहीं। . इह एहि-यहां

. श्वः विसृष्टिः अस्ति-कल छदी हे।

. शास्त्रेण विना मनुष्यः जन्धः-शास्त्र के विना मनुष्य अन्धा हे।

सरल वाक्य-सवाद

रामः-हे मित्र ! त्वं कत्र गच्छसि इदानीम्‌ ?

विष्णुः-इदानीमह भ्रमणार्थं गच्छामि

रामः-कः समयः इदानीम्‌ ?

विष्णुः-इदानी सप्तवादनसमयः।

रामः-इदानी भ्रमणाय वहिः गत्वा पुनः कदा स्वगृहमागमिष्यसि ? विष्णुः-अहमवश्यमष्टवादनसमये स्वगृहमागमिष्यामि

रा

रामः-तर्हिं अहमपि त्वया सह आगच्छामि विष्णुः-आगच्छ तर्हि शीप्रम्‌ समयः गच्छति रामः-शीप्रमागतः' क्षणं तिष्ट |

पाट 28

^स्मर' के पूर्वं वि" लगाने से "विस्मर' रूप वनता है ओर उसका अर्थ “भूलनां हेता है। देखिए-

स्मरति-स्मरण करता है स्मरसि-तू स्मरण करता है। स्मरामि-स्मरण करता हू। स्मरिष्यति-वह स्मरण करेगा स्मरिष्यति-तू स्मरण करेगा। स्मरिष्यामि-स्मरण करूगा त्वया-तूने मया-मेने। तेन-उसने। विस्मरति-वह भूलता हे विस्मरसि-तू भूलता ह। विस्मरामि-भूलता हू विस्मरिष्यति-वह भूलेगा विस्मरिष्यसि-तू भूलेगा विस्मरिष्यामि-भूर्तूगा बालकेन-लडके से। पुरुषेण-मनुष्य ने। पुत्रेण-पुत्र से। वाक्य

1. यतु त्वं पठसि ततु सर्वदा स्मरसि वा-जो तू पटृता है, उसे स्मरण करता

हेया नहीं?

2. यदू अहं पठामि तत्‌ कदापि विस्मरामि-जो मेँ पटृता हू, वह कभी नहीं भूलता 3. यदि त्वम्‌ एवं विस्मरिष्यति तर्हिं कयं पटिष्यसि-अगर तू इस प्रकार भूलेगा . तो कैसे पदरेगा ?

4. अत्तः ऊर्ध्वं विस्मरिष्यामि-में इसके पश्चात्‌ नहीं भूर्लुगा

5. यथा तव गुरुः आज्ञापयति तथा कुरु-जेसा तेरा गुरु आज्ञा देता है, वैसा कर। 6. सः मां वृथा पीडयति-वह मुज्ञ व्यर्थ दुःख देता हे।

7. अतः अहं तमू अवश्यं ताडयिष्यामि-इसलिए मै उसको अवश्य पीरटरगा

8. सः महिषः कस्य अस्ति-वह भेता किसका ?

9. सः महिषः नास्ति वृषभः अस्ति-वह भसा नही, वैल हे

1. जल्दी आया। 2. क्षण-भर ठहर

(८) ,- < - त, ~

गतः-गया भलितम्‌-खाया

स्वीकुतम्‌-स्वीकार किया

नीतम्‌-ले गया कृतम्‌-किया स्नातम्‌-स्नान किया जातम्‌-उत्पननन हुआ। स्थितम्‌-ठ्हरा हु गृहीतम्‌-लिया स्मृतम्‌-स्मरण किया श्रुतम्‌-सुना। पठितम्‌-पट़ा पिहितम्‌-वन्द किया ज्ञातम्‌- जाना ्रक्षालितम्‌-धोया रक्षितम्‌-रक्षा की क्रीतम्‌- खरीदा अटितम्‌-घूमा

शब्द

आगतम्‌-आ गया दत्तम्‌-दिया उक्तम्‌-कहा आनीतम्‌-लाया पीतम्‌-पिया। इष्टः-वाछठित उत्यितम्‌-उठा हआ तादितम्‌- ताडना किया (पीटा) हुञा आज्ञापितम्‌-आज्ञा को विस्मृतम्‌-भूला दृष्टम्‌-देखा उद्धारितम्‌-खोला लिखितम्‌-लिखा। विज्ञातम्‌- जाना क्रीडितम्‌-खेला आरब्धम्‌-आरम्भ किया। विक्रीतम्‌-बेचा कथितम्‌-कहा।

वाक्य

. त्वया फलं नीतं किम्‌-क्या तू फल ले गया ?

. मया तद्‌ अद्यापि" दृष्टम्‌ -मेने वह आज भी नहीं देखा , बालकेन वस्त्रं प्रक्षालितम्‌-बालक ने कपड़ा धोया

. मया शोभनं कर्म आरब्यम्‌-मेने भ्रष्ठ कार्य आरम्भ किया , त्वया तत्‌ कथं विस्मृतम्‌-तूने वह कैसे भुला दिया ?

ऋकारान्त स्त्रीलिग मातु" शब्द

1. प्रथमा 2. दितीया

1. अद्य + अपि।

माता माता मातरम्‌

माताको

8. तृतीया मात्रा माता सते

& चतु मातरे माता के लिए 5. पञ्चमी मातुः माता से 6. षष्ठी मातुः माता का 7. सप्तमी मातरि माता में सम्बोधन हे) मातः हे माता

'माताः शब्द के समान चलने वाले शब्द | दुहित-लडइकी, पुत्री यात्रु-देवरानी ननन्द, ननान्दर-ननद, पति की बहिन |

वाक्य

. सर्वदा उद्यमः कर्तव्यः-सदा उद्योग करना चाहिए ` | . उद्यमेन एव सुखं भवति-उद्योग से ही सुख होता है। . भुक्त्वा वदरीफलं भक्षणीयम्‌-भोजन करके बेर खाना चादिए। . अभुक्त्वा आमलक पथ्यम्‌-भोजन करके (भोजन से पूर्व) आंवला हितकर

है। ९. ५९ . त्वं बालकेन सह करीडसि-तू लड़के के साथ खेलता है। 1 . अहं तु क्रीडामि-में तो नहीं खेलता ;

(. मि ~ , , -

सः तत्र किमर्थं कोलाहलं करोति-वह वर्ह क्यों शोर करता हे ? . यदि अहं क्रीडिष्यामि तर्हिं गुरुः मां ताडयिष्यति-अगर मेँ खे्लँगा तो गुरु मुज्ञ | मारेगा तव मातुः किम्‌ नाम अस्ति-तेरी माता का क्या नाम हे? | 10. तस्य पितुः नाम यज्ञदत्तशर्मा इति-उसके पिता का नाम यज्ञदत्त शर्मा हे। 11. दुग्धं फल - भक्षयामि-दूध पीकर फल खाऊँंगा 12. अश्वः शीघ्रं धावति-घोड़ा तेज दौडता हे। | सरल वाक्य (1) किमर्थ त्वं तत्र गत्वा मोदक भक्षयति ? (2) मया तत्‌ कर्म कतम्‌। (3) दुर्जनः अन्यस्मै दुःखं ददाति। (‰) सुजनः अन्यस्मै सुखं ददाति। (5) आकाशे रविं पश्य (6) पाठशालायां सदा नियमेन गन्तव्यम्‌ (7) मित्रेण सह कलहः कर्तव्यः (8) यदा गरुः पाठ पाटयति तदा तत्र चित्तं देयम्‌ (9) इतस्ततः द्रष्टव्यम्‌ (10)

94 | सशर्करं दुग्धं पेयम्‌

© © छद

+ >|

शब्द

अन्यस्मे-दूसरों कं लिए। कलहः-इगड़ा। देयम्‌-देने योग्य दरष्टव्यम्‌-देखने योग्य पेयम्‌-पीने योग्य दुर्जनः-दुष्ट व्यक्त्ति सुननः- सज्जन नियमः-नियम चित्तम्‌-मन, दिल इतस्ततः- इधर-उधर सशकरम्‌-खांड से युक्त वदरीफलम्‌- बेर कर्म-उद्योग

सरल वाक्य

1. सः यत्‌ पठति तत्‌ कदाऽपि विस्मरति 2. अह यत्‌ शृणोमि तत्‌ कदापि

विस्मरामि 3. यथा गुरूः मां आज्ञापयति तथैव अहं करोमि 4. त्वं वालकेन सह किमर्थं क्रीडसि इदानीम्‌ ? 5. तं पुरुषं त्वं पश्यसि किम्‌ ? 6. यदा-यदा प्रकाशः भवति तदा-तदा दीपं प्रज्वालय ।9

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८6

10.

पाठ 29

- इदार्नी त्वया कि करृतम्‌-अव तूने क्या किया ?

- ग्रहं गत्वा अधुना मया अन्नं भक्षितम्‌-घर जाकर अब मैने अन्न खाया |

- तस्य पुस्तक त्वया नीतं किम्‌-उसकी पुस्तक तूने ली है क्या ?

- तेन तदु वरं कर्म अ्यापि कृतम्‌-उसने वह अच्छा काम अब तक नहीं किया। - तत्‌ सर्वं शोभनं जातम्‌-वह सब ठीक हुआ

यत्‌ त्वया पुस्तक गृहीतं तत्‌ मम अस्ति-जो तूने पुस्तक ली वह मेरी हे। - यत्‌ त्वया आज्ञापितं तत्‌ मया श्ुतम्‌-जो तूने आज्ञा की वह मैने नहीं सुनी किमू त्वया स्मृतं यत्‌ तेन उक्तम्‌-क्या तुञ्ञे स्मरण नहीं जो उसने कहा

था।

. यत्‌ तेन उक्तं तत्‌ सर्वं मया पूर्वम्‌ एव विस्मृतम्‌-जो उसने कहा वह सव मैने

पहले ही भुला दिया यत्‌ त्वया दृष्टं तत्‌ सर्वं कथय-जो तूने देखा वह सब कह

1. सुनता हू। 2. वैसा ही 3. जलाओ।

[ऋ]

> ६4 9 ॥। 1 )

. यदि त्वया तद्‌ ज्ञातं तत्‌ मामपि वद-अगर तूने उस जान लिया तो मुज्ञ

वता। . यदि त्वया स्वगृहं रक्षितं तर्हि वरं कृतम्‌-अगर तूने अपने मकान की रक्षा की

तो अच्छा किवा।

, यदि त्वया अद्यापि वस्त्रं विक्रीतम्‌-अगर तूने आज भी कपड़ा नर्हीं वेचा। . तर्हि तद्‌ मद्यं देहि-तो उसे मुञ्चे दे। , यदि त्वया इदानीं पर्यन्तं दारं उदुधाटितम्‌-अगर तूने अव तक दरवाजा नही

खोला

. तत्‌ केन उदूधारितम्‌ इति शीघ्रं कथय-तो किसने उसे खोला यह शीघ्र कह। . तद्‌ अहं जानामि-वह मैं नहीं जानता , त्वया जलं पीतं किम्‌-तूने जल पिया क्या ?

शब्द ग्लानिः-शिथिलता, धिन अभ्युत्थानम्‌-उन्नति खलु-निश्चय से। मूलम्‌-जड्‌ सत्यात्‌-सत्यता से। परः-श्रेष्ट, दूसरा, भिन्न प्रतिष्ठितम्‌-स्थित है। पिष्टक्व-उवलरोटी | वाक्य

यदा-यदा धर्मस्य ग्लानिः भवति-जव-जव धर्म की शिथिलता होती हे। तदा-तदा अधर्मस्य अभ्युत्थानं भवति-तव-तव अधर्म की उन्नति होती है।

, सत्यात्‌ परः धर्मः नास्ति-सत्य से श्रेष्ट दूसरा धर्म नहीं है

असत्यात्‌ परः अधर्मः कः अपि अस्ति-असत्य से बड़ा अधर्म कोई भी नही हे।

त्वं सत्यं वदसि इति वरं करोषि-तू सत्य वोलता. है, यह ठीक करता है। कदापि असत्यं वद-कभी-भी असत्य वोल।

, सर्व खलु धर्ममूलं सत्य प्रतिष्ठितम्‌-निश्चय ही सब धर्मो का मूल सत्य में स्थित

हे। यः सत्यं वदति सः असत्यवादी भवति-जो सत्य नहीं बोलता है वह असत्यवादी

होता है। असत्यात्‌ दाद्ध्यं वरम्‌ अस्ति-असत्य से ग्रीवी अच्छी हे।

. त्वं सर्वदा असत्यं किमर्थं वदसि-तू सर्वदा असत्य क्यों वोलता है ?

मया कदापि असत्यं उक्तम्‌-मेने कभी असत्य नहीं बोला

1१.

1

14.

15.

यद्‌ द्रवयं मया रक्षितं तत्‌ सर्व त्वया त्यक्तम्‌-जो द्रव्य मेने रखा था, वह सब तूने छोड दिया।

. पुनः पुनः श्रुतम्‌ अपि लेखितुं शक्नोमि-बार-वार सुने हुए को भी भैं लिख

नहीं सकता।

यत्‌ जलं त्वया आनीतं तत्‌ शुद्ध नास्ति-जो जल तू लाया है, वह शुद्ध नहीं हे। मया कूपात्‌ जलम्‌ आनीतम्‌ अस्ति, अतः तद्‌ शुद्धम्‌ एव अस्ति-कुे से जल लाया हू, इसलिए वह शुद्ध ही है।

दकारान्त स्त्रीलिग ^तद्‌" शब्द

1. प्रथमा सा वह स्त्री 2. दितीया ताम्‌ उसको

8. तुतीया तया उसने 4. चतुर्थी तस्यै उसके लिए + 5. पञ्चमी तस्याः उससे 6. षष्ठी तस्याः उसका 7. सप्तमी तस्याम्‌ उसमें

"तद्‌" शब्द के पुल्लिग रूप पहले दिए हुए हे पाठकों को चाहिए कि वे पुल्लिंग

रूपों मे जो भिन्नता है उसको टीक प्रकार समञ्च लें पुल्लिंग शब्द के बदले पुल्लिंग रूप अर्एँगे ओर स्त्रीलिंग शब्द के बदले स्त्रीलिंग रूप आर्पगे, यह नियम है नीचे दिए वाक्यों को ध्यान से देखने से इस नियम का पूरा पता लग जाएगा

1.

| ह|

वाक्य

यः पुरुषः ग्रामाद्‌ आगतः सः इदानीम्‌ अत्र नास्ति-जो व्यक्ति गोव से आया, वह अब य्ह नहीं है।

. या वालिका नगरं गता सा कस्य पुत्री-जो लड़की शहर गई वह किसकी पुत्री

ठे?

. तं पुत्रं तस्मिन्‌ स्थाने पश्य-उस पुत्र को उस स्थान में देख

4. तां प्री तस्मिन्‌ स्थाने पश्य-उस बेटी को उस स्थान में देख

नइ =>

. तव धर्मपत्नी अत्र अस्ति किम्‌ ? यदि अस्ति तर्हि तया किम्‌ इदानीं कर्तव्यम्‌-तेरी

धर्मपली यहो है क्या ? अगर है तो उसे अब क्या करना है?

. तस्थै जलं देहि-उस स्त्री के लिए जल दे। . तस्याः वस्त्र कत्र अस्ति-उस स्त्री का कपड़ा कहँ है ?

8. तां पाठशालां पश्य, तस्यां मम

पत्रः पठति-उस पाटशाला को देख, उसमें मेए

| लडका पदता है। 9. यत्र त्वं गच्छति तत्र सा गच्छति किम्‌-जर्हो तू जाती वरौ वह नहीं जाती है क्या? पाठ 30 शब्द्‌ गनः-हाधी सर्पः-सोप। लवपुरम्‌-लाहीर नैव-नहीं विद्या्तयम्‌-पाटशाला को ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारी शब्दः-शब्द उदेति-उगता है, निकलता हे। प्रयलः-उद्योग अधिकारः-ओहदा प्रकाशः-प्रकाश अन्धकारः-अंधिरा। षण्टानादः-घंटे की आवाज्‌। एकः-एक प्रयमः-पहला। दितीयः-दूसरा | वाक्य

पुस्तकं लेखनीं मसीपात्रं मद्यदेहि-पुस्तक, क्लम ओर दवात मुञ्चे दे। . कोलाहलं कुरु इति हरिदत्तं कथय-हरिदत्त से कह कि कोलाहल करे। यत्र भूमितरः अस्ति तत्र तवं शीप्रं गच्छ-जहा भूमित्र है वर्हँ तू शप्र जा। . तत्र वृषभः जलं पिबति-वहौ वैल जल पीता है। * सः लवपुरम्‌ अतः ऊर्ध्व नेव गमिष्यति-वह इसके पश्चात्‌ लाहौर नहीं जाएगा। . यत्र शूकरः धावति तत्र त्मपि' गच्छ जौ सूर दौडता हे वरल तू भी जा। . अत्र दीपः नास्ति अतः अहं किमपि पश्यामि-यर्हौ दीपक नहीं है, इसलिए मे कुष्ठ भी नहीं देख पाता। | 8. विद्यालयं पश्य, तत्र मम व्रहचारी पठति-विद्यालय को देख, वहाँ मेरा ब्रह्मचारी (बालक) पदता हे 9. सः वृथा एव असत्यं वदत्ति-वह व्यर्थ ही ज्ूठ बोलता हे। 10. यदा प्रातःकाले सूर्यः उदेति-जवब प्रातःकाल सूर्य निकलता है।

(%| 1. त्वम्‌ + अपि। 2. किम्‌ + अपि।

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- तदा सर्वत्र प्रकाशः भवति-तब सब स्थानों पर प्रकाश हो जाता हे। पण्टानादः भवति, त्वं तं श्रृणु-षण्टी बज रही है, तू उसे सुन

शब्द नाम-नाम। आगतः- जाया निपुणः-प्रवीण स्वामी-स्वामी। स्वनगरम्‌-अपने शहर को धर्मप्रचारम्‌-धर्म के प्रचार को। वाक्य

. सः पण्डितः अस्ति-वह बुद्धिमान्‌ है

. तस्य नाम विश्वामित्र शर्मा इति-उसका नाम विश्वामित्र शर्मा हे

. सः कलिकत्तानगरात्‌ अत्र आगतः-वह कलकत्ता शहर से यहा आया हे

- अत्र तेन शोभनं व्याख्यानं दत्तम्‌- य्ह उसने अच्छा व्याख्यान दिया

. सः वरं व्याख्यानं ददाति-वह अच्छा व्या्यान देता हे

- एवम्‌ अत्र कः अपि वक्तुं शक्नोति-इस प्रकार यर्हौँ कोई भी नहीं बोल

सकता

7. सः संस्कृत-भाषायां प्रवीणः अस्ति-वह संस्कृत-भाषा में निपुण हे

. यथा स्वामी सर्वदानन्दः प्रवीणः अस्ति-जैसे स्वामी सर्वदानन्द प्रवीण है। ~ तथा पण्डितः विश्वामित्र शर्मा-नहीं है) वैसे पं. विश्वामित्र शर्मा

- त्वया तस्य व्याख्यानं श्रुतं किम्‌-क्या तूने उसका व्याख्यान सुना ?

. कदा सः पुनः स्वनगरं गमिष्यति-वह फिर कब अपने शहर जाएगा ?

12. सः इदानीं नेव गमिष्यति-वह अव नहीं जाएगा 13. अत्र स्थित्वा सः कि कर्तुमिच्छति" - याँ ठहरकर वह क्या करना चाहता है ? 14. अत्र स्थित्वा सः धर्मप्रचारं करिष्यति- यहाँ ठहरकर वह धर्म का प्रचार करेगा 15. यदि सः अत्र स्यास्यति तर्हि वरं भविष्यति-अगर वह यहाँ ठहरेगा तो अच्छा होगा दकारान्त स्त्रीलिग “यद्‌ शब्द 1. प्रयमा या जो स्त्री 2. दितीया याम्‌ जिसको 8. तुतीया यया जिससे 1. कर्तुम्‌ + इच्छति

4. चतुर यस्यै निसके लिए +

6. पञ्चमी यस्याः निससे ¢. ष्ठ ( जिसका 7. सप्तमी यस्याम्‌ जिसमें

स्त्रीलिंग "किम्‌" शब्द 1. प्रथमा का कौन स्री

2. दितीया काम्‌ किसको 9. तृतीया कया किसने

^“ चतुरी कस्ये किसकं लिए 5. पञ्चमी कस्याः किससे 9. षष्टी -9 किसका 1 सप्तमी कस्याम्‌ किसमें र, वाक्य 1. का

पुत्रिका पुस्तकं पटति-कन-सी वेट पुस्तक पट्ती हे ? या वािका पाटशालां गच्छति सा एव पटितुं शक्नोति-जो लडकी पाटशात्‌। 3. जाती है, वही पट्‌ सकती का पठं तस्थै धनं वस्त्रं देदि-जिस ने पुस्तक प्म कपड़ा दे। , ` प्ाःकते लं तत्र गतः सा आगता किम्‌-जिस के लिए तू वहा 5. नहीं आई क्या ? मे पठशालायां मम पुत्रः पठति, तव अपि तस्याम्‌ एव पटति-निस पाटशाता 6. तस्यां शड्का पटृता है, उसमे ही तेरा भी पढ़ता है 7. पठनस्य (त भक्ति धारय-उस देवता मे भक्ति धारण करो का तस्याः शब्दः महान्‌ भवति-पट्ने के समय उस वडा होता हे। ६।

अब परीक्षा भश्नो तीस पाठ हो चुके है अव पाठकों की परीक्षा होगी अगर घ्व बाह कि 9 यैक-रौक दै सगे तो ये आगे वद सकते हं अन्यथा उन ४५ भेवे १: के तीस पाठ प्रारम्भ से दुवारा षटं ओर सबको टीक-टीक याद

# | याद होगा तव तक आगे वठ्ने से कोई लाभ नही।

प्रन (1) निम्न शब्दों की सातो विभक्तियों के एकवचन रूप दीनिए- पुल्लिग शब्द मार्ग देव भाग। धनञ्जय कवि। अरि। भानु पित भ्रात सर्व।

स्त्रीलिंग शब्द

उपासना दया मातृ विद्या जिह्म नासिका। किम्‌। यद्‌ धेनु नदी

(2) निम्न शब्दों कं केवल तृतीया, चतुर्थी तथा पंचमी के एकवचन रूप लिखिए-

राम देवता विष्णु कर्तृ अस्मत्‌

(3) निम्न वाक्यों का हिन्दी मे अर्थ लिखिए-

सः त्वां जानाति किम्‌ ? यदा सः आगतः तदा एव त्वं गतः दशरथस्य पुत्र भरीरमचन्द्रः अस्ति विश्वामित्रेण सह रामचन्द्रः वनं गतः तत्र का अद्य अन्नं भक्षयति ? सा वाला तस्मिन्‌ गृहे पठति।

(4) निम्न वाक्यों के उत्तर संस्कृत में ही दीनिए-

तव किम्‌ नाम अस्ति ? इदानीं त्वं किम्‌ पठसि ? श्रीकृष्णचन्द्रः कस्य पुत्रः आसीत्‌ ? श्रीरामचन्देण केन सह युद्धं कृतम्‌ ? धर्मेण किम्‌ भवति

(5) निम्न वाक्यों के संस्कृत-वाक्य बनाइए-

पाठशाला जाता हू। वह मुञ्ञे देखता है। राजा ने उसके लिए धन दिया | र्य आकाश आया प्रातःकाल संध्या कर सवेरे उठ ओर स्नान कर |

(6) आप कोई एक कथा संस्कृत में लिखने का यल कीजिए

(7) निम्न शब्दों के अर्थ कीनिए-

उत्तिष्ठ व्यायामः। पचवादनसमयः। नागः। याचकः सैनिकः रविः। कोलाहलः स्वमपि युवा कुशलः शुभम्‌। जाया

पाठ 31

फो विशेष ज्ञान होते हुए भी आपने संस्कृत-भाषा में व्यावहारिक बातचीत करने की योग्यता प्राप्त की है।

अव सके पश्चात्‌ व्याकरण का थोडा परिचय करने की आवश्यकता हे 101

व्याकरण जानने कं तिए प्रथम संस्कृत अक्षरो की वनावट पर तथा शब्दों की घस एक दृष्टि डालनी चाहिए, अन्यथा व्याकरण के नियम टीक ध्यान मेँ नरह कत्‌ | व्यजन ओर स्वर मिलकर संस्कृत के तथा हिन्दी कं अक्षर वनते टै जसे देखिए- क्‌ + जनक म्‌ + अनम। ल्‌ + अनल तै = अर्थात्‌ कमलः शब्द की वनावर "क्‌ +अ~+म्‌+अ+ल्‌+अः इतने वगो ईर इसी प्रकार- (+) + (म्‌ + जराम (+ड) + (त्‌ + आ}=पिता। (उ)+ (द्‌ +य्‌ + आ) + (न्‌ + + मतउदयानम्‌ (ड) + (श + वू + अ) + (र + अगे=ईश्वरः। प्‌+उ)+ (स्‌+त्‌+अ)+ (कू + + मुनपुस्तकम्‌ (य्‌ ++ त्‌)=यत्‌ | | द्‌ (५ + (व्‌ + अःे=देवः। ठे १९ को चाहिए कि वे इस अक्षर-क्रम तथा शब्द-क्रम को स्का जते जे तषे जते है वते ही वते भी जत है ओौए ,> वे ही तिचे भी जाते हं ।उर्दू-अंगरेजी की तरह 'लिखना कुष्ठ, ओर वोता हिज्ञो बरी वात यँ नहीं ह, इसलिए संस्कृत का शब्द-क्रम (57०117६; स्यैतिग- "रअग्रजी की अपेक्षा सुगम है। चत (९ मं व्यंजन ओर स्वर आमने-सामने आते ही जुड़ जाते जत (स तम्‌ + अपि-तमपि। यद्‌ + (२ + आगच्छ-त्वमागच्छ। तद्‌ -यदस्ति। इस " भस्ति- तदस्त को पहिए केयोगका वर्णन हम आगे के पाठ मेँ करेगे। इसतिए पाठकों प-वहं वे इस योग की व्यवस्था को ध्यान में रखें जरह जरह योग आएगा अव के नीचे रिप्पणी देकर उस शब्द को खोलकर भी वताएंगे। स्न ावयों वाक्य दिए जाते हैँ उनकी ओर पाठकों को ध्यान देना चाहिए। अन्द्र उक्त प्रकार के योग दिए गए है।

वाक्य

. यदस्ति! तत्र, तदत्र त्वमानय-जो वयँ है, उसे तू यहां ले आ।

, रामः शीप्रमागच्छति"-राम जल्दी आता हे।

. त्वमधुना पुस्तक देहि-तू अव पुस्तक दे

. तदधुना, तत्र नास्ति -वह अव वां नहीं हे।

, सः कदापि असत्यं नेव* वदति-वह कभी भी असत्य नहीं बोलता

. सः पुष्पमानयति'"-वह फूल लाता है।

, त्वमिदानीं! कि करोषि-तू अव क्या करता है।

, अहमधुना'" आलेख्यं पश्यामि- मे अव चित्र देखता हू

. त्वमिदानीं किमर्थं हुसेनमाज्ञापयसि!°- तू अव क्यों हुसेन को आज्ञा करता है ?

, मित्र ! पश्य, कय सः रथः शीघ्रं धावति-मित्र ! देख, वह रथ (गाडी) कैसा जल्दी दौडता है।

, तत्र सूर्य पश्य- वहाँ सूर्य को देख

, यदत्र अस्ति तत्‌ तुभ्यमहं दास्यामि-जो याँ है वह तुचे में दगा।

, अश्वः धावति-घोड़ा दौडता है

, मनुष्यः अश्वं पश्यति-मनुष्य घोडे को देखता है

, त्वमपि" तत्र गच्छ-तू भी वरहो जा।

. सः पुरुषः वृद्धः अस्ति-वह मनुष्य वृह है।

17. सः वालः अतीव दुर्बलः अस्ति-वह लड़का वहुत ही दुर्बल हे

पृत्लिग ओर स्त्रीलिंग सर्वनामों का उपयोग

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(न्वी, रि 1 , ` @ लर "> = 2 +=

बतानेवाले वाक्य 1. सः पुरुषः सास्त्री। . तं पुरुष पर्य तां स्त्री पश्य। 8. यः पश्यति या पश्यति। 4. कः पठति। का पठति। 6. त्वं कस्मै धन ददासि त्वं कस्यै धनं ददासि

1. वद्‌ + अस्ति। 2. तद्‌. अन्र। $ त्वम्‌ . आनय। 4. शीघ्रम्‌ . आगच्छति 8. त्वम्‌. अधुना। 6. तद्‌. अधुना 7. न. अस्ति। 8. कदा. अपि। 9. न. एव 10. पुष्पम्‌ - भनयति। 11. लम्‌. इदानीम्‌ 12. अहम्‌, अधुना। 13. हुसैनम्‌. आज्ञापयसि 14) ५५ ` जत्रे। 15. तुभ्यम्‌. जहम्‌। 16. त्वम्‌. अपि।

13. कस्य गृहम्‌ अस्ति।

यस्यै त्वम्‌ इच्छसि

यया पुत्निकया जलं पीतम्‌ तस्ये देहि।

या गच्छति

का एवं वदति।

सा वदति।

कया पठितम्‌

कस्याः गृहम्‌ अस्ति।

संस्कत मे पत्न-लेखन अलमोडानगरे श्रावणस्य शुक्ल-चतुर्दश्याम्‌ रविवासरे सं. 2005 ्रियमन कृष्णवर्न नमस्ते। तव पत्रम्‌ अद्य एव लब्धम्‌ आनन्दः जातः अहं तव नगरं शीघ्र अत्र मम वृहू कर्तव्यम्‌ अस्ति अहं श्वः हिमपर्वतं गमिष्यामि तस्य स्थानस्य नाम त्वं जानासि एव तस्य पर्वतशिखरस्य नाम धवलगिरिः इति अस्ति तस्य ईश्यम्‌ अतीव सुन्दरम्‌ अस्ति। यदि त्वं तत्र आगमिष्यसि तहि वरं भविष्यति यदि आगन्तुम्‌ इच्छसि तर्हिं मम मातरम्‌ अपि आत्मना सह आनय सर्वम्‌ अत्र कुशलम्‌ अस्ति। तव सदैव कुशलम्‌ इच्छामि

तव मित्रम्‌ सीतारामः शब्द

भो-ते। नमस्ते-तुमको नमस्कार

लब्धम्‌ प्राप्त हुआ, मिला आनन्दः--खुशी

रमु ~-अच्छा बूहु- बहुत

हिमम्‌- वफ पर्वतः-पहाड

शिखरम्‌- (पहाड की) चोटी दृश्यम्‌ -दृश्य, नजारा

शलम्‌- मंगल, राजी-खुशी तपस्या-तप

सरल वाक्य

तेव | 105 पिका कुतर अस्ति ? सा मात्रा सह हरिदारनगरं गता कदा सापुनः स्वगृहमागमिष्यति ? (105

यदा तस्याः माता कि करोति ? ऋषीकेशनामकं | करोति ? तत्र कन्यागुरुकरुलम्‌ अस्ति। तत्र -कथव। ( ता जध्ययन कर्तुम्‌ इच्छति तर्हि एवं कथय। किमर्थम्‌ असत्यं वदसि सा तत्र तपस्यां करोति इति। |

पाठ 32

शब्द कं जन्त मेँ जो हल्‌ “म्‌' होता है वह क" से 'ह' तक के किसी वरणं अर्यात्‌ किसी भौ व्यनन के प्रे होने परं अनुस्वार (बिन्दी नुक्ता) हो जाता ्ै। यदि उस भू" के सामने कोई स्वर अ, आदि जाता ते मिल सकता है या अलग ही रहता है; किन्तु

"कः से ह' परे रहते :

देवम्‌ + पश्य=देवं पश्य ज्ञानम्‌ + दत्तम्‌ जानं दत्तम्‌ जलम्‌ + देहिनजलं देहि।

स्वर परे रहते :

|

1.

| ,

= © ऽ, छ,

र्वम्‌ + अस्ति= सर्वमस्ति या सर्वम्‌ अस्ति। ओदनम्‌ + अचि =ओदनमयि या ओदनम्‌ अयि। शीघ्रम्‌ + ओदनम्‌=शीघ्रमोदनम्‌ या शीघ्रम्‌ ओदनम्‌

वाक््य

देवः तत्र गच्छति-देव (विदान्‌) वर्ह जाता है।

तं देवं पश्य-उस देव को देख

देवेन ज्ञानं दत्तम्‌-देव (विद्वान्‌) ने ज्ञान दिया

देवाय जलं देहि-देव के लिए (को) जल दे

देवात्‌ द्रव्यं गृहामि-देव से द्रव्य लेता हू।

देवस्य एतत्‌ सर्वम्‌ अस्ति-देव का यह सब हे।

देवे सर्वम अस्ति-देव (ईश्वर) के अन्दर सब कुछ है। हे देव ! अत्र पश्य-हे देव, यहाँ देख

रामः दशरथस्य पुनः आसीत्‌-राम दशरथ का पुत्र था। रामं दशरथः एवं वदति-राम को दशरथ एसे बोलता है।

कृष्णेन जलं दन्तम्‌-कृष्ण ने जल दिया

आगमिष्यति तदा एव तया सह सा अपि आगमिष्यति। सा त्र ¢ तीर्स्वाने सा तपस्यां करोति। कयं पुत्रिका तपस्य

तादहेितो भम्‌" उस नतु स्वर परे रहते अनुस्वार नहीं हतां

12. 13. 14. 15. 16. ११, 18. 19. 20. 21. ॐ. 24.

देवदत्ताय पुस्तकं देहि-देवदत्त को पुस्तक दे।

लवपुरात्‌ फलम्‌ आनय-लाहौर से फल ले आ।

रामस्य रावणस्य युद्धं जातम्‌-राम ओर रावण का युद्ध हुआ तस्य गृहे मम वस्त्रम्‌ अस्ति-उसकं घर मे मेरा कपड़ा हे।

हे देवदत्त ! त्वं युद्ध करुरु-हे देवदत्त ! तू युद्ध कर वालकः उपरि अस्ति-वालक ऊपर है।

तं वालक पश्य कथं सः धावति-उस वालक को देख, वह कैसे दौडता है। वालकेन स्नानं कृतम्‌-वालक ने स्नान किया।

बालकाय मोदक देहि-वालक को लडइ्ड्‌ दे।

वालकात्‌ पुस्तक गृहाण-वालक से पुस्तक ले।

बालकस्य वस्त्रं रक्तमस्ति'-वालक का कपड़ा लाल हे।

वालके दयां कुरु-वालक पर दया कर।

ठे वालक त्वमुत्तिष्ठः-हे वालक, तू उठ।

शब्द

पालकः पालनकर्ता पानीयम्‌-जल पेटकः सन्दूक पुच्छम्‌ पठ कणः--धान

का कण दन्तः दति तक्रम्‌ छाछ घतम्‌-घी ओदनम्‌- भात खट्वा-चारपाई, खरिया कपिः-वंदर वैरम्‌- शत्रुता

क्रिया

ज्वलति- (बह) जलती हे ज्वलसि- (त्‌) जलता हे वहति- (वह) उटाता

कृन्तति- (वट) कतरता हे ज्वलामि-जलता हू अत्ति-(वह) खाता टे अत्सि- (तू) खाता है। अयि- (भ) खाता हू। कृन्तसि- (त) कुतरता हे कृन्तामि- (मै) कुतरता हू। निःसरति- (वह) निकलता है निःसरसि- (तू) निकलता हे

(ए *+> + 1 ।==

(ककड ररर)

1. रक्तम्‌ अस्ति 2. त्वम्‌ उत्तिष्ठ

गाता

वाक्य

. मम गृहे अश्वः अस्ति-मेरे घर में घोडा है।

. तस्य पुच्छं श्वेतम्‌ अस्ति-उसकी पूंछ सफ़ेद है

. सः घृतं नेव अत्ति-वह घास नहीं खाता।

. तस्य दन्तः श्वेतः नास्ति-उसका दांत सफ़ेद नहीं हे . अयं तस्य पेटकः नास्ति-यह उसका टंक नहीं है।

| 6. अहम्‌ ओदनं भक्षयामि-्मैँ भात खाता हू, 7. सः ओदनं दुग्धेन सह अत्ति-वह भात दूध के साथ खाता हे। 8. त्वं कयं शर्करया सह ओदनम्‌ अत्सि-तू कंसे शक्कर के साथ भात खाता है ? | 9. अहं तस्य छत्रं नयामि-ै उसका छाता ले जाता हू | 10. मूषकः तस्य पुच्छं कृन्तति-चूहा उसकी दुम कारता हे | 11. हे मित्र ! अधुना उदानं गच्छ, तत्र मम भृत्यः अस्ति-टे मित्र, अब बागृको | जा, वर्ह मेरा नौकर है। |

सरल वाक्य |

1. त्वम्‌ अत्र शीघ्रम्‌ ओदनम्‌ आनय 2. अत्र जलम्‌ अपि नास्ति 3. तस्य ` पुस्तकं तव मित्रेण नीतम्‌ 4. तत्न दीपः ज्वलति 5. तस्य प्रकाशे पुस्तक पठट। |

6. सः किं वदति इदानीम्‌ ? 7. अहं स्वग्रामम्‌ अद्य गमिष्यामि 8. यदि भूमितः अत्र अस्ति तर्हि तम्‌ अत्र आनय 9. राजा चौरं दृष्ट्वा धावति 10. यदा गृहे चौरः

आगतः तदा त्वं कुत्र गतः ? , पाठ 33 | शब्द ¦

आसीत्‌-था, हुजा था राजा- नरेश कृतम्‌-किया युद्धम्‌- लडाई हतः- मारा, हनन्‌ किया। बभूव-हो गया था, हुजा था नेत्रम्‌-ओंख नामधेय, नामक-नाम वाला भवलम्ब्य-अवलम्बन करके राज्यम्‌-राज्य अकरोत्‌-करता था भार्या-स्तरी, धर्मपत्नी नामधेया-नाम की साध्वी-पतिव्रता |

वाक्य

रामचन्दः कः आसीत्‌-रामचन्द्र कौन थे ? , रामचन्दः अयोध्यानामकस्य नगरस्य राजा आसीत्‌-रामचन्द अयोध्या नाम की नगरी के राजा थे। .

तेन रामेण किं कृतम्‌-उस राम ने क्या किया ? रामेण युद्धे रावणः हतः-राम ने युद्ध मेँ रावण को मारा। , रावणः कः आसीत्‌-रावण कौन था ? | . रवणः लड्कानामधेयस्य नगरस्य राजा आसीत्‌-रावण लंका नाम के नगर का `

| , ~ र)

5 ५\

राजा था।

7. रावणेन सह रामस्य युद्धं किमर्थं बभूव-रावण के साय राम का युद्ध किस कारण हुआ ?

8. रावणः धर्म त्यक्त्वा अधर्मम्‌ अवलम्ब्य राज्यम्‌ अकरोत्‌, अतः रावणेन सह रामेण युद्धं कृतम्‌-रावण धर्म को छोडकर, अधर्म का अवलम्बन करके राज्य करता था, इसलिए रावण के साथ राम ने युद्ध किया।

9. रामस्य भार्या का आसीत्‌-राम की स्त्री कोन थी?

10. सीता नामधेया रामस्य भार्या अतीव साध्वी आसीत्‌-सीता नाम वाली राम की धर्मपत्नी अत्यन्त पतिव्रता थी

11. रामचन्द्रस्य माता का आसीत्‌-रामचन्द्र की माता कौन थी ?

12. कौशल्या नामधेया श्रीरामचन्द्रस्य माता आसीत्‌-कौशल्या नाम वाली श्रीरामचन्द्र की माता थी।

13. रावणस्य भ्राता कः आसीत्‌-रावण का भाई कौन था?

14. विभीषणः रावणस्य भ्राता आसीत्‌-विभीषण रावण का भाई था।

15. रामचन्दस्य लक््मणनामधेयः बन्धुः आसीत्‌-रामचन्द्र का लक्ष्मण नामक भाई था।

16. तया भरतः शनुष्नः अपि-उसी प्रकार भरत ओर शत्रुघ्न भी

17. रामेण सह साध्वी सीता वनं गता आसीत्‌-राम के साथ प्रति व्रता सीता वन को गई थी।

18. रामेण सह लक्ष्मणः अपि वनं गतः आसीत्‌-राम कं साथ लक््मण भी वन कौ गया था।

19. यया रामेण राक्षसाः हताः तथा एव लक्ष्मणेन अपि राक्षसाः ठताः-जिस प्रकार राम ने राक्षसों को मारा उसी प्रकार लक्ष्मण ने भी राक्षसो को मारा।

20. रामः धर्मेण राज्यम्‌ अकरोत्‌-राम ने धर्म से राज्य किया।

21. अतः लोकः रामे प्रीतिम्‌ अकरोत्‌-इसलिए लोग राम से प्रेम करते थे।

शब्द

वार्ता-बात रम्या--रमणीय नगरी-शहर। सा-वह (स्त्री) वार्तललापः- बातचीत उष्ट्रम्‌-ऊट त्वरितम्‌ - शीघ्र नयनम्‌-्ओंख उदकम्‌-जल गतिः- गमन चाल वृष्टिः-वर्षा, बरखा प्रकाशः-रोशनी एषः-यह मुम्बानगरे-मुंबई मे मेयः-बादल द्ुतम्‌- शीघ्र पत्रम्‌-पत्र, खत पानीयम्‌-पानी

वाक्य

` यद्य वार्त रमया भवति-युद्ध कौ वात रोचक होती है। ^ सा नगरी अतीव रम्या वह

3. कृष्णेन सह वार्तालापं छर -कृष्ण के साथ वातचीत कर

पाचकः-रसोया महिषी- भस ' नहारानी यष्टिः यष्टिका-सोी सूचिका | गण्डूषः चुल्ली भनूतम्‌-असल्य, सूट कशा-चावुक पर्पटः-पापई -केची

कर्तरी पटः- महानसम्‌ -रसोई का स्थान पारितोषिकम्‌ इनाम महिषः- भसा कक

आरोहति (वह) पट्ता है -त्‌) - (भै) चट्रता मकि वं ८५ चटता कडि 9 ५५ ह) ठैसता है। नितिपतति- (वह) फेकता है केतं |

वह) छिडकता (वह) कारता सिञ्चति- (वह) छि सयति का खाता

षि 9कष्के^ "क चै कैः के. " ` आक 1 ¢ | 23 4 =. 7

` अरवदेशात्‌ अश्वः आगच्छति-अरवब देश से घोडा आता है

अद्य मागे कर्दमः जातः-आज मार्ग मेँ कीचड हो गया हे।

तव वस्त्रं मलिनम्‌ अस्ति-तेरा वस्त्र मैला हे।

- त्वां दृष्ट्वा सः हसति-तुञ्चको देखकर वह हँसता है

` अह तं दृष्ट्वा हसामि- मै उसको देखकर हँसता हू

- यष्टिकया मूषकं ताडय-सोटी से चूहे को मार।

` यदि त्वं कूपस्य जलं पातुम्‌ इच्छसि तर्हिं मया सह आगच्छ-अगर तू कुरे का जल पीना चाहता है तो मेरे साथ आ।

0. अवन्तिनगरात्‌ तस्य मित्रम्‌ अद्य अपि आगतम्‌-अवन्ति शहर से उसका मित्र

आज भी नहीं आया

2 ~ +> 2

सरल वाक्य

1" पश्य सः सूचिकायां सूत्रं निक्षिपति 2. सः कर्तर्या पत्रं कर्तयति 3. सः 1 गृहाद्‌ अन्न एव आगतः 4. महानसात्‌ धूमः उत्तिष्ठति 5. यत्र धूमः अस्ति # च. 6. जलस्य गंूषेण मुखं प्रक्षालयामि 7. तेन पारितोषिकं प्राप्त्‌

महिषी दुग्धं ददाति 9. अयं सैनिकः कशया अश्वं ताडयति 10. पाठशालायां सह कलहं कुरु

वाक्यों फा संस्कृत मे अनुवाद कीजिए- ~ उस याचक को अन्न दो 2. जो लडकी पाठशाला जाती है, वह किसकी

हे 7 = ¢ छ, ५० है <+ घोड़ा देखता हूं। 4. तू वादल देखता हे 5. तेरा सन्दूक कर है ?

पाठ 34

अकारान्त नपुंसकलिग शब्द

(मनम्‌-जाना आगमनम्‌- आना भक्षणम्‌-खाना भोजनम्‌- भोजन, रोटी

करण जेना पानम्‌-पीना। दानमू्‌-देना आदानम्‌-लेना हसनम्‌-हंसना पनम्‌ वर्तन स्वीकार करना। लेखनम्‌ -लिखना पत्रम्‌-पत्र वस्त्रम्‌- वस्त्र

..“ररम्‌-शरीर। अन्नम्‌-अनन। पतग ठते भई स्वीर्िंग शब्दों के लिंग तीन प्रकार के होते करई शब्द पुल्लिग ~ | है ओर करई नपुंसकलिंग लिंग पहचानने के तिए कोई सामान्य 111

भोरजो है वे इस समय पाठकों की समज मेँ नहीं सकते, इसलिए |

यहां नहीं दिए जा रहे। सब अकारान्त नपुंसकलिंग शब्दों के रूप अकारान्त पुल्लिंग शब्द के सम ही होते है, केवलं परथमा तथा दितीया के रूप कुछ भिन्न होते है देखिए-

अकारान्त नपुंसकलिग “भोजनः शब्द

1. प्रथमा भोजनम्‌ भोजन . 2. दितीया भोजनम्‌ भोजन को

8. तृतीया भोजनेन भोजन से

4. चतुर्थी भोजनाय भोजन के लिए 5. पञ्चमी भोजनात्‌ भोजन से

6. षष्टी भोजनस्य भोजन का

7. सप्तमी भोजने भोजन में

सम्बोधन हि) भोजन हे) भोजन

इसी प्रकर अन्य सव अकारान्त नपुंसकलिंग शब्दों के रूप होते है इन स्पे को देखकर पाठकों ने जान लिया होगा कि अकारान्त पुल्लिंग ओर नपुंसकलिंग शे की प्रथमा तथा दितीया के अतिरिक्त अन्य विभक्तिर्यौ एक-सी होती है पाठकों ने देखा होगा कि तृतीया विभक्ति का जो “न है वह कई शब्दो पे "ण, हो जाता है, ओर कई शब्दों मेँ "न" ही रहता है। इसका पूरा-पूरा नियम हम दितीय भाग मेँ देगे, परन्तु पाठकों को यल इतना ही ध्यान में रखना चाहिए कि जिन शब्दों मेँ अक्षर होता है, प्रायः इन शब्दों के “न का टी "ग बनता हे परन्तु कई अवस्थार्णु एेसी आती है जिनमें "न' का “ण नहीं बनता; जेसे- “अ भोजनेन, गमनेन (2) रामेण, नरेण, पुरुषेण (3) कृष्णेन, रथेन, रावणेन (1) देव, भोजन, गमन शब्दों मेँ अथवा षः वर्ण होने से "णः नरह हआ, 2) राम, नर ओर पुरुष शब्दं मे ^र श" होने से “ण' बना ह, तथा (9) , रथ ओर रावण शब्दों मे कु विशेष स्थिति होने के कारण “ण” नहीं बना। दूस विशेष स्थिति का वर्णन हम आगे करेगे। परंतु अभी इस विशेष की परवाह न. करके पाठकों कौ रूप वनाने चािएं ओर वाक्यों मेँ उनका प्रयोग करना चाहिषए।

अकारान्त नपुंसकलिंग शब्द

प्यमू-पुण्य पातकमू--पाप पोषणम्‌-पुष्टि प्रक्नालनम्‌-धोना ध्यानम्‌-ध्यान। | श्रमणम्‌-्रमण, पूमना। शीतनिवारणमू-शीत का निवारण। सत्यम्‌-सत्य। स्नानम्‌-स्नान शू्पम्‌-छाज फलकम्‌-फटा जीरकम्‌-जीरा चक्रम्‌-चक्र |

वाक्य

. द्रव्यस्य दानेन कि फलं भवति- द्रव्य के दान से क्या फल होता टैः? . द्रव्यस्य दानेन पुण्यं भवति-द्रव्य के दान से पुण्य होता हे। . शरीरस्य पोषणाय अन्नमस्ति'-शरीर फी पुष्टि के लिए अन्न हे। . वस्त्रस्य प्रक्षालनाय शुद्धं जलं तत्र अस्ति-कपड़ा धोने के लिए शुद्ध जल वहां हे। 5. पन्नस्य लेखनाय मसीपात्नं मह्यं देहि-पत्र लिखने के लिए मुञ्चे दवात दो 6. कन्दुकः क्रीडनाय भवति-गेंद खेलने के लिए होती है। 7. नगरात्‌ नगरं तस्य भ्रमणं सदा भवति- (एक) शहर से (दूसरे) शहर सदा उसका भ्रमण होता रहता हे। 8. वस्त्रेण शीतात्‌ निवारणं भवति-कपडे से सर्दी से बचाव होता हे। 9. तव भोजने करपटटिका नास्तिः- तेरे भोजन में एलका नहीं है 10. मम भोजने ओदनमस्तिः व्यञ्जनमपि, अस्ति-मेरे भोजन में भात हे ओर चटनी भी हे। 11. इदानीं तत्न तस्य गमनं वरम्‌-अब वहं उसका जाना अच्छा है।

अकारान्त नपुंसकलिंग (ज्ञानः शब्द

.~ श. - ष,

1. प्रथमां ज्ञानम्‌ ज्ञान

2. दितीया ज्ञानम्‌ ज्ञान को

8. त्रतीया ज्ञानेन ज्ञान ने (से)

4. चतुर्थी ज्ञानाय ज्ञान के लिए

5. पञ्चमी ज्ञानात्‌ ज्ञान से

6. षष्टी ज्ञानस्य ज्ञान का

१. सप्तमी ज्ञाने ज्ञान में सम्बोधन हे. ज्ञान (हे) ज्ञान

अकारान्त नपुंसकलिंग शब्द

अग्रम्‌-नोक अंजनम्‌- कज्जल, सुरमा। पाटवमू्‌-चंचलता, चतुराई अभिवादनम्‌-नमन अवलोकनम्‌-देखना। फलम्‌-फल। आरोग्यम्‌-स्वास्थ्य स्थानम्‌-जगह उन्मीलनम्‌-खोलना कार्यम्‌ -कृत्य, काम गानम्‌-गाना प्राणम्‌- नाक

1. अन्नम्‌ + अस्ति। 2. + अस्ति। 3. ओदनम्‌ + अस्ति। 4. व्यञ्जनम्‌ + अपि। 1113

चित्तमू-मन तरणम्‌-तैरना। धनम्‌-दौलत नर्तनम्‌-नाच दुःखमू्‌-तकलीफ़। |

जनामयम्‌-आरोग्य अपाटवम्‌-बीमारी असत्यम्‌-द्ूठ सत्यम्‌- सच उत्तरम्‌-जवाब। स्मरणम्‌-याद खनित्नम्‌-खोदने का हथियार उपवनम्‌-वाग पालनम्‌-रक्षा। | श्रवणम्‌-सुनना। जीवनम्‌-जिन्दगी चलनम्‌-चलना मूलम्‌- जड तत्त्वम्‌- तत्तव | शस््म्‌-हथियार इन्दियम्‌-इन्दरिय हवनम्‌-हवन आसनम्‌- आसन नामधेयम्‌ नाम | कषेत्रम्‌-खेत व्रतमू-नियम पत्तनमू-नगर हिंसनम्‌-हिंसा, वध शीलम्‌-स्वभाव ` ये सब शब्द ज्ञान" शब्द के समान टी रूप बदलते है |

वाक्य

1. मम शरीरस्य अपाटवम्‌ अस्ति-मेरा शरीर बीमार हेै। 2. यया आरोग्यं भवति तथा कार्यम्‌-जैसा स्वास्थ्य हो, वैसा ही करना चादिए। 8. तव चित्तं कुत्र अस्ति-तेरा मन करटा है ? ५. ईश्वरस्य स्मरणं प्रभाते उत्थाय अवश्यं कर्तव्यम्‌-सवेरे उठकर ईश्वर का स्मरण अवश्य करना चाहिए 5. यदा त्वं व्रतं करोषि तदा किं भक्षयसि-जवब तू व्रत रखता है तव क्या खाता हि? 6. अश्वस्य पालनं कुरु-घोडे का पालन करो | 7. यदा सः असत्यं वदति तदा तस्य मुखं मलिनं भवति-जव वह शूठ बोलता हे तब उसका चेहरा मलिन हो जाता है। | 8. येन केनापि मार्गेण गच्छ--चाहे जिस मार्ग से जा। | 9. तव पित्रा धनं दत्तम्‌-तेरे पिता ने धन दिया। 10. मया शास्त्र पठितम्‌-मेने शास्त्र नहीं पदा |

सरल वाक्य |

1. माता पुत्राय भोजनं ददाति। 2. पुत्रः पित्रे पत्रं लिखति। 3. तेन धनं आनीतम्‌ 4. कि सः अयापि तत्रैव अस्ति ? 5. किं करोति सः तत्र ? 6- अहं तस्मै | बालकाय किम्‌ अपि दातुं इच्छामि यतः सः स्वकीयं पुस्तकं पठति, इतस्ततः |

च। 7. सः क्षुधया दुःखितं मनुष्यं दृष्ट्वा तस्मे एव अन्नं ददाति 8. देवदत्त, ,

| : त्वं जले तरणं जानासि ? तर्हिं अद्य मया सह आगच्छ नदीम्‌ तत्र गत्वा स्नानं | करिष्यामः 9. इदानी भोजनस्य समयः जातः, शीघ्रं जलं गृहीत्वा अत्र एव आगच्छ |

पाठ 35

शब्द

युखम्‌-मुह ।नेत्रम्‌-ओंख कर्णः-कान दन्तः-दत हस्तः-हाथ पादः- रपव

नालिका--नाक हदयम्‌-हदय उदरम्‌-पेट पृष्ठम्‌-पीठ। अङ्गुली अंगुली शिखा-चोरी

1.

२.

वाक्य

पश्य, नवीनचन्दस्य मुखं कथम्‌ अतीव मलिनम्‌ अस्ति-देख, नवीनचन्द्र का मुह क्यों इतना मलिन है ? |

सः इदानीं मुखेन फलं भक्षयितुं शक्नोति-वह अव मुँह से फल नहीं खा सकता

- अह कणभ्यां तव अतीव मधुरं भाषणं श्णोमि-मेँ कान से तेरा बहुत मीठा

भाषण सुनता हू।

. मार्गे तस्य हस्तात्‌ पुस्तकं पतितम्‌- मार्ग में उसके हाथ से पुस्तक गिर पड़ी - मार्गे पतितं तत्‌ पुस्तकं श्रीधरेण गृहीतम्‌- मार्ग मे गिरी हुई उस पुस्तक कौ

श्रीधर ने ले लिया।

- सः शूरपुरुषः इदानीं युद्धे पतितः- वह वीर पुरुष अब लडाई मे गिर पड़ा (मर

गया)

- तस्य मलिनहस्तात्‌ कुण्डलिनीं गृहाण-उसके मलिन हाथ से जलेबी लो

शब्द्‌

नत्राभ्यामू-दोनों अंखों से कणाभ्याम्‌ -दोनों काना से हस्ताभ्याम्‌ दोनों हाथों

से। पद्भ्याम्‌-दोनो पवां से। नासिकया-नाक से दन्तैः-दौँतों से आरोहत्ि-चटृता हे विश्वम्‌-संसार, सब सुगन्धम्‌--खुशबू शठः--ठग वाणी- भाषण विष-जृहर

> क. - ति, 7.

वाक्य

- अहं नेत्राभ्यां विश्वं पश्यामि- में (दोनो) ओंँखों से संसार को देखता ह| * सः कणभ्यां श्रोतुं शक्नोति-वह (दोनो) कानों से सुन नहीं सकता - त्वं नासिकया सुगन्धं गृहासि किम्‌-क्या तू नाक से सुगन्ध लेता डे ?

- मनुष्यः पद्भ्यां धावति- मनुष्य (दोनो) पौँवों से दौडता है।

| 115 |

5. जनः दन्तैः फलम्‌ अत्ति-मनुष्य दतां से फल खाता हे 6. वानरः हस्ताभ्यां पादाभ्यां वृक्षम्‌ आरोहति-बन्दर (दोन) हाथों तथा (दोन) पवो से वृक्ष पर चटृरता हे। / 7. वानरः रात्रौ वक्षस्य उपरि स्वपिति-बन्दर रात्रि में वृक्ष के ऊपर सोताहै। ,, 8. शठस्य मुखे मधुरा वाणी तथा हदये विषं भवति-ठग के मह में मीठे शब्द तथा हृदय मेँ विष होता है 9. पश्य, वानरस्य मुखं कयं कृष्णम्‌ अस्ति-देख, बन्ध्र का मुंह कैसा काला है।

शब्द

] | इह-यं, इस लोक मे. अमुत्र-परलोक में संसारः-संसार, दनिया। | जगति-जगत्‌ ्मेँ। राष्ट्रः-राष्ट्र, क्रोम। प्रसन्नः -आनन्दित। भिन्नः-अलग। | आत्मा-आत्मा, जीव पक्वम्‌-पका हुआ बीजमू्‌-बीज |

|

1

वाक्य

1. इह मनुष्यः दिने दिने' अन्नं भक्षयति-यर्हा मनुष्य प्रतिदिन अन्न खाता हे। 2. नगरे नगरे जनः क्रीडां करोति-हर शहर में मनुष्य खेलता हे 9. ग्रामे ग्रामे उद्यानं भवति-प्रत्येक गौव में बाग होता हे। 4. शरीरे शरीरे आत्मा भिन्नः-हर शरीर मेँ आत्मा अलग हे 5. वकष वृक्षे फलं पक्वम्‌ अस्ति-हर वृक्ष पर फल पका हे 6. राष्ट्रे राष्ट्रे राजा भवति-हर राष्ट्र मेँ राजा होता हे। ¢. सायं सायं जलम्‌ आगच्छति-प्रति सायंकाल जल आता है | 8. मार्गे मार्गे रथः धावति-हर मार्ग मेँ रथ दोड़ता है | 9. पुस्तके पुस्तके आलेख्यं भवति-हर पुस्तक में चित्र होता है | 10. फले फले बीजं भवति-हर फल में बीज होता हे। 11. कूपे कुये जलं भवति-हर कुएं मेँ जल होता हे | 12. वने वने वृक्षः भवति-हर वन में वृक्ष होता हे। |

इकारान्त नपुंसकलिंग “वारि' शब्द

1. प्रथमा वारि जल | 2. दितीया वारि जल को | 8. तृतीया वारिणा जल ने |

14 रल शवोका दुबारा उच्चारण करने से श्रत्येक' अर्थ हो जाता है। | 1 |

~,

ङ्क ` 1 1१८

4. चतुर्थीं वारिणे जल के लिए 5. पञ्चमी वारिणः जल से 6. षष्टी वारिणः जल का १. सप्तमी वारिणि जल में सम्बोधन हे) वारि दे) जल इस प्रकार सब इकारान्त नपुंसकलिंग शब्दों के रूप होते है वाव्त्य

. मनुष्यस्य देहे प्रथमं प्राणम्‌ इन्दियम्‌, येन गन्धः गह्यते-मनुष्य के शरीर मे ॥॥

इन्द्रिय नाक (है), जिससे गंध लिया जाता है।

. दितीयं चक्षुः येन मनुष्यः सर्वं पश्यति-दूसरी ओंख, जिससे मनुष्य सव कु

देखता हे

- तृतीयं श्रो्म्‌, येन शब्दः श्रूयते- तीसरी कान, जिससे शब्द सुना ता - चतुर्थम्‌ इन्दियम्‌ निहा, यया अन्नस्य रसः गृहमते-चोथी इन्द्रिय जवान्‌ ५८

अन्न का रस लिया जाता रै।

- पंचमम्‌ इच्धियं त्वक्‌, यया मनुष्यः स्पर्श जानाति-पोचवीं इन्द्रिय चमडी

जिससे मनुष्य स्पर्श जानता है।

. एतत्‌ इन्दियपञ्चक सर्वस्य ज्ञानस्य मूलम्‌-यह इन्द्रियंपञ्चक (पच तै इन्द्र्यो)

सब ज्ञान की जड है।

हे बालक ! त्वं किं करोषि-हे बालक ! तू क्या करता है? . त्वम्‌ कदापि असत्य मा वद असत्यभाषणं पापं वतते-तू सूठ बोल जूठ

बोलना पाप दै।

. यः असत्य वदति कः अपितस्य विश्वासं करोति-जो सूठ बोलता है कोई

उसका विश्वास नहीं करता

- यदि कः अपि बालकः असत्यम्‌ वदति तर्हि गुरुः तं ताडयति-अगर कोई बालक

द्ूठ बोलता है, तो गुरु उसको मारता हे।

. यः सत्यं वदति तस्य सर्वजनः विश्वासं करोति-जो सच बोलता हे, उसका सब

लोग विश्वास करते हे।

- त्वं सदा सत्यं वद, सत्यभाषणं पुण्यं वर्तते-तू सदा सच बोल, सच बोलना

पुण्य हे

. यदा बालकः सत्यं वदति तदा गुरुः तं नेवं ताडयति-जव बालक सच बोलता

है, तब गुरु उसको नहीं मारता।

- अतः कदापि असत्यं वक्तव्यम्‌, परन्तु सदेव सत्यं वक्तव्यम्‌-इसलिए कभी |

भी जूठ नहीं बोलना चाहिए, सदा सच ही बोलना चाहिए 15. इदम्‌ अहम्‌ अनृतात्‌ सत्यम्‌ उपैमि-यह मैं ूठ से (बूठ को छोडकर) सत्य कोप्राप्तहोतार्हू।

पाठ 36

पहले पाठो मे पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग शब्दों के रूप सात विभक्तयो मँ दे चुके कोई अकारान्त शब्द स्त्रीलिंग मेँ नहीं है जब कोड अकारान्त शब्द स्रीलिंग बनता है तब उसके अ" का प्रायः “आ' हो जाता हे। जेसे-

पुल्लिग उत्तमः पुरुषः उत्तम पुरुष

स्त्रीलिग उत्तमा स्त्री उत्तम स्त्री

इनमें “उत्तम शब्द जो पहले वाक्य में पुल्लिंग था, वह दूसरे वाक्य में स्त्रीलिंग बना, तब उसका खूप “उत्तमा' हो गया। इसी प्रकार सब रूप बदलते है देखिए-

(1) पुल्लिंग-1. श्वेतः रथः-सपफ़ेद रथ (गाड़ी) 2. मधुरः अआभ्रः- मीठा आम। 3. शोभनः समयः-अच्छा समय।

(2) स्त्रीलिंग-1. श्वेता पुष्पमाला-सफ़द फूलों कौ माला। 2. मधुरा कुण्डलिनी-मीटी जलेवी। 3. शोभना वेला-अच्छा समय

(3) नपंसकलिंग-1. श्वेतं पुष्पम्‌-सपफ़रेद एूल 2. मधुरं दुग्धम्‌-मीठा दूध 8. शोभनं दरश्यम्‌-सुन्दर दृश्य (नजारा)

इस प्रकार तीनों लिंगों मेँ सुप बदलते है विशेषण (गुणवाचक शब्द) का लिंग विशेष्य (गुणीवाचक शब्द) जैसा होगा इसी नियम के अनुसार उक्त विशेषणं के

लिंग गुणी के लिंगोँ के अनुसार बदलते आए स्पष्ट समञ्जन के लिए पाठकों को

दुबारा देखना चाहिए कि ऊपर दिए हुए तीन लिंगों कं विशेषण, एक ही होते हुए, गुणी के लिंग भिन्न-भिन होने कं कारण, कैसे भिन्न-भिन्न हो गए हैँ अव इस पाठ मेँ कुछ विशेषण देते टै

विशेषणं शब्द

उत्तम-उत्तम श्रेष्ठ-श्रेष्ठ, अच्छा वरश्रेष्ठ पीत-पीला रक्त-लाल नील-नीला। अन्ध-अन्धा। वधिर-बहरा। मध्यम-बीचवाला। कनिष्ट-कनिष्ठ, छोटा चतुर-चतुर, समञ्ञदार उचमशील-मेहनती, परिश्रमी श्वेत- सफ़ेद हरिति -हरा। ताप्र-लाल। तरुण-जवान। कृष्ण-काला। अलस-आलसी रुग्ण-रोगी।

118| नीरोग- स्वस्य वामन-ठिगना

[1१.. , „£+ , न्न ____

| (1112;

इन सब शब्दों के लिंग गुणियों (विशेष्यो) के लिगं के अनुसार बदलते रहेगे यह आप निम्न वाक्यों मेँ देख सकते हँ यदि यह बात पाठकों के ध्यानमें गई तो आगे का व्याकरण उनके लिए बहुत सुगम हो जाएगा

वाक्य

. उत्तमः पुरुषः शोभने प्रातःकाले उत्तिष्ठति-उत्तम मनुष्य सुहावने सवेरे के समय मेँ उठता है। 2. शुद्धेन जलेन स्नात्वा सन्ध्योपासनं करोति-शुद्ध जल से स्नान करके सन्ध्योपासना करता है। 8. यः एवं सदा करोति सः एव उत्तमः मनुष्यः भवति-जो इस प्रकार हमेशा करता है, वही उत्तम मनुष्य होता है। 4. या एवं सदा करोति सा अपि उत्तमा स्त्री भवति-जो इस प्रकार हमेशा करती

| |

हे, वह भी उत्तम स्त्री होती है। 5. प्रातः स्नानं सन्ध्योपासनं श्रेष्ठं कर्म अस्ति, इति अहं वदामि-प्रातः स्नान ओर सन्ध्योपासना श्रेष्ठ कार्य है, यह में कहता हू 6. सः अन्धपुरुषः रक्तं वस्त्रम्‌ आनयति-वह अन्धा मनुष्य लाल कपड़ा लाता हे। 7. सा अन्धा स्त्री श्वेतां पुष्पमालाम्‌ आनयति-वह अन्धी स्त्री सफ़ेद एूलों की | माला लाती हे। | 8. सः बुद्धः पुरुषः श्वेते रथे उपविश्य अत्र आगच्छति-वह बूटा मनुष्य सफ़ेद गाड़ी मेँ बैठकर यहां आता है। | 9. सा वृद्धा स्त्री रक्तं वस्त्रं हस्ते गृहीत्वा धावति-वह वटी स्त्री लाल कपडा हाथ मे लेकर दौडती है। 10. सः उद्यमशीलः वालः सदा उत्तमं पुस्तक पठति-वह उद्यमी बालक सदा उत्तम पुस्तक पठता हे 11. उद्यमशीला बालिका सदा उत्तमां पुष्पमालां करोति-उद्यमी लड़की हमेशा उत्तम पुष्पमाला बनाती हे। | 12. सः रुग्णः बालः मधुरम्‌ अपि दुग्धं पिबति--वह रोगी बालक मीठा दूध नहीं पीता। 13. सा रुग्णा बालिका मधुरम्‌ अपि दुग्धं पिबति-वह रोगी लड़की मीठा दूध

| भी नहीं पीती

विशेषण शब्द

अघिल-सव, सम्पूर्ण अधिक- शि भनुत्तम-सवसे उत्तम अभिवाद्य -नमस्कार के योग्य अधीत- पत्‌ अनर्घ-वहुमूल्य | अन्तिक-पास। अन्त्य-आखीर

ओर बहुत अध्येतव्य -पट्ने योग्य।

रीर का, अन्तिम अवाच्य-वोलने किया हुजा। सन्तुष्ट --खुश, प्रसन्न भलत मुश्किल कयनीय-कहने योग्य तुल्य-समान | + | वाय निकट समीप निखिल--सव परिष्कृत -संस्कार किया हआ पूर्व चा पेय-पीने योग्य भत्य-खाने के योग्य दुःखित-पीडित। अविप्ुत- अशिक्षिति-अज्ञानी ईदृश-एेसा

अयोग्य | अर्पित-अर्पण कि

चिन्तिति-सोचा हुआ ककः

वाग्य | नष्ट-नाशको बाप्त पथ्य-हितकारक पर-दूसरा पालनीय-पालने आ।

भीत-डरा इजा पूजनीय-सत्कार के योग्य | वुभुक्षिति-भूखा भयाकुल- उरा &

मुखोद्गत- मुख से हुजा विशेषणो का उपयोग प्ति स्वीलिग न्कल

1. सन्तुष्टः पुरुष सन्तुष्टा नारी सन्तुष्ट मित्रम्‌

2. कथनीयः वृत्तान्तः कथनीया कथा कयनीयं चरित्रम्‌

3. द्रष्टव्यः ग्रामः द्रष्टव्या नदी द्रष्टव्यं दुश्यम्‌

4. पूर्वः पुरुषः परवा दीपमाला पूर्व पुस्तकम्‌

5. दुःखितः पुत्रः : दुःखिता पुत्रिका दुःखितं कलत्रम्‌

0. दातव्यः अश्वः दातव्या गौः

7. पालनीयः

दातव्यं दानम्‌ पालनीयं मित्रम्‌ उपयोग होता हे आशा भौन | अकारान्त विशेषणो च! ` -नाएगे। यह पाठको को ध्यान में रखना विशेषणो का स्नीलिंग मे आ, ही वनता है, एला कोई 0. ण॑ स्थितियों मं (८)

नसम्‌ कए मं ई' भी वनती हे। ईशः देशः इदटुशी अवस्था

पालनीया दासी

इस प्रकार सव विशेषणौ का भिन्न लिंगों में

रस्‌ प्रकार प्रयोग करव अनेक वाक्य वनां 610५4

विशेष नियम आगे वताया जाएगा साथ ही पाठकों को ध्यान मेँ होते है 1 (विशेष्य-विशेषणो के) लिंग, विभक्ति तथा वचन समान (क) 1

` -0। 9. दातव्यस्य अनपि ` £ दातव्याय अश्वाय जलं देहि।

(ख) 1. पालनीयाये पत्रिकायै अन्नं देहि। 2. पालनीयां पुत्रिकां पश्य 8. पालनीयायाः पत्रिकायाः पत्रम्‌ आगतम्‌ | (ग) 1. अखिलः संसारः ईश्वरेण कृतः 2. अखिलया सेनया युद्ध कृतम्‌ अखिलं पुस्तक मया पठितम्‌ (घ) 1. सन्तुष्टः राजा द्रव्यं ददाति 2. सन्तुष्टं मित्रं किं करोति ? 3. सन्तुष्टा वालिका इदानीं हसति (ड) 1. पूजनीयः गुरुः आगतः 2. पूजनीया माता आगता 3. पूजनीयं ज्ञानं

पाट

नाम-नामवाला कश्चिद्‌-कोई एक प्रज्ाल्य-जलाकर स्वकीय-अपना वर्ण-रंग। सोन्दर्यम्‌--खूवसूरती नित्य-हमेशा। लघु-षछोर -भोजन नवीन-नया प्राचीन -पुराना आकार-शक् कुरूपता -वदसूरती |

वाक्य

. गङ्गाधरः नाम कश्चिद्‌ वालः अतीव उद्यमशीलः अस्ति-गंगाधर नामक कोई एक वालक बहुत उद्योगी है। ` तः प्रातः एव उत्तिष्ठति, दीपं प्रज्वाल्य पुस्तकं गृहीत्वा, स्वीयं पाठं पठति-वह पवेरे ही उठता हे, दीप जलाकर, पुस्तक लेकर अपना पाठ पट्ता हे। ` यदा सः उत्तष्ठति तदा सूर्यः अपि उदयते-जव वह उठता है तव सूर्य भी उगता। ^“ सः स्वकीयस्य पाठस्य अध्ययनं कृत्वा स्नानं करोति, स्नात्वा नित्यं कम॑ -वह अपना पाठ पटृकर नहाता है, ओर नहाकर नित्यकर्म (संध्या आदि) " श्वे लघुम्‌ आहारं भक्षयित्वा सत्वरं पाठशालां गच्छति- वाद मेँ थोडा भोजन खाकर पाठशाला जाता हे। तने नवीनं पाठं गृहीत्वा स्वकीयं गृहम्‌ आगछति- वहां नया पाट लेकर अपने > पर आता हे ` भः कदापि मार्गे क्रीडति-वह मार्ग कभी नटीं खेलता ` भक्तेः सर्वदा सः प्रसन्नः भवति-अतः वह हमेशा खुश रहता दै

[~

| 121 |

शब्द्‌ परसि-तू पूषठता है। पृच्छामि मे पूता

पच्छति-वह पृषता है।

सम्यकू-अच्छी प्रकार्‌ | प्रतिदिनम्‌-हर एक दिन पष्टम्‌- पृष्ठा पृष्ट्वा-पूष्ठकर्‌। प्रन प्र्न,सवाल। उत्तरम्‌-उत्तर. जवाव वायुसेवनम्‌-हवाखोरी

वाक्य

1* शृणु देवः तं कि पृच्छति-सुन, देव उससे क्या पृषता है। =

2 सः उच्यैः वदति, अतः अहं तस्य भाषणं श्रोतुं शवनोमि-वह ऊँचा नही वोलता, इसलिए मेँ उसका भाषण सुन नहीं सकता

3. सत्वरं तत्र गत्वा शृणु-शीप्र वह जाकर सुन।

4 मम भ्रमणस्य समयः जातः, अतः तत्र गन्तुं शव्नोमि- मेरा घूमने का समय हो गया है, इसलिए वर्ह नहीं जा सकता

5. कि त्वं प्रतिदिनं सायङ्काले भ्रमणाय गच्छसि-क्या तू प्रतिदिन शाम को घुमनं जाता है ?

वर्तमान काल, दूसरा भूतकाल ओर तीसरा (द ^, तथा भविष्यत्‌ काल कँ विषय मे पाटकों ने जान लिया |

वर्तमान काल-गच्छामि-जाता वि भविष्यत्‌ काल-- गमिष्यामि -जाङगा जव भूतकाल के विषय

शब्द लगा देने से वन

रूप्‌ के जगे (न) वन जाता है। जैसे- गे स्म रखने से उसी क्रिया का भूतकाल हे भूतकाल -करता है | गच्छति स्म-जाता था उक्ता है। करोति स्म-करता था। उत्तिष्ठति स्म-उठता था।

वाक्य

रामः उद्याने सदा गच्छति-राम वाग में हमेशा जाता है। ` रामः उद्याने सदा गच्छति स्म-राम वाग में हमेशा जाता था। ` कृष्णेन सह भाषणं करोमि- (न) कृष्ण के साथ वात करता ` त्वं तेन सह भाषणं करोषि-तू उसके साथ भाषण (वात) करता है ` सः मित्रेण सह भाषणं करोति स्म-वह मित्र के साथ भाषण करता था, ` सः वालः मार्गे क्रीडति स्म-वह वालक मार्ग में खेलता था। ` गजा युद्धं करोति स्म-राजा युद्ध करता था। * सः कर्म करोति स्म--वह काम करता था। ` सः फल भक्षयति स्म-वह फल खाता था। ` सः प्रातः उत्तिष्ठति स्म-वह सवेरे उठता था। पि्ठले पाठ मेँ जो विशेषण दिए गए है उनका तीनों लिंगों मे उपयोग करके पाक्य य्ह दे रहे है उन्हँ देखकर पाठकों को विशेषणो के प्रयोग का ज्ञान नाएगा | इसलिए पाटक हर एक वाक्य के विशेषणो को ध्यान से देखें ओर उनके काठ्ग जान लें

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वाक्य 3. , ` भषिलस्य संसारस्य किं मूलम्‌ ? 2. अखिलायाः सृष्टेः किं मूलम्‌ ? ` भखिलस्य जगतः किं मूलम्‌ ? भिता भया उत्तमाय ब्राह्मणाय मोदकः अर्पितः 2. मया उत्तमाय पंडितायै पुष्पमाला मया उत्तमाय मिन्राय पुस्तकम्‌ अर्पितम्‌ ५७१ 9 भिम्‌ | पश्य तें दुःखितं वालकम्‌। 2. पश्य तां दुःखितां नारीम 3. पश्य तं दुः

पोगर ६. पसम तृषिताय मनुष्याय पेयं जलं देहि 2. तस्यै तृषिताये पुत्निकायै पेया 3. तस्मे तृषिताय मित्राय पेयं दुग्धं देहि 1

अधीतं अधीता 0 ^ तके त्वे पठ तं ग्रन्यं त्वं नय 2. मया अधीतां कयां त्वं शुणु 3. मया

शब्व

ेपुसकलिग ५५५ ` दुनिया (पुल्लिग) पिच्छा-पिच्छ, चावललो का पानी जगत्‌-दुनिया भन) सृष्टिः -दुनिया (स्त्रीलिंग) पण्डिता-विदुषी स्त्री 0 | # पण्डितः -विदान्‌ पुरुष कार्य-काम तृषित-प्यासा गोः गा

`

तरल वाक्य 1“ मया अभिवादः गुरः इदानीम

अत्रे आगच्छति 2. तेन अद्य शोभना क्वा कथनीया 3. त्वं बधिराय मनुष्याय शुष्क पुष्यं देहि 4. अहं तस्य वुभुतितप नारिकायै उत्तमम्‌ अन्नं पेयं पानीयं दातुम्‌ इच्छामि 5. यदा सः पूजना वाण अविल धनं दास्यति तदा त्वम्‌ एवं वद 6. पश्य मित्र, मया अदय गोः गंगायाः तीरे ध्या 7. यदा त्वं कठिनं कार्य करिष्यसि, तदा अहं तव

निम्न वाक्यों की संस्कृत बनाइए- 1. राम की सीता नामक पतिव्रता किया। 3. लैसी मार्ग मं कल कीचड़ हइ थी, वैसी

पाठ 58

शब्द | मालाकार्‌ -माली। लोहकारः -लोहार रथकारः काष्टठकारः- तखन, वद | "वद्य सुवर्णकारः -सुनार्‌ | चर्मकारः -चमार। उपानत्‌-जूता घटीकारः -घडीसार्थ वस््रकारः-दर्जी। चित्रकारः -चित्रकार्‌ | रजकः-धोवी | मूर्तिकारः -मूर्ति वनानेवाती

~ ~ 4 8 (| वि , 4

शब्द

पुष्पाणि- (अनेक) फूल वस्त्राणि- (अनेक) वस्त्र पात्राणि- (अनेक) पात्र | प्नतम्‌-चांदी ताग्रम्‌-तांवा पित्तलम्‌-पीतल भवन्ति-होते हैं लोहः- लोहा सवर्णम्‌-सोना ` वङ्गम्‌-कलई। रजताभ्रकम्‌-एलुमीनियम। मृण्मय- मिद्ध का। बहूनि-वहुत साधु-अच्छे प्रकार

वाक्य

^ मालाकारः उद्यानं गत्वा बहूनि पुष्पाणि आनयति-माली वाग मेँ जाकर बहुत से एूल लाता हे। ॥॥

` सुवर्णकारः रजतस्य वहूनि पात्राणि अतीव मनोहराणि करोति-सुनार चाँदी के अत्यन्त सुन्दर बहुत से वर्तन बनाता है।

3. पात्रे जलम्‌ अतीव सुशुद्धं भवति- तवि के वर्तन मे जल अत्यन्त शुद्ध

ता है |

+ पित्तस्य पात्राणि पीतानि भवन्ति-पीतल के वर्तन पीले होते है

5. ताग्रस्य पात्राणि रक्तानि-तावे वर्तन लाल होते है।

9. रजकः रवतत वस्त्र साधु प्रक्षालयितुं शक्नोति-धोवी लाल कपड़ा अच्छी प्रकार

नहीं धो सकता ` सुवर्णपात्रं शोभनम्‌-सोने का वर्तन अच्छा हे।

शब्द

तञगः-तालाव कूषः-कुओं समुद्रः समुद्र सागरः समुद्र समीपम्‌ -पास ५०७५५ पीने का स्थान, प्याऊ। नदी-दरिया। स्नानगृह-नहाने का स्थान

पानी का नल। वाक्य 1. त्वं (न धका तडागस्य समीपं गच्छ तत्रैव स्नानं कुरु-तू तालाव के पास जा ओर स्नान कर्‌

` तस्य तडागस्य जलमतीवः मलिनमस्ति* तेन स्नानं करत नेच्छामि "उस ताला ३. =, जल बहुत ही गंदा है, उससे स्नान करना कुँ के जल से स्नान कर। भस्य कूपस्य जलेन स्नानं कुरु-तो उस कृ

` तेते + इच्छामि * एव 2. जलम्‌ + अतीव 3. मलिनम्‌ + अस्ति। 4

| कर्त नेच्छामि-इप ` + अस्य कूपस्य जलं वहु शीतम्‌ अस्ति, अतः अह तेनापि स्नानं कर्तु नेच्छा

कुएं का जल बहुत ठंडा है, इसलिए मै उसे भी स्नान करना 5 यदि कूपस्य शुद्धेन जेन अपि स्नानं करतु नेच्छति तर्हि मम स्नाना कला तत्र स्थितेन जलेन स्नानं शरू-अगर कुएं कं शुद्ध जल से भी स्नान कर। नहीं चाहता, तो मेरे स्नानघर में जाकर वर्ह रखे हए जल स्नान 0. शोभनम्‌

वात हे, मित्र भनम्‌ ! भो मित्र ! यया त्वया उक्तं तथा करोमि-अच्छी वात हे! मि जेमा तूने कहा, वैसा करता हू।

शब्द

| वच्तुम्‌-वोलने के त्िए। शिक्षितः - सिखाया हुआ नरपतिः | कस्मिश्चिद्‌-किसी एक मे प्रश्ने कृते-प्रश्न करने प्र्‌ अनयत्‌- (वह) जनयः- (तू) ले गया अनयम्‌- (मे) ते गया | प्रविश्य- प्रवेश करके भाषणम्‌- ीौ शुत्वा-सुनकर्‌। स्वमन्दिरम्‌-अपना महल मूर्खः-मूट्‌ क्रीतः- खरीदा |

| धकः तोता सन्देहः- संशय नरेशः-राजा। राज्ञा-राजा नै। राजन्‌-हे वाचम्‌-वाणी को। लक्षरुप्यकाणि-ताख

| राजक्षभा-राजा का दरवार वाता | ददौ-दिए। स्यापयित्वा-रखकर्‌। कुपितः-क्रोधित वूुमूल्यः-वहुत + | | ` पक्षियों का पालन करने वाला धूर्तः-शट.

पृष्टवान्‌ पूछा पक्षिपालवः शुकस्य कथा केनचित्‌

कस्मिशिचिद एत्‌ भूतेन पक्षिपालकेन एकः धकः मनुष्य इव ववतं शिक्षितः अपि परश कृते “अत्र कः सन्देहः इत्येव सः शुकः वदति। एकदा सः सतिपा | तं शुकं नरेशस्य समीपम्‌ जनयत्‌ तत्र राजसभां प्रविश्य पक्षिपालकेन उक्त राजन्‌ ! अयं शुक मनुष्य इव सर्वभाषणं वदति |" पक्षिपालकस्य एतद्‌ वचनं “अ 8 शुक \ किं लं त्वदा ष्यत पं बदति 7 1 शुकेन उक्तम्‌-“अत्र ऊः सन्देहः ।'” इति तेन उत्तरेण अतीव सन्तुष्टः सः ४,

५५

शुक ( शुक ¦ वु कः सन्देहः" इति एव वक्तुं जानासि ?" ; कः सन्देहः इति तदा सः राना तं शुकं

उक्तम्‌-““अत्र कः इति मूर्खः, यत्‌ मया वं क्रीतः ।'” शुक

नः राज्ञा पुनः शुकं प्रति प्रः

विचार्य एव सर्वं कार्य कर्तव्यम्‌ यथा राज्ञा अविचार्य एव महता मूल्येन शुकः क्रीतः तया केन अपि मूर्खत्वं कर्तव्यम्‌

पाट 39

शब्द

ईश्वरः ईश्वर पालकः- पालन करनेवाला जनः- मनुष्य दारपालः--दरवान, पपरासी कर्दमः-कीचट्‌ तन्तुवायः- जुलाहा सौचिकः- दर्जी गोधूमः- गहू कनक बिडालः विल्ली मण्डूकः-मेंटक वृषभः-वैल हेत . ऊपर लिखे शब्दों की सातों विभक्तयो के रूप पूर्वोक्त देव" शब्द कं समान हे।

वाक्य

1* दारपालकः दारि तिष्ठति गृहं रक्षति-दरवान दरवाजे पर खड़ा रहकर घर को रक्षा करता हे।

` वानरः वृक्षे स्थित्वा फलं भक्षयति-वन्दर वृक्ष पर रहकर फल खाता है।

ईश्वरः पालकः अस्ति, सर्व विश्वं सर्वदा रक्षति- परमेश्वर रक्षक है ओर सारे ससार की सदा रक्षा करता है।

` द्यः तेन दारपालेन चोरः अतीव ताडितः-कल उस पहरेदार ने चोर को बहुत मारा।

` मण्डूकः जले अस्ति, तं पश्य-मेटक पानी मेँ है, उसे देख

` षिडालः दुग्धं पिवति-विल्ला दूध पीता है।

क्रिया

पतति-(वह) गिरता हे पतसि (त्‌) गिरता है पतामि- गिरता हू चलति- (वह) पतिष्यति- (वह) गिरेगा पतिष्यसि-(तु) गिरेगा घतेगा ` (त) चलता हे चलामि--चलता हूं चलिष्यति- (वह) चलेगा चलिष्यसि _ ( | चलिष्यामि-चरतुगा |

© 42

@

वाक्य

1“ रामचन्द्रस्य पुत्रः अतीव धावति, अत 8 , अतः पतति च-रामचन्द्र का लडका बहुत दौडता , इसलिए गिरता हे ५.

3 तहि पतिष्यसि एव-अगर तू एेसा करेगा तो गिरेगा ही। प्रातःकाले भ्रमणाय चलिष्यति किम्‌-तू कल सवेरे घूमने चलेगा क्या ! ` हम्‌ इदानीं तस्य एत्रं नयामि, त्वं तसमै कथयम जव उसका छाता ते जाता

हू तू उसे वता। 5. तस्य गृहे हे अश्वः

अस्ति तया विडालः अपि अस्ति-उसके घर घोड़ा टै तथा ^“ तस्य वसं मय पर्षालितम्‌--उसका वस्त मेने धोया

शब्द तक्रम्‌-लस्सी (दही की), मड भूतम्‌-हो गया |

(त्‌) पकाता हे पचामि = --वह 1 तिप पकाता हू पचिष्यति

प्रदीपः -दीया | धृतम्‌- षी पचति- (वह) पकाता है पकाएगा | पचिष्यसि-तू पकाए

पकारऊगा |

| (त 1 ~. ( णप

स्वकीय द्रवयं रक्षितम्‌ अस्ति--उसका सन्टूक स्वगं अपना धन रखा है 2 # भस्ति-उस

@

६. जानामि जव वह व्यवति अपने कयः पेटकः कुत्र स्थापितः इति अह पह नं नहीं जानता ५९ गया तव उसने अपना ट्रैक कर्हो रख,

+~ 4५ -५ (1

दपिन ` क्या तू जानता है ? (6 है। ` र्हः जानाति भी नहीं जानता, परन्तु सूर्यसिंह 8. सः वर श्छ -तो उससे पू * सः वदति स्वपेटकः अपि टक भी तेन

स्वगृहं नौ 9. ईश्वरस्य वही अपने षर्‌ ले गया। +: इतति-यह कहता हे कि वह अपनी

10. अध्यापकस्य अवश्यं कर्तव्यम्‌ समीपं सत्वः नि ५१. न्म करना चाहिए जल्दी

ल्दी - णा

(1) सर्व- प्रथमा सर्वम्‌

»? दितीया 5 सबको (2) किम्‌ प्रथमा किम्‌ कौन

दितीया 1 किसको (3) यत्‌- प्रथमा यत्‌ जो

9१ दितीया ५3 जिसको (4) तत्‌- प्रथमा तत्‌ वह

_ दितीया », उसको

इनकी शेष विभवतियों के रूप सर्वनामों के पुल्लिंग रूपों के समान होते है। पाठ